Saturday, 2 May 2015

टीन-ऐज लड़के की जिंदगी में दस्तक लड़की देती है ।

कच्ची उम्र का प्यार, जो आंधियो और तूफानों की तरह हर टीन-ऐज लड़के या लड़की की जिंदगी में दस्तक देता है । ऐसा ही एक 16 साल का लड़का है या यूँ कहें की ऐसा हर एक लड़का है । उसे भी प्यार हो जाता है इंग्लिश की कोचिंग क्लास में उसके साथ पढ़ने वाली 15 साल की दीपशिखा से । उसे पहली नज़र में ही दीपशिखा से प्यार हो चुका था, लेकिन दीपशिखा से उसका नाम पूछने भर की हिम्मत जुटाने में ही उसे 2 हफ्ते लग जाते है । ऐसे में वो दीपशिखा के करीब जा पाता है ? उसे अपने दिल की बात कह पाता है ?वो डेट पर नहीं जाते, न फ्लर्ट करते है और यहाँ तक कि कभी रोमांटिक बातें भी नहीं करते है! तो जानना चाहते है वो लड़का उस लड़की से कैसे प्यार करता है!
 ''मैंने नज़र घुमाकर देखा. वह दीपशिखा ही थी. मेरी तरफ देखकर उसने एक मुस्कराहट दी. उसकी उस मुस्कान में शुक्रवार वाली उदासी कहीं खो गई थी. मुझे लगा वह दूसरी वाली पंक्ति में सबसे पीछे लगी बैंच पर बैठ जाएगी, जो खाली थी. लेकिन वह सीधे बेझिझक मेरे पास रखे स्टूल पर अपने सलवार-सूट की चुन्नी सँभालते हुए बैठ गई. हल्की बादामी रंग की कुर्ती पर गहरे बादामी रंग के फूल बने हुए थे. उसके नीचे उसकी उसी गहरे बादामी रंग की चूड़ीदार सलवार पर पैर के पंजे के ऊपर पड़ी चूड़ियां या सलवटें उसके शरीर को मदहोश-सा बना रही थी.उसके गोर पैरों में पड़ी काली रंग की साधारण सेंडल भी आकर्षक लग रही थी. कन्धों पर डाली गहरे बादामी रंग की चुन्नी थोड़ी-थोड़ी देर में अपनी उपस्तिथि दर्ज करके अपनी जगह से हटी जा रही थी. उसके बाल आज सबसे ज्यादा अच्छी तरह गुंथे हुए लग रहे थे. आज उसने अपने बालों में तारनुमा काले रंग का हेयर बेन्ड माथे के ऊपर के बालों पर लगाया था, जो उसके काले बालों में ग़ुम होता सा लग रहा था. उसके चेहरे का निखार आज अपने चरम पर था, और उन सब पर भारी थी, उसके चेहरे से जा चुकी उदासी.
मैंने उसे अपने पास बैठने के लिए सही तरीके से जगह दी . अपने स्टूल को थोड़ा बाँई तरफ खिसकाते हुए उसकी तरफ ध्यान से देखा और फिर अपने स्टूल पर बैठकर एक लम्बी आह भरी साँस खींचते हुए आँख बंद कर एक छोटी-सी सोच में मुस्कराते हुए खो गया. मैं दीपशिखा के मुकाबले इतना अच्छा नहीं दिखता था, ऐसे में मेरे दिमाग में बार-बार प्रश्न उठे क़ि क्या वह मुझसे कहीं-न-कहीं आकर्षण महसूस करती है?  कॉफ़ी हाउसेस, बड़े शहरों, बाइक-राइडर्स, डेट्रस, फ्लहर्टिंग-शर्टिंग के बंद कमरों से बाहर आकर ये टीन-ऐज लव-स्टोरी तपती गर्मी में तपती है, बारिशों में भीगती है, लहरों की तरह आपके दिलों के किनारों पर आकर उसे भिगो जाती है । वो खामोश भी रहती है और बहुत कुछ बोल भी जाती है.......

