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Thursday, 27 August 2015

मां हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने

मेरे बचपन के गीतों में
तुम लोरी और कहानी में
तुम मुझमें हर पल हंसती हो
मैं तेरी जैसी ही दिखती हूं

वो दिन जब तुम मुझको ओ मां
गलती पर डांटा करती थी
फिर चुप जाकर कमरे में उस
खुद ही रोया करती थी मां

तुम पहला अक्षर जीवन का
तुम मेरे जीवन की गति हो
खुली आंखों का सुंदर स्वप्न
दुनिया में मेरी शीतल बयार

 मैं तेरी छाया हूं देखो
तेरे जैसी ही चलती हूं
तेरे जैसी ही भावुक हूं
तुम जैसी ही रो देती हूं

अपने आंचल की ओट में मां
हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने
औरत होने का दंश झेलकर
अभागन कहलाकर

मेरी आजादियों पाबंदियों 
और दहलीजों में तुम हो पर मां,
नहीं पूजूंगी तुम्हारी तरह जीवन भर 
किसी पत्थर दिल को अपना राम बनाकर

कुएं का पानी हर मौसम में

गांव की झोपड़ियों के बीच
एक कुएं का पानी हर मौसम में
सबकी प्यास बुझाता है
तृप्त चेहरे देख, विचित्र संतोष उसमें ‘जीवन’ भर देता है।

लगभग न दिखने वाले अस्तित्व में भी
अपनी सूखती धमनियों से
निचोड़ कर तमाम जलराशि
उस गांव की छोटी-छोटी बाल्टियों में भर देता है

कुएं की डाबरों में सिमटी जलराशि ने
जैसे कर लिया हो गठबंधन
धरती की अथाह जलराशि से
कि वो सूखकर भी खाली नहीं हुआ है

गांव के घरों की ढिबरी की रोशनी
नहींं पहुंचती उसके अंधेरे वर्तमान तक
लेकिन वह हर दिन सूखते हुए भी
सींच रहा है सैकड़ों जीवन

कोई अभिलाषा शेष नहीं है
उम्मीद कोई पैदा नहीं होनी है अब
उसे मालूम है अपना अंजाम पर उससे पहले 
वह निभा रहा है कर्त्तव्य धरती पर ‘जीवन’ कहलाने का

मेरे बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो

मेरे बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो
खुद से दूर भेजना चाहते हो
अपने आंगन की लाडली को
किसी को सौंप देना चाहते हो

मेरे प्यारे बाबा ऐसा वर ढूंढो
जो मेरा हाथ थामकर चले
सात जन्मों के बंधन नहीं मानती मैं
पर यह जन्म उसका और मेरा साझा हो

मेरे हिस्से की धूप-छांव
साथ खड़े रहकर महसूस करे
पर ऐसे वर से मत मांधना बंधन मेरा
जो किसी के साथ कभी खड़ा ही न हुआ हो

जो अपनी शान और अस्तित्व को
थोपकर मुझे जड़ कर दे
मत देना मेरा हाथ उसके हाथों में
जो मेरी सरलता को ब्याहकर खरीद ले

जो प्रेम का मतलब न जानता हो
उससे प्रीति का संबंध मत लगाना मेरा
कि कुंद कर दे वो मेरे भीतर की स्त्री का हृदय
कठोरता के लबादे से ढंक दे कि मैं उस जैसी ‘सभ्य’ दिखूं

मेरी चंचलता को अपमान कह दे
जो मेरी शरारतें जिसके समाज में असभ्य लगें
मत ब्याहना ऐसे महलों में रहने वाले से
जो आपकी परवरिश का उपहास करे

छोटी-छोटी खुशियां बटोर कर
आंचल मैं फैला दूं तो भर दे जो
चांद-सितारों की चाहत नहीं मुझको
ब्याहना उससे जिसकी आंखों में नींद न आए मेरे रो देने पर

वर वही खोजना बाबा
जो मेरा देवता बनने को दबिश न दे
मेरा आधा हिस्सा बनकर जिए मुझमें
कि उसके या मेरे प्रेम पर ‘हमारा’ हक हो

चली जाऊंगी उससे ब्याह करके
जो मुझे मेरे हिस्से के आकाश को चूमने दे 
जो बांट ले मेरे जनम भर की रातें-दिन, सुख-दुख 
मेरे जीवन के शब्दकोश से मिटा दे अकेलापन 
बाबा ऐसा वर ढूंढो।

Wednesday, 26 August 2015

मां छांव तो पिता वो बरगद का पेड़ हैं

मां अतुल्य है जीवन की साक्षी है
लेकिन पिता बिना मां की परिभाषा कहां बन पाती
मां छांव तो पिता वो बरगद का पेड़ हैं
जिसकी छत्रछाया में मां हमें पालती है
 
मेरे पिता, बचपन में आपकी फटकार के संग
मैंने आपका दिल धड़कते महसूस किया है
पर मां की डांट के बाद आपका प्यार
मन के कोनों में प्रकाश भरता रहा है

आप हैंं तो जीवन सुंदरतम है
आपके होने से ही आंखों में इतने रंग हैं
आपका होना ही मेरा खुद पर विश्वास है
मेरे जीवन के कल्पतरु हैं आप पिता

