इस सृष्टि मै ,
कुछ भी बेवज़ह नहीं ,
मुझ से पूछकर मेरी औकात ,
समझकर धूल मुझे उड़ा देने वालों का नहीं है ,कोई कसूर ,
मै धूल जहां पर बैठती , सब धूंधला कर देती जिस पर चढ़ी सब धूमिल ,
कभी घर आँगन में पढ़ी ,मैं धुल जहवां बैठती वहां से हटा दी जाती ।
कोई ठिकाना नहीं मेरा ,
कभी हवा के झोंको के साथ इधर -उधऱ भटकती जहां हवा पटकती वहीँ बैठ जाती आँधी,
-तूफ़ान संग उड़ती. ,रेत के टीले बनाती. नहीं था
मुझे कोई एहसास की ,मेरा भी बन सकता है अस्तित्व,
पर मैं धूल जब एक जगह एकत्रित होती गयी तब मुझे मेरी पहचान मिली ,
एक के ऊपर एक परत जब एक चढ़ती गयी ,
धूप ने मुझे तपा दिया बरसात ने मुझे टिका दिया ,
पहले में बनी पाषाण ,फिर विशाल पर्वत जब तक थी मै ,
बिखरी बिखरी अकेले में न थी मेरी कोई औकात ,
पर्वत बनकर मैंने खुद को साबित किया,
मुझे मेरी पहचान मिली,मेरा जीवन सफल हुआ ।
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