बड़े सदस्य बंदरों के शत्रु थे ।

सर्दी की एक दोपहर की गुनगुनी धूप में बंदरों का एक समूह पप्पू की छत पर सुस्ता रहा था । घर के लोग सब बाहर गए हुए थे इसलिए छत खाली थी सो इन बंदरों ने वहाँ डेरा जमाया हुआ था । कुछ छोटे बंदर यहाँ वहाँ उछलते कूदते खेल रहे थे । इनमें मंकी बंदर भी था । यह नाम उसे पप्पू ने दिया था । पप्पू उस घर के मालिक का बेटा था और पास की प्राथमिक पाठशाला में पढ़ता था । पप्पू से जब उसका सामना होता था वह उसे मंकी कह कर बुलाता था । वह कभी अभी उसे कुछ खाने को भी देता था ।
पप्पू के घर के बड़े सदस्य बंदरों के शत्रु थे । वे जब भी उन्हें छत पर या घर के आस पास देखते पत्थर या लाठी दिखाकर डराते और खदेड़ कर भगाते थे । लेकिन इसमें उनके अकेले का दोष नहीं था । बंदरों की आदत थी कि खुले में किसी का कोई सामान जैसे बर्तन कपड़ा इत्यादि पा जाते तो उठा कर भाग जाते । फिर लोगों को अपना सामान वापस पाने के लिए उनके पीछे भागना पड़ता था ।
 ये असल में बंदरों की चाल थी । जब वो किसी का कोई सामान उठा ले जाते वो दूर नहीं जाते वल्की छत कि मुंडेर पर या आसपास के पेड़ों पर चढ़ जाते और वस्तु के मालिक को दिखा दिखा कर चिढ़ाते । लोग सामान वापस लेने के लिए रोटी का टुकड़ा ,चना या अन्य कोई खाने कि चीज इनकी ओर फेंकते तो वे सामान छोड़ देते और खाने कि चीज कि ओर लपकते । लोग अपना सामान ले लेते । ये आए दिन होता था । खाना न मिलने पर वो लोगो को ख़ूब छकाते और कपड़ा तो दांतों से फाड़ ही डालते थे । तब मनुष्यों और इनके बीच कटुता बढ़ जाती । अपितु ये स्थिति कम ही आती । लोग नुकसान से बचने के लिए जल्दी ही उन्हें खाने की वस्तु दे देते थे। वैसे तो आसपास के बाग बगीचों ,खेत खलिहानों से भी उन्हें भोजन उपलब्ध था लेकिन इन्सानों के साथ आँख मिचौली का अलग मज़ा था । बच्चों को डराने ,चिढाने और उनके साथ खेलने में भी बड़ा आनंद था । हालाकि उनसे बच के भी रहना होता था । कुछ बच्चे अकारण भी उनके पीछे पड़ जाते और पत्थर भी मारते थे । फिर भी दिन मज़े के थे।
 गाँव मेँ अभी टेलीवीजन नहीं पहुंचा था । केबल टीवी की आमद अभी दूर थी ।
 तभी एक दिन पता चला गाँव मेँ टीवी आ गया। दूसरे दिन मुखिया के घर टीवी आ गया । मकान की छत पर टीवी एंटीना लग गया । बंदरों के लिए ये नयी और कौतूहल जनक वस्तु थी । छत खाली होते ही मंकी बंदर और उसके समूह के छोटे बड़े सदस्य वहाँ पहुँच गए । सभी एंटीना देख कर उत्सुक और उत्तेजित थे । बच्चों को डांट कर उसके पास जाने से मना किया गया था । मंकी बंदर का चाचा ,जो समूह का सबसे स्मार्ट बंदर था आगे बढ़ा । पहले उसने हाथ से छूकर देखा फिर दाँत से काटकर देखा । जब ऐसा करके उसे कुछ न हुआ तो उसकी हिम्मत बढ़ गयी और स्वभाव बस वो उसे हिलाने लगा और फिर उससे लटक कर झूल ही गया । तभी मुखिया का लड़का एक डंडा लेकर छत पर चढ़ आया और बंदरों की तरफ मारने दौड़ा। सारे बंदर भाग खड़े हुए । कुछ कूदकर पड़ोस की छत पर चले गए और कुछ पास के पेड़ पर चढ़ गए । लड़का एंटीना को ,जो एक तरफ झुक गया था ठीक करके चला गया ।
 कुछ ही दिनों में गाँव के घर घर में टीवी आ गये । मकानों की छतों और खपरेलों पर वैसे ही एंटीने लग गए । कुछ ही दिनों में गाँव के माहौल में कुछ बदलाव आया। मंकी और उसके साथियों को लगने लगा था कि कुछ अजीब घट रहा है ।
 शाम होते ही गली बाज़ार मुहल्ले खाली से हो जाते । लोग अपने घरों में दुबक जाते । बच्चे पहले जैसे गली मुहल्ले में या छतों पर धमाचौकड़ी नहीं मचाते उनके पीछे भी नहीं भागते । मंकी बंदर का दोस्त पप्पू भी रोटी लेकर उससे मिलने छत पर नहीं आ रहा था ।
दिन मायूसी में गुजरने लगे
 ऐसे ही एक रोज गाँव सुनसान था । मंकी बोर हो रहा था । उसने पप्पू के घर कि बैठक के रोशनदान में झांक कर देखा । टीवी पर क्रिकेट का खेल चल रहा था । पप्पू कि माँ को छोड़ कर घर के सभी सदस्य टीवी के सामने बैठे खेल देख रहे थे । उसने कुछ और घरों का भी जायजा लिया । सब जगह टीवी पर वही खेल चल रहा था और लोग टीवी के सामने बैठे थे । मंकी का मन नहीं लग रहा था । वो पप्पू कि छत पर जाकर अकेला ही बैठ गया बड़ी ऊबन हो रही थी ।
तभी उसे कुछ याद आया । जब उसके चाचा ने मुखिया के टीवी एंटीना को हिलाया था तो मुखिया का लड़का तुरंत छत पर आगया था । उसे कुछ सूझा । काम थोड़ा जोखिम भरा था लेकिन उससे रहा नहीं जा रहा था ।
उसने अपने सारे दोस्तो को इकठ्ठा कर एक गुपचुप मीटिंग की और सबको वैसा करने को राजी कर लिया जैसा उसके दिमाग में विचार आया था ।
अगली शाम मंकी बंदर और उसके बहुत से साथी मोहल्ले की छतों पर चढ़ गए जहां एंटीने लगे थे । सभी लोग घरों के अंदर टीवी देखने में व्यस्त थे । मंकी पप्पू की छत पर था । उसने एक चीख की आवाज़ निकाली और टीवी एंटीना पर चढ़ गया और उसे झकझोरने लगा । ये सभी बंदरों के लिए संकेत था । सभी एंटीनाओ पर चढ़ कर झूल झूलकर उन्हें हिलाने लगे । थोड़ी देर वो एसा कर के भाग कर आस पास के पेड़ों पर चढ़ गये और वहाँ से मोहल्ले का नजारा देखने लगे । 
 उन्होने देखा कि कुछ लोग घरों से बाहर आये । कुछ लोग ऊपर जाकर एंटीना ठीक करने लगे । कुछ लोग बाहर आकर आपस में कुछ बातचीत करने लगे । कुछ बच्चे बाहर निकल कर खेलने लगे । कुछ बच्चों ने उन्हें देख लिया और बंदर बंदर कहकर चिल्लाने लगे । थोड़ी देर के लिए ही सही मोहल्ले में रौनक हो गयी । मंकी बंदर और उसके साथियों को इससे बहुत मज़ा आया । 
अब तो जब भी वो बोर होते एंटीने हिला कर भाग जाते । इन्सानों को छेडने का एक नया जरिया उन्हें मिल गया था ।