जीवन के तमाम विषाद पीकर
हर दर्द को अपने सीने में समेटकर
 आपने दी हर मुश्किल को चुनौती
कि आज मेरी सफलताएं आपसे ही हैं

मेरी उपलब्धियों पर मुस्कुराते आप
मेरी विफलताओं पर अब कुछ नहीं कहते
नहीं, इतना बड़ा तो नहीं होना था मुझे
आप ही मेरे नायक हो, कुछ सवाल तो किया करो

आपका कुनबा बढ़ रहा है लेकिन
इस वटवृक्ष की जड़ें आप ही हो
कि आपकी गोद में सिर रखकर
अब भी वक्त बिताना अच्छा लगता है,

जी चाहता है तोड़ दूं दीवार घड़ी की सुइयां
कि आप बूढ़े नहीं हो सकते कभी
आपकी निरंतरता मेरी रगों में है
मैं दुनिया में आपका ही प्रतिरूप हूं,

आपके होने से ही मैं हूं पिता
आपका कभी न होना कल्पना से भी परे है
इन आंखों में सपने भरने वाले पिता
मैंने आपके बिना दुनिया सोची नहीं अब तक

मेरे मन के जीवट योद्धा 
जागो कि तुम ढले नहीं, बस थक गए हो 
मैं हूं तुम्हारी आत्मशक्ति देखो मुझे 
तुम्हारी आत्मा का अंश हूं, मुझमें जवान होते पिता

औरत का नाम जेहन में आते ही

औरत का नाम जेहन में आते ही
एक कोमल आकर्षक काया
आंखों के सामने सजीव हो उठती है
जिसका भाग्य ही जैसे उसकी सुंदरता हो

कवियों ने उसे हिरनी सा बताया
तो चित्रकारों ने प्रकृति सा मनोरम
गीतों में वह झरने की कल-कल है
तो स्वर में कोयल से भी मीठी

किसी का जीवन सार बनकर मन में बसाई गई
तो किसी की प्रेयसी बनकर प्रेम के उपमानों से सजाई गई
पर इनमें से कभी किसी रूप में क्या
उसकी सुंदरता से हटकर कुछ वंदनीय हो सका

वह कुरूप रहकर कब प्रेम की पात्र बनी
उसके सुंदर अंतस को किसी ने यूं सराहा क्या
इस समाज में जब तक वह खूबसूरत है
शायद हर गजल, हर गीत की जरूरत है

स्त्री चित्रण उसके लावण्य के बिना अधूरा लगता
है क्या सफलता है यह औरत की, जिस पर वह इतराती रही
या उसे सौन्दर्य के पाश में बांध, प्रेम के आडंबर से घेर
साजो-सामान बनाने के पीछे की साजिश

विडम्बना ही है कि जीवन के हर रूप में शामिल होकर भी 
वह मानव या प्रकृति तुल्य कम सराही, अपनाई गई 
उसका तेज, उसकी ममता, उसका त्याग या प्रेम नहीं 
उसकी मनोहरता ही उसके होने को साबित करती रही

होठों पर लाली, माथे पर बिंदी सजाये

दुनिया के भगवान कहे जाने वाले सूरज का
इस तंग जगह से कोई वास्ता नहीं रहता
नहीं डालता कभी रोशनी इन अंधेरी गलियों पर
कि वो भी शुचिता की परंपरा को तोड़ नहीं सकता

होठों पर लाली, माथे पर बिंदी सजाये
कतार में खड़ी ये सुहागिनें नहीं
पति नहीं उन्हें तो ‘किसी का भी’ इंतजार है
जो नीलामी की गली में उनकी भी बोली लगाएगा

हर दिन की कमाई या पूंजी कह लो
जिस्म की ताजगी पर ही जीवन का दारोमदार है
‘सभ्य’ लोगों की वासना को मिटाती हर रोज
हवस की ड्योढ़ी पर कुर्बान होना ही नियति है उनकी

श्मसान से भी ज्यादा लाशें
इन बदनाम गलियों में ‘जिंदा’ हैं
इनकी मौत या जिंदगी दोनों ही क्योंकि
कभी तरक्कीपसंद समाज में अहमियत नहीं रखती

सपने देखना ‘काम’ की पाकीजगी पर सवाल है
आजादी का मतलब माग लेना मौत है
उसका हक है कि वह परोसी जाए
और अधिकार है उसके ‘गोश्त’ की अच्छी कीमत

मौत से खौफ नहीं उसे लेकिन
पल-पल मरकर जिंदा रहने से डरती है
बेशर्म होने का नाटक करते-करते 
लजाने की खूबी चुक गई कब की 

पत्नी, बहन, बेटी और मां इनका पर्याय 
वह जानती है लेकिन वह इनमें से नहीं 
क्योंकि अनमोल हैं ये और उसकी 
तो हर दिन कीमत चुका दी जाती है...

Monday, 24 August 2015

लब से लबों की पहली मुलाकात लिखी थी |

शाम और सवेरा मैंने दिन औ रात लिखी थी,
ख़त में रूमानी प्यार की इक बात लिखी थी |
इक हाथ में अलफ़ाज़-ए-दिल इक हाथ में कलम 
लब से लबों की पहली मुलाकात लिखी थी | 
ताउम्र इबारत सी निभाती रही उसे , 
चाहत ने जिस्म-ओ-रू पे वो सौगात लिखी थी | 
इस पहलू मुहब्बत रही उस पहलू खुदाई, 
आशिक की जुबां ज़ीस्त की औकात लिखी थी |
यादों की शाख पर वो गुल जवां है मुसलसल ,
इतनी वफ़ा से तूने जो बरसात लिखी थी | 
रुखसार माहताबी थे सूरत कोई कंवल, 
उस रहनुमाई ने भी करामात लिखी थी | 
मेरा हमराह भी है वो वही मेरी कही ग़ज़ल, 
हर सू उसे ही सूरत-ए-हालात लिखी थी |

Sunday, 16 August 2015

गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष

आज गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष
सूना है, उदास सा अकेला
कल तक जो उसकी गोद में
खेला करते थे, वे बच्चे
आज बड़े हो गये हैं

धूल भरे उलझे बालों की
चोटियां गूथती वो गुड़िया जैसी थी
और उसे मारता, दुलारता वो
नन्हा पर शैतान सा बच्चा

परदेश गए थे जब दोनों तो यहीं पर
अपने दोस्तों से मिलकर
फफक उठे थे सारे और फिर
वापस आने का वादा कर गए

उनकी राह देखते आज बरगद का पेड़
अपनी लटें बिछाए बैठा है पर
उसकी जवानी के दिनों के बच्चे
जवान हो गए है, फिक्र में खो गए हैं

अब उनकी दुनिया
बहुत बड़ी हो चुकी है
शायद बरगद से भी बड़ी जहां,
खेलकर वे बड़े हुए थे

और जर्जर होता वृक्ष इस आस में 
किसी दिन ढह जाएगा कि 
शायद वापस आकर कभी परदेश से 
यहां तक पहुंचेंगे उसकी आंखों के तारे

गुलाम बनकर जिओगे तो

गुलाम बनकर जिओगे तो.
कुत्ता समजकर लात मारेगी तुम्हे ये दुनिया
नवाब बनकर जिओगे तो, 
सलाम ठोकेगी ये दुनिया…. 
“दम” कपड़ो में नहीं, जिगर में रखो…. 
बात अगर कपड़ो में होती तो, सफ़ेद कफ़न में, 
लिपटा हुआ मुर्दा भी “सुल्तान मिर्ज़ा” होता.

अब बहू हो चुकी है वह अल्हड सी लड़की

वह अल्हड सी लड़की अब बहू हो चुकी है

नर्म हाथों से वह रोटियां उठा लेती है
जिसे चिमटे से छूने में भी डरती थी
बाबा की राजकुमारी
अब पति के इशारों पर चलती है

चावल से कंकड़ों को बीनती
सिल-बट्टे पर मसाले पीसती
माथे पर आए पसीने को पोंछती
मुस्कुराती है हर आदेश पर

किसी का खाना किसी का बिछौना
किसी का पानी किसी का दाना लिए
दिन-रात घर में डोलती
आमदनी और खर्चे को जोड़ती

हर पल फुदकती, चहकती वो लड़की
सहनशील, संस्कारी बन गई है
बोलना मना है उसे किसी के बीच
अपनी राय लिए सो जाती है हर रात

सुबह शाम तो होती है रोज पर
रोटियों को गोल-गोल घुमाते
बच्चों के टिफिन लगाते
झूठे बर्तन मांजते निकल जाती है

वह हंसती है क्योंकि
उसके पति और बच्चे खुश हैं
उसकी खुशी के मायने बदल जो चुके हैं
वह अपने लिए नहीं उनके लिए खुश होती है 

वह भूल चुकी है कि चारदीवारी से बाहर
दुनिया कैसी दिखती है, सुबह कैसी लगती है 
वह भूल चुकी है अपना अस्तित्व, अपनी पहचान
उसे नहीं कहलाना बाबा की गुड़िया या मां की बिटिया 

वह अल्हड़ सी लड़की अब बहू हो चुकी है।

Sunday, 9 August 2015

रोज नए-नए खूबसूरत दोस्त बनाने की आदत है,

हम सब फलां मोहल्ले के काबिल ठलुए हैं। हमें अपनी काबिलियत पर जरा भी शक नहीं लेकिन क्या करें मोहल्लेवाले हमें समझने की कोशिश ही नहीं करते! देखिए, यह हमारी काबिलियत का ही असर है कि हम सब आज आपके संग आपके आंदोलन के बीच खड़े हैं। एक तीर से दो-दो निशाने साध रहे हैं। एक तरफ आपके आंदोलन का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और दूजी तरफ अपनी ठलुए की इमेज से बाहर आने की कोशिश में लगे हैं। गली के नुक्कड़ पर तांक-झांक करने से तो बेहतर है कि थोड़ी-बहुत अन्नागिरी ही कर ली जाए!
सच्ची बताएं अन्ना अब हमारा दिन पहले से कहीं बेहतर गुजरने लगा है। पौ फटते ही हम आंदोलन में जुट जाते हैं। हमारी टीम में किसी के जिम्मे चीखना-चिल्लाना है, तो किसी के जिम्मे व्यवस्था और सरकार को कोसना। और जिन्हें हर रोज नए-नए खूबसूरत दोस्त बनाने की आदत है, वे सिविल सोसाइटी के बीच रहने-उठने का जिम्मा संभाले हुए हैं। आजकल उनकी तो समझिए निकली हुई है। कल तलक जो दोस्त खूबसूरत चेहरों को देखकर बस आह ही भरकर रह जाते थे, आज वे उन चेहरों के बीच ऐसे घुल-मिल गए हैं, जैसे उनकी उनसे बरसों पुरानी जान-पहचान हो। वाकई अन्ना ये सिविल सोसाइटी के लोग भी क्या मस्त-मौला किस्म के होते हैं। अबसे हमने ठान लिया है कि हम भी सिविल सोसाइटी के साथ ही उठा-बैठा करेंगे। अभी तो बहुत कुछ उनसे सीखना बाकी है हमें।
हमने आजादी का आंदोलन तो खैर नहीं देखा। लेकिन आज जब आपके आंदोलन को देख व उसके बीच रह रहे हैं, कसम से बढ़ा ही मजा आ रहा है हमें। हमें नहीं मालूम था कि आंदोलन इत्ते खूबसूरत भी हुआ करते हैं। मोहल्ले के किसी भी कोने पर खड़े हो जाओ पांच-सात लोग आपके आंदोलन का समर्थन करते हुए मिल ही जाते हैं। यहां कोई अन्ना की टोपी लगाकर समर्थन कर रहा है, तो कोई हाथों में तिरंगा थामे। सरकार और पुलिस तो एक कोने में खड़े बस तमाशा देखने को मजबूर हैं।
चूंकि हम ठलुओं का एजूकेशन में हाथ जरा तंग है, इस कारण हम जनलोकपाल बिल के क ख ग को समझने में असमर्थ हैं लेकिन कोई बात नहीं, भीड़ संग भागना हमें अच्छे-से आता है। दरअसल, इस वक्त तो हमें अपनी इमेज का ख्याल है और इसे बनाने में हम कुछ भी करेंगे। एक हम ही क्यों आपके आंदोलन के बहाने ऐसे न जाने कितनों को हम देख चुके हैं, जो इन दिनों अपनी बेईमान छवि को ईमानदार बनाने में जी-जान से जुटे हैं। भला बहती गंगा में हाथ धोने में किसे मजा नहीं आता! फिर गंगा जब अन्ना व सिविल सोसाइटी की हो तो बात ही क्या है।
न न अन्ना आप चिंता मती करो। हम ठलुए अपनी नासमझदारी को भी समझदारी में बदल लेते हैं। आप तो बस रामलील मैदान में डटकर संघर्ष करो। हम आपके साथ हैं।
वैसे तकनीक की इस अलबेली दुनिया में आधे से ज्यादा संघर्ष तो सोशल नेटवर्किंग के जरिए ही हो रहा है। कोई फेसबुक की दीवारों के रंग-रौवन में लगा है, तो कोई टि्वटर पर चहचहा रहा है। यानी सब के सब अन्ना के आंदोलन को हिट करने-कराने में व्यस्त हैं। हम ठलुए लकी हैं कि हमारा सहयोग भी आप ही को जा रहा है।
अन्ना अबकी दफा यह जंग थमनी नहीं चाहिए। गांधी भी मंगल पर बैठे-बैठे आपको आर्शीवाद दे रहे हैं। और तो और समस्त देवी-देवता भी आपके इस इंडिया अगेंस्ट करपशन के प्रयास से अति-प्रसन्न हैं। समूचे ब्रह्मांड में आपकी जयजयकार हो रही है। सिविल सोसाइटी का किया कमाल अब जाकर अपनी रंगत दिखा रहा है। तो मान लें कि अन्ना-क्रांति का रंग जम गया है। चाहें तो मिस्र वाले भी अन्ना एंड कंपनी से क्रांति व आंदोलन करने की सलाह ले सकते हैं।
तो अन्ना अभी हम ठलुए आपसे विदा लेते हैं काफी सारा चिखना-चिल्लाना बाकी रह गया है। अब तो दूसरे मोहल्ले के ठलुए भी हमारे साथ आ चुके हैं। अन्ना आप ऐसे ही चहकते रहो हमारा पूरा का पूरा ग्रुप आपके साथ है। जय अन्ना। जय ठलुआ बिरादरी।

