Sunday, 16 August 2015

सबकी प्यास बुझाता है कुएं का पानी

गांव की झोपड़ियों के बीच
एक कुएं का पानी हर मौसम में
सबकी प्यास बुझाता है तृप्त चेहरे देख,
विचित्र संतोष उसमें ‘जीवन’ भर देता है।

लगभग न दिखने वाले अस्तित्व में भी
अपनी सूखती धमनियों से
निचोड़ कर तमाम जलराशि
उस गांव की छोटी-छोटी बाल्टियों में भर देता है

कुएं की डाबरों में सिमटी जलराशि ने
जैसे कर लिया हो गठबंधन
धरती की अथाह जलराशि से 
कि वो सूखकर भी खाली नहीं हुआ है 

गांव के घरों की ढिबरी की रोशनी
नहींं पहुंचती उसके अंधेरे वर्तमान तक 
लेकिन वह हर दिन सूखते हुए भी 
सींच रहा है सैकड़ों जीवन 

कोई अभिलाषा शेष नहीं है 
उम्मीद कोई पैदा नहीं होनी है अब 
उसे मालूम है अपना अंजाम पर उससे पहले 
वह निभा रहा है कर्त्तव्य धरती पर ‘जीवन’ कहलाने का

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