अन्धे को आखें और प्यासे को पानी मिल गया हो ..?

बहुत दिनों बाद मिले थे, मिले क्या थे समझिये जैसे अन्धे को आखें और प्यासे को पानी मिल गया हो! इतने दिनों बाद उनसे मिल कर और उनकी हालत देख कर दिल भर आया! पुरानी प्यास फिर जग गयी और मुझे उनसे अपनी पहली मुलाकात याद आ गयी!
 वो भी क्या दिन था, जब यों ही अपनी पत्नी की खरीदारी के बीच मै पत्नी को बेहद नापसन्द एक सब्जी की तरह इधर उधर देख रहा था! (वैसे भी कितने लोगों की हिम्मत होती है, बीवी की खरीदारी के बीच चूं चां करने की)!
मेरी किस्मत का जोर था तभी तो एक दुकान पर उनको देखते ही मेरा दिल जोर जोर से धडकनें लगा, पर बीवी की तेज टेढी नजर को देख कर दिल के अरमां जैसे प्रकट हुये थे वैसे ही गायब हो गये!
 पर पुराना प्यार और पुराना मर्ज जल्दी पीछा नहीं छोडता, कई दिन की जद्दोजहद के बाद आखिर सबसे लड झगड कर हम उनको साथ लेकर घर आ ही गये! अपनी सौतन को देख कर बीवी आग बबूला हो गयी, पर वो मेरी दो वक्त की रोटी से ज्यादा कुछ छीन नहीं पायी!
 हम उनको अपनी बाहों में लिये वक्त गुजारनें लगे, और घर वालों का गुस्सा उबाल खाता रहा! किसी नयी नवेली के लिये इतना प्यार ठीक था, लेकिन अब तक उनको घर आये हुये काफी वक्त हो चुका था, पर हमारा जुनून कम ही नहीं हो रहा था!
घर वालों ने आखिर उनके लिये हमारी टक्कर का एक आशिक ढूढ निकाला, जिनको धीरे धीरे चिढ कर हम 'चाटूजी' कहने लगे, शुरू शुरू में हमें बडा अच्छे लगे! एक दिन कई कसमें वादे देकर 'चाटूजी' ने उनको हमसे एक रात के लिये उधार मॉग लिया! बीवी की चुभती निगाहों से बचने के लिये हमने दिल पर पत्थर रख कर उनको 'चाटूजी' को सौंप दिया! 
एक दिन तो क्या जब महीनों तक वो वापस नहीं आयीं, तब हमको सारी चाल समझ आ गयी, और एक दिन बीवी और घर वालों से हजार झगडे कर के हम उनको बडी बुरी हालत में वापस ले आये! अरे अरे अरे, आप उनको अपनी 'दूसरी भाभीजान' ना समझें, वो मेरी सबसे प्यारी किताब है, जिसको मैनें कवर चढा कर फिर पहले जैसा सुन्दर बना लिया है, पर अब मैं उसको किसी को भी नहीं दूंगा!!! आपको भी नहीं...

Friday, 1 May 2015

वर्षा की बूँदों की झनका

कुछ मिलने, कुछ होने की कामना का अंत
 कर वासना का कर विसर्जन
 सुन पा रही हूँ प्रकृति के कण-कण का संगीत
 सूखे पत्तो की मीठी राग
 फूलो की पंखुड़ियों का थरथराना
वर्षा की बूँदों की झनका
 अंतस के गीत
इस तरह
वाक्यों और शब्दों के बंधनों से मुक्त
 अक्षर बन जाती हूँ मैं
 और पहुंच जाती
 उस विराट उर्जा के पास
 घुल जाती हूँ सृष्टि के प्रत्येक परमाणु में 
यही मेरी नियति, प्रारब्ध और आध्यात्म है।

कली ने पखुडियाँ खोली

रूह को भी उसका एहसास न हुआ जिस्म समझ नहीं पाया आँखे देख न सकी बस उसका होना हमारे होने से टकराया और हमारा होना न होना होकर रहा गया I मानो रूह ने साथ छोड़ा हो जिस्म का I ऐसा ही होता है प्रेम किसी अनजाने से गाँव की पगडंडी से चलता हुआ एक उदास घर में एक उदासी से मिलता है , फिर आदान प्रदान होता है ' शेखर एक जीवनी" या 'गुनाहों का देवता' का और रात भर बारिश होती है कहानी भींगती है I ठिठुरी हुई लम्बी रातों में दो तारे बारी - बारी से जागते हैंI कही दूर किसी सिसकी का जवाब होता है तेरे नाम और तेरे ध्यान की कश्ती से मैं दरिया पार कर लूँगा .ऐसा ही होता है प्यार चाहे तीन रोज का हो या तीन सौ पैसठ दिन का I किसी ने आवाज दी जिन्दगी मुस्काई कली ने पखुडियाँ खोली और उदासी ढल गई .

नृत्य "सृजन और विनाश की एक ऐसी स्पंदनकारी प्रक्रिया है ?

भौतिक शास्त्र के अनुसार गति और लय किसी भी पदार्थ का आधारभूत गुण है हम सभी इस जगत में एक लय में जीते है और प्रकृति के साथ उस लय में उसके नृत्य में शमिल होते है । यह नृत्य "सृजन और विनाश की एक ऐसी स्पंदनकारी प्रक्रिया है जहां केवल पदार्थ ही नहीं बल्कि सृजनकारी एवं विनाशकारी ऊर्जा का अंतहीन प्रतिरूप शून्य भी जगत नृत्य में हिस्सा लेता है । इसको आप हिन्दू धर्मग्रन्थो में शिव के नटराज छवि के प्रतीक रूप में देख सकते हैं ।
ये रचना कविता , गीत आदि कि तरह है पर एक विज्ञान है जिससे जगत का प्रत्येक पदार्थ संचालित होता है । 
लेकिन ये लय पूर्ण होती है शक्ति से क्योकि शिव मृत है एक शव , प्राण फूंकने वाली स्वर ध्वनि शक्ति के बिना जीवन संभव नहीं शिव की शक्ति तो देवी है उनका बल उनकी स्त्रैण उर्जा उनकी दिव्य क्रीड़ा उनकी माया का कारण और प्रभाव दोनों हैं । शिव जिस उर्जा को अपने तप में प्रयोग करते हैं शक्ति उन सभी क्रियाओं को धारण करती है । हमारी पुरानी कथाएं हमें जटिल भले ही लगे पर उन्हें पढ़ कर हमें स्त्री- पुरुष के समाकृति रूप की गहरी समझ और लैंगिकता दोनों का व्यापक स्वर बोध होता है ।

जिन्दगी लहर थी

जिन्दगी लहर थी आप साहिल हुए,ना जाने कैसे
 हम आपकी दोस्ती के काबिल हुए ,
ना भूलेंगे उस हसीन पल को जब आप
हमारी छोटी सी दुनिया में शामिल हुए