Saturday, 8 August 2015

करेक्टर जितना ढीला होगा समाज आपके प्रति दृष्टिकोण उतना ही लचीला बनेगा।

करेक्टर का ढीला होना अब कोई संगीन मुद्दा या जुर्म नहीं रह गया है। लोग जमकर अपने करेक्टर को ढीला कर व करवा रहे हैं। दरअसल, करेक्टर जितना ढीला होगा समाज का आपके प्रति दृष्टिकोण उतना ही लचीला बनेगा। आप हर कहीं आसानी से जान-पहचान लिए जाएंगे। आज हमारे समाज में छह में से साढ़े पांच लोगों का करेक्टर किसी न किसी वजह से ढीला ही है। और मजे की बात यह है कि वे बेहद मस्ती के साथ अपने ढीले-ढाले करेक्टर को इंजॉय भी कर रहे हैं। गए वो दिन जब करेक्टर का ढीला होना देश, समाज और परिवार में बेहद बुरा समझा जाता था। ढीले करेक्टरवालों से सभ्य लोग बात तक करना पसंद नहीं करते थे। समाज में एक तरह से अछूतों जैसा व्यवहार उनके साथ किया जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। वक्त बदल गया है। अब ढीले करेक्टरवालों को ज्यादा चरित्रवान माना जाता है। बुद्धिजीवि उन पर कलमें तोड़ते हैं। मीडिया दिन-रात उन पर बहस चलाता है। अब तो पढ़े-लिखे मां-बापों ने अपने बच्चों को कुछ न कुछ करेक्टर के ढीला होने व रखने की हिदायतें भी देना शुरू कर दिया है। आगे चलकर सरकार इसे कोर्स में भी जोड़ सकती है। हमारे बीच बहुत तेजी से एक नए तरह का ढीला चरित्र आकार लेने लगा है। क्या नहीं लगता आपको कि यह हमारी उत्तर-आधुनिक सोचों का विस्तार है?
फिल्म रेडी के बाद से तो ढीले करेक्टर ने ऐसा जमकर जोर पकड़ा है कि पूछिए ही मत। मेरे मोहल्ले के न जाने कितने चरित्रवान युवक-युवतियां अब अपने करेक्टर को ढीला करने में जुट गए हैं। वे जल्द से जल्द अपनी कथित 'अच्छे बच्चे' की छवि से बाहर आना चाहते हैं। आपनी जिंदगी को अपने स्टाइल में जीने की हसरत रखते हैं। अगर आप उन्हें ऐसा करने से रोकते या टोकते हैं, तो टका-सा जवाब देते हैं कि जब ए. राजा, कलमाडी, कनिमोझी आदि-आदि अपने करेक्टर को ढीला कर सकते हैं, तो फिर हम क्यों नहीं? हमें हमारे करेक्टर को ढीला करने से हर पल रोका-टोका क्यों जाता है? क्या अपने ढीले करेक्टर के प्रति हमारे अरमान नहीं हो सकते?
आज राजनीति से लेकर साहित्य तक में जिसे भी देख लीजिए हर कोई अपने करेक्टर के स्ट्रेक्चर को ढीला करने में लगा हुआ है। करेक्टर ढीला है एक तरह से मुफ्त की पब्लिसिटी का माध्यम-सा बनता जा रहा है। यानी हींग लगे न फिटकरी, रंग फिर भी चोखा का चोखा।
आप माने या न मानें ढील करेक्टर का सबसे ज्यादा लाभ हमारे नेताओं ने उठाया है।
क्या वक्त आ गया है। समाज भी अब उन्हें ही सफल मानता है, जिनका जितना करेक्टर ढीला होता है। ढीला करेक्टर हमारे बीच ज्यादा समय तक टीका भी रहता है। अब हमारी यूपीए सरकार को ही ले लीजिए। सरकार में तमाम बड़े नेताओं के करेक्टर ढीले होने के बावजूद सरकार मस्त चल रही है। पिछले सात सालों से टिकाऊ है। तमाम हो-हल्ले के बाद भी महंगाई, भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर अपना रूख लचीला ही रखती है। काबिले-गौर यह है कि सरकार के ढीले करेक्टर के खिलाफ जितने भी अनशन या सत्याग्रह होते हैं, सरकार के चरित्र पर कौनऊ फर्क नहीं पड़ता। अन्ना ने अनशन किया। बाबा ने अनशन किया। आठ दिन तलक भूखे-प्यासे भी रहे। हस्पताल तक की यात्रा कर आए। पर सरकार टस से मस न हुई। ऊपर से ताना और मार दिया कि सब नौटंकी है। प्रचार पाने का सस्ता तरीका है। हम अपने ढीले करेक्टर को किसी कीमत ठीक नहीं कर सकते
समझ लीजिए जब सरकार और उसके मंत्री अपने ढीले करेक्टर के प्रति संजीदा नहीं हैं, तो भला आम आदमी क्यों हो? सल्लू मियां ने ठीक ही तो कहा है कि मैं करूं तो साला करेक्टर ढीला है। यह बरसों पुरानी इंसानी फितरत है कि वो कभी अपने गिरेबान में मुंह डालकर नहीं देखता, हमेशा दूसरों के गिरेबानों में ताकता-झांकता रहता है।
कुछ भी हो हमें तहे-दिल से सल्लू मियां का पुनः शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने हमें दबंग की दबंगई सिखाने के बाद अब ढीले करेक्टर के बेहद उम्दा मायने बताए हैं। वैसे भी ढीले करेक्टर की दुश्वारियों का सबब सल्लू मियां से बेहतर कोई नहीं जान-समझ सकता। बावजूद इतने दंद-फंद के सल्लू मियां अपने ढीले करेक्टर को भरपूर इंजॉय कर रहे हैं, यह बड़ी बात है। मैं तो कहता हूं कि हमें अपने करेक्टर के साथ किसी न किसी बिंदु पर ढीला होना ही चाहिए। ढीला करेक्टर सदा सहाय।
फिलहाल, अब अपनी कोशिश तो यही है कि किसी न किसी बहाने अपना भी करेक्टर ढीला हो जाए। कुछ वाद हों। कुछ विवाद हों। करेक्टर के पुर्जे कुछ यहां उछलें तो कुछ वहां। समाज और परिवार के बीच ढीले करेक्टर का कम से कम खिताब तो मिले। देखते हैं अपनी यह दिली-तमन्ना कब तलक पूरी होती है।

