शाम और सवेरा मैंने दिन औ रात लिखी थी,
ख़त में रूमानी प्यार की इक बात लिखी थी |
इक हाथ में अलफ़ाज़-ए-दिल इक हाथ में कलम
लब से लबों की पहली मुलाकात लिखी थी |
ताउम्र इबारत सी निभाती रही उसे ,
चाहत ने जिस्म-ओ-रू पे वो सौगात लिखी थी |
इस पहलू मुहब्बत रही उस पहलू खुदाई,
आशिक की जुबां ज़ीस्त की औकात लिखी थी |
यादों की शाख पर वो गुल जवां है मुसलसल ,
इतनी वफ़ा से तूने जो बरसात लिखी थी |
रुखसार माहताबी थे सूरत कोई कंवल,
उस रहनुमाई ने भी करामात लिखी थी |
मेरा हमराह भी है वो वही मेरी कही ग़ज़ल,
हर सू उसे ही सूरत-ए-हालात लिखी थी |
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