स्वाहा तुम्हीं स्वधा तुम हो
तुम कल्याणी सृष्टि की
बन मोहिनी जग को
रचती
स्त्री तुम सचमुच
अद्भुत हो
एक बदन एक
ही जीवन
पर इतने रूपों
में जीवित हो
सबसे पावन
प्रेम तुम्हारा
स्त्री तुम
सचमुच अद्भुत हो
अन्नपूर्णा
इस जग ही
तुम ही क्षुधा मिटाती हो
प्रेम भरा हर रूप तुम्हारा
स्त्री तुम सचमुच अद्भुत हो
पावन गंगा सी निर्मल हो
को सिंचित, पोषित करती
तुम न हो तो जग न होगा
स्त्री तुम सचमुच अद्भुत हो
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