Friday, 7 August 2015

क्रांति शब्द से हमें खासा मोह है।

यू नो, क्रांति शब्द से हमें खासा मोह है। बात-बात में क्रांति करने-कहने-लिखने से हम कभी पीछे नहीं हटते। जनता का जहां थोड़ा बहुत समर्थन मिलता दीखता है, हम तुरंत उसे क्रांति में परिभाषित करने बैठ जाते हैं। कभी अण्णा अपनी क्रांति का झंडा लेकर खड़े हो जाते हैं, तो कभी बाबा रामदेव। भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ जिस क्रांति को करने का ये महापुरुष दावा करते हैं, उसे चू चू का मुरव्वा बनते अपन कई दफा देख चुके हैं। क्रांति शब्द को हाईजैक करके नाहक ही उसे बदनाम करते रहते हैं ये लोग। ऐसे छोटे-मोटे आंदोलनों-सत्याग्रहों से अगर क्रांतियां होनी लगीं तो चला गया देश! न न अपन यह नहीं कहते कि आप क्रांति न करें, खूब करें, दिन-रात करें मगर इस बहाने जनता को बहकाएं तो नहीं। सड़क या मैदान में भीड़ जुटा लेने से क्रांतियां नहीं होतीं प्यारे!
बहरहाल, चुनावों का बख्त आते ही क्रांति शब्द की डिमांड कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। हर दल, हर नेता, हर कार्यकर्ता देश और जनता के बीच, अपने वायदों के सहारे, क्रांति करने को ऐसा बेताव-सा रहता है कि बस पूछिए मत। बेशक क्रांति शब्द का महत्व उसे मालूम न हो लेकिन खुद क्रांतिकारी बनने से कभी पीछे नहीं हटता। वो तो बेचारों का बस नहीं चलता, नहीं तो अपनी क्रांति के आगे दुनिया में अब तलक हुई क्रांतियों को वे सिरे से खारिज ही कर डालते!
इधर, नेताओं के बीच चल रही जुबानी-क्रांति निरंतर जोर पकड़ती जा रही है। कभी इस नेता की जुबान क्रांति करने लगती है तो कभी उस की। हर कोई हर किसी की पोल खोलने को तैयार बैठा है। चुनाव में विकास के मुद्दे तो हवा हो गए हैं, जुबान-जुबान के बीच गुल्ली-डंडे का खेल जारी है। और, मीडिया इस जुबानी-क्रांति का भरपूर लुत्फ ले-दिलवा रहा है। अपने-अपने चैनलों पर चार-पांच नेताओं को बुलाकर उनमें जुबानी बहस छिड़वाकर अपनी टीआरपी की चांदी काटने में लगा रहता है बस। अक्सर नेताओं के बीच जुबानी जंग इत्ती तीखी और तेज हो जाती है, लगता है कि सब्जी-मंडी में अपनी-अपनी सब्जियों को बेचने की परस्पर प्रतियोगिता चल रही हो जैसे! इस क्रांति का भी अपना ही आनंद है प्यारे।
अगर देखा जाए तो इसमें दोष सिर्फ नेताओं का ही नहीं है, चुनावों के दौरान फिजा ही कुछ ऐसी हो जाती है कि जुबान स्वयं ही क्रांति करना शुरू कर देती है। अब न पहले जैसा बख्त रहा न पहले जैसे नेता कि कुछ भी कह लिया और चुप्पी साध ली। आज का नेता बयान का जवाब जुबान से देना जानता है। बयान और जुबान के बीच चलने वाली यह जुगलबंदी कब क्रांति में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता। उधर नेता लोग जुबानी-क्रांति में व्यस्त रहते हैं, इधर जनता का मन लगा रहता है। जानते-समझते सब हैं कि नेताओं की यह जुबानी-क्रांति 'पब्लिक स्टंड' से अधिक कुछ नहीं मगर फिर भी मजा लेने में क्या जाता है प्यारे। वैसे भी पांच बरस में थोड़े-बहुत दिन तो इस क्रांति का लुत्फ सबको ही उठाना चाहिए।
खैर, जो भी हो अण्णा और बाबा रामदेव की क्रांतियों के ठंडा पड़ने के साथ इन दिनों अपने नेताओं की जुबानी-क्रांति अच्छा खासा रंग जमाए हुए है। साथ ही सोने पर सुहागा कर रहे हैं उनके अति-क्रांतिकारी घोषणापत्र। इससे जुबानी-क्रांति की जंग और तेज हो गई है। अमां होना दीजिए, इससे किसी को क्या फरक पड़ता है। देश आराम से चल ही रहा है। जनता बिना उफ्फ किए जिये ही चली जा रही है। बुद्धिजीवि सलमान रुशदी के बहाने अपने-अपने बौद्धिक जमा-खर्च को समेटने-बटोरने में लगे ही हुए हैं। हर तरफ बस जुबानी-क्रांति की जंग का ही जोर है। अगर अपन भी दो-चार हाथ इस क्रांति में आजमा लें, तो क्या हरज है प्यारे!

चुनाव के दौरान लुत्फ का एहसास होता रहता है।

अपन तो चाहते हैं कि हमारे यहां चुनाव हर महीने ही होया करें। दरअसल, चुनावों के सीजन में अपन को मिनट-मिनट में सुख के साथ लुत्फ का सा एहसास होता रहता है। चुनाव के दौरान न महंगाई पर बात होती है न भ्रष्टाचार पर तकरार न काले धन का ज्यादा जिकर। बहुत ही दबी जुबान के साथ नेता लोग ऐसे मुद्दों को अपने मुंह लगाते हैं। उसका कारन है न। क्योंकि हमाम में तो... सभी हैं न प्यारे! समझे।
पर अपन किसी भी दल की दुखती रग पर हाथ रखने के मूड में इस बख्त नहीं हैं। इस बख्त तो अपन चुनावी घोषणापत्रों में घोषित घोषणाओं का लुत्फ ले रहे हैं। क्या कमाल के घोषणापत्र हैं सब के सब! घोषणाएं भी ऐसी कि कान सुनते ही शरमा जाएं। जी हां ऐसे 'अद्भूत घोषणापत्रों' पर आंखें नहीं बल्कि कान शरमाते हैं प्यारे। फिलहाल, अपन के तो कान इस बख्त शरमाए से हुए हैं। कोशिश में लगे हैं कि ये अपनी शरम से थोड़ा तो बाहर कू आएं ताकि सुख के साथ लुत्फ के स्वाद को और मजेदार बनाया जा सके।
घोषणापत्रों में से आवाजें आ रही हैं कि छात्रों को कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट आदि-आदि मुफत में दिया जाएगा। उनकी जिंदगियों को नए सिरे और तरीके से संवारा जाएगा। लड़कियों को मुफत में शिक्षा मिलेगी। बढ़िया है। बहुत बढ़िया है। लेकिन अब तलक किसी दल ने यह नहीं बताया कि यह सब जुगाड़ होगी कैसी? घोषणापत्रों की आकर्षक घोषणाएं हकीकत में तब्दील कैसे होंगी? पिछली दफा भी कुछ ऐसी ही घोषणाएं हुई थीं और चुनाव जीतते ही सब की सब हवा में उड़ा दी गईं थीं। कभी-कभी तो लगता है प्यारे कि अपने यहां चुनावी घोषणाएं शायद हवा में उड़ा देने के लिए ही होती हैं!
आलम यह है कि इस बख्त प्रत्येक राजनीतिक दल के भीतर जंग-सी छिड़ी है अपने-अपने घोषणापत्रों को अति-लुभावना बनाने की। सुनने में तो यहां तक आया कि कुछ दलों ने गाय देने का भी वायदा किया है। गनीमत है गाय का ही चुनाव किया शेर, चीते या हाथी का नहीं! नहीं तो बेचारे मतदाता को घणी मुसीबत हो जाती है। नेता जी की जीत के बदले में मिले 'घोषित जानवर' को बेचारा कहां-कहां संभालता फिरता।
सुन रहे हैं यह सब आकर्षक घोषणाएं युवा मतदाता को लुभाने-ललचाने के लिए ही की गई हैं। मगर प्यारे युवाओं का दिल बात-बात पर जैसे मचलता रहता है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि वे ऐसी घोषणाओं के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षित होंगे! वे तो अपने दम पर ही दुनिया को बदलने की चाह रखते हैं। पर उनकी चाह से मिलती-जुलती कोई खास बात तो अभी तलक नहीं दिखी है इन घोषणापत्रों में। अरे कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट तो अब आम-सी चीजें बन चुकी हैं युवाओं के लिए। 
बहरहाल, देखते हैं इस दफा कित्ते युवा घोषणापत्रों की घोषित घोषणाओं पर आकर्षित होते हैं या फिर अपने मन की करते हैं। बस थोड़ा-सा इंतजार और...।

नेता जी के दुख-सुख में साथ निभाना छोड़ दें!


आंसू बेशक नेता जी के निकले थे मगर उन्हें देखकर मन हमारा भी भर आया था। उनका साथ निभाने के वास्ते दो-चार आंसू हमने भी लुढ़का लिए थे। भरी सभा के बीच अच्छा नहीं लगता कि अकेले नेताजी रोएं, हम ठूंठ की तरह यूंही खड़े रहें। आखिर हमारा भी तो कोई फरज बनता है कि नहीं अपने नेताजी के प्रति! बेचारे नेताजी हमारे वास्ते पूरे पांच साल तलक इत्ती कठिनाईयां मोल लें और हम उनके आंसू के साथ अपने आंसू भी न बहा पाएं, तो प्यारे लानत है हम पर। इस नाते हमें जनता होने का कोई हक नहीं। यह भी कोई बात हुई भला, अपनी जुगाड़ लगवाने के लिए नेता जी और उनके आड़े बख्त में बाय-बाय नेता जी। न न ऐसा जुलम कम से कम हम तो नहीं कर सकते।
जरनली, हमारे देश के नेता बहुत स्ट्रांग होते हैं। हर बाधा को बड़ी खामोशी से पार कर जाते हैं। जनता को भले ही इमोसनल कर दें परंतु खुद कभी इमोसनल नहीं होते। लेकिन यहां तो मामला ही कुछ दूजे किस्म का था। एक तो नेता जी को पार्टी से बाहर कर दिया और ऊपर से उनका टिकट भी काट लिया। पता है, पार्टी और टिकट ही तो नेता जी की असली जान होवे है, उसी से उन्हें जुदा कर दो। यह ठीक नहीं है। ऐन चुनावों के बख्त इत्ता सदमा भला नेता जी कैसे बरदास कर पाते, सो रो दिए। नेता जी के रोने में पहली दफा हमने इमोसनल-कम-पोलिटिकल अत्याचार महसूस किया। ऐसा तो कोई अपने दुश्मन के साथ भी न करे है प्यारे।
ज्ञानियों ने ऐसा बताया है कि नेता का रोना देश और राजनीति के वास्ते शुभ संकेत नहीं होता। तमाम प्रकार के बिघ्न बीच में आते हैं। बात ठीक भी है, अपने जन-सेवक को यूं रूलाना भला कहां की अक्लमंदी है! हमें तो अपने नेता जी की हिफाजत व इज्जत हर हाल में करनी चाहिए। क्योंकि वो हैं, तो हम हैं। न जाने उनके कित्ते-कित्ते किस्म के एहसान हैं हम पर और देश पर। अरे भई नेता तो लोकतंत्र की नाक होता है। अपनी नाक का इस्तेमाल वो चुनावों के दौर ही करता है। ऐसे में नेता जी की नाक का गिला होना ठीक नहीं है।
लो खैर यह भी सही रहा कि नेता जी का रोना फजूल नहीं गया। एक प्रमुख दल ने उन्हें सर छिपाने की जगह दे ही दी। साथ ही चुनाव लड़ने का टिकट भी। इसके अतिरिक्त हमारे नेता जी को और क्या चाहिए! पहले जी-जान से उन्होंने उस पार्टी की सेवा की थी, अब इसकी करेंगे। हमें हमारे नेता जी की राजनीतिक प्रतिबद्धता में कोई सक-सुभा नहीं है। राजनीतिक प्रतिबद्धता को स्थापित के ताईं तो हमारे नेता जाने क्या-क्या कर जाते हैं। कृपया, उनकी प्रतिबद्धता पर चुलहबाजी न करें।
हमारे नेता जी की खुसी में ही हमारी खुसी है। अब जाकर हमारे भी आंसू ठहर पाए हैं। सांस में काफी राहत महसूस कर रहे हैं। जनता का पूरा स्पोर्ट है नेता जी को। संघर्ष वो करेंगे, नारे लगाने के ताईं हम हैं ही। अरे, सरम किस बात की यह तो हमारा जनम-जात फरज है। केवल चुनावों के बख्त ही तो हमें देसी से विदेसी ठर्ररे का स्वाद मिलता है। इन्हीं दिनों नेता जी की खास किरपा रहती है हम पर। बताओ तो भला हम कैसे अपने नेता जी के दुख-सुख में साथ निभाना छोड़ दें!

Wednesday, 5 August 2015

हम अपनी यादगार गजल छोड जाएगे

दौलत ना कोई ताजमहल छोड जाएगे
हम अपनी यादगार गजल छोड जाएगे
तुम आज चाहे जितनी हँसी ऊडाओ
मगर रोता हुया तुम्हे कल छोड जाऊगा

Monday, 27 July 2015

जलना ही है दोनों को तो क्यूँ न सूरज हो जाएं।

एक सी सूरत एक सी सीरत एक सा धीरज हो जाएं।
जलना ही है दोनों को तो क्यूँ न सूरज हो जाएं।
बंट जाना ही गर दोनों की तकदीरों का किस्सा है।
आधा अम्बर आधी धरती आधा सागर हो जाएं।

Sunday, 26 July 2015

जिंदगी के जंग में कभी जीत तो कभी हार होती है।

जब गम होता है बर्दास्त के बाहर तो मुस्कुराते है।
जब भी आती है दुश्वारियाँ सामने तो मुस्कुराते है।।
जिंदगी के जंग में कभी जीत तो कभी हार होती है।
जब भी दिखाती है जिंदगी ये अदा तो मुस्कुराते है।।

दिल गदगद हो गया

सुनो!
कल दिल गदगद हो गया
जब देखा तुम्हारी संवेदना का प्रदर्शन
जो हो रहा था बीच चौराहे पर
जिसमे एक मूक जानवर
चाट रहा था तुम्हारे तलुए
और तुम ख़ुशी से झूमते हुए
लगा रहे थे बिस्किटों का अम्बार
जिसे वो कुछ खा रहा था
और कुछ छोड़ रहा थाशायद
उसकी नजर पड़ गयी थीकुछ
बिखरे बालों वाले मासूम
चेहरों परऔर जाग गयी थी
उसकी जानवरी संवेदना
 सुनो!
कल देखा था तुमको
लगाते हुए टकीला का शॉट
उफ़! कितना झूम रहे थे तुम
अपने अधनंगे दोस्तों के साथ
और आजाद हो रहे थे 
तुम्हारे हाथों से वो नोट
जो न जाने कबसे गुलाम थे 
तुम्हारी बन्द तिजोरी के
हाँ ये अलग बात है की
आज ही रामू को
दिया नही था तुमने 
वो 1200 रूपये 
कैलकुलेटर खराब होने के कारण
जो की गिन लिया था उसने
अपनी काँपती उँगलियों पर

सुनो!
आज तुमने किया है उदघाट्न
शहर के बहुत बड़े अस्पताल का
अहा! अब बचेंगी लाखों जिंदगी
इस चमकते और रंगीन शहर की
हाँ ये बात और है की
घर में बूढ़े बाबा की दवाई
पिछले दो दिनों से भूल रहे हो तुम
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Thursday, 23 July 2015

हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु सही,
आओ मुक़ाबला करें ।