एक बार की बात है, जंगल मेँ सभी जानवरोँ ने सोचा कि शेर की राजशाही खत्म करके लोकतंत्र लाया जाये। तो इसके लिये एक संविधान बनाया गया और फिर आम चुनाव कराये गये। जिसमेँ जंगल के मंत्रीमंडल का प्रमुख गीदड़ को बनाया गया। और गीदड़ ने सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा लोमड़ियोँ को सौपी। लोमड़ियो ने छिपकