Wednesday, 26 August 2015

आंखों में बाजरे से हरे सपने लिए

इस गांव की हवेलियों के पीछे
एक चमारों की बस्ती है
रहती हैं जहां मुनिया, राजदेई और जुगुरी
अपनी चहक से मिटाती हैं गरीबी का दंश

 ये उन चमारों की बेटियां है
जिनके मजबूत हाथ और बलिष्ठ शरीर
जमींदारों के खेत में हरियाली बोते हैं
लोगों का पेट भरते हैं अन्नदाता हैं हमारे

भयानक ठंड और चिलचिलाती धूप में
ये लोग खेतों में गीत गाते हैं
अनाज के सैकड़ो बोरे पैदा करने के बदले
कई रातें फांका करके सोने को विवश हैं

फिर भी अपने कर्त्तव्य की तपिश में
भूखे पेट भी ठाकुरों की बेगारी करते हैं
उनके लठैतों और लाडलों का
आंखों में खौफ दिन-रात रहता है

पशुओं की चरी और बरसीम सिर पर लिए
हाथ में टांगे कंडियों की टोकरी
एक दिन अपनी धुन में चली आती थी मुनिया
आंखों में बाजरे से हरे सपने लिए

क्या पता था उस बालिका को
कोई भेड़िया है घात में
उसकी कोमलता को शापित करने को
किसी जानवर ने झपट्टा मारा था

दर्द से बिलबिलाती मुनिया की
 तड़पती चीखें दबती गर्इं,
थमती गर्इं उसके विरोध से घायल भेड़िये के पंजों ने
मुनिया से जीने का हक भी छीन लिया

कल तक आंगन में फुदकती मुनिया
नि:शब्द हो गई, गहरी नींद सो गई
बाप की लाडली, मां की प्यारी बेटी
निर्मम दुनिया को अलविदा कह गई

मुनिया की लाश लिए खड़ा था बाप उसका
ठाकुरों के बेटे बन्दूक लहराते पहुंच आए थे बस्ती में
बोले दफन करो चमारों अपनी औलाद को
इस ‘सभ्य’ गांव में पुलिस नहीं आने पाए

कलेजे के टुकड़े को गोद में लिए
बाप की आंखें इंतजार में सूखी जा रही थीं
थाने में रपट लिखाए दिन बीत गया लेकिन
कोई ‘कानून का रखवाला’ बस्ती में नहीं पहुंचा

पता चला कि ‘हवेली’ में आज 
शराब का दौर ‘साहब’ लोगों के लिए चल रहा है
इधर चमारों की पूरी बस्ती में 
एक भी चूल्हा नहीं जल रहा है 

तब उस मजबूर बाप ने अपनी मुनिया 
को ढेलों के बीच एक गड्ढे में दफना दिया 
और ठाकुरों के अय्याश लाडलों 
की पंचायत में पेशी को चल दिया।

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