वो बचपन का जमाना था
जो दुनिया से बेगाना था
जहां गुड़िया की शादी थी
जहां गुड्डे का गाना था
कभी अंताक्षरी के दिन
कभी चौपाल सजती थी
गुलाबी दिन हुआ करते
गुलाबी रात लगती थी
जेबों में कुछ आने थे
मगर मेले सुहाने थे
वो बाइस्कोप अच्छे थे
डंडा गिल्ली पे ताने थे
चवन्नी की बरफ मिलती
अठन्नी की मिठाई थी
वो खुशियों से भरे दिन थे
भले ही कम कमाई थी
ऊदल की वो गाथा थी
जो दादी तब सुनाती थीं
आल्हा के पराक्रम
के
नानी गीत गाती थीं
एक टांग के सब खेल
महंगे खेलों से अच्छे थे
इस आलीशान यौवन से
वो बेफिकर दिन ही अच्छे थे
वो दोहे, गीत वो सारे
जो
हम बचपन में गाते थे
वो बातें, मस्तियां सारी
जहां गम भूल जाते थे
कोई वापस दिला दे आज
जो बचपन के जमाने थे
जहां हर पल में जादू था
जब हम सब दीवाने थे
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