Wednesday, 26 August 2015

स्त्री तुम सचमुच अद्भुत हो

स्वाहा तुम्हीं स्वधा तुम हो 
तुम कल्याणी सृष्टि की 
बन मोहिनी जग को 
रचती स्त्री तुम सचमुच 

अद्भुत हो एक बदन एक
ही जीवन पर इतने रूपों
में जीवित हो सबसे पावन
प्रेम तुम्हारा स्त्री तुम 

सचमुच अद्भुत हो अन्नपूर्णा 
इस जग ही तुम ही क्षुधा मिटाती हो
 प्रेम भरा हर रूप तुम्हारा 
स्त्री तुम सचमुच अद्भुत हो

पावन गंगा सी निर्मल हो 
को सिंचित, पोषित करती
 तुम न हो तो जग न होगा
स्त्री तुम सचमुच अद्भुत हो

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