दिन भर की थकान के बाद
सूरज जब ढलने लगता है
उसकी सुनहरी रश्मियों से टकराकर बनने वाली
तुम्हारी परछार्इं को कैद कर लेना चाहती हूं
छत की मुंडेर पर खड़ी रहकर अनवरत
उस परछार्इं को जाते हर दिन देखती हूं
जो तुम्हारे लौटने के साथ-साथ
मुझसे दूर होती चली जाती है
हर दिन तुम्हें छूकर आने वाली
इन किरणों को आंखों से स्पर्श करती हूं
जैसे तुम्हारे और मेरे दरमियान
स्रेह का अस्तित्व बस इन्हीं से है
मेरी पहुंच से दूर रहकर भी
तुम मुझे रोज छूकर गुजर जाते हो
और तुम्हारी रोशन छवि निहारकर
मेरा मन प्रकाश से भर जाता है
मेरे छज्जे से तुम्हारे छज्जे के कोने तक
ये दूरी जैसे जनम भर की हो
पर
रोज तुम्हारे ओझल होने से पहले
मन की मखमली कैनवास पर
तुम्हारी तस्वीर उतार लेती हूं
ये फासले कब तक रहें कुछ पता नहीं लेकिन
तुम्हारे प्रेम के उजाले से मेरा अस्तित्व जगमगा उठा है
और देखो यह रोशनी हमारे मिलन की
मौन रहकर इस रात को सवेरा बना रही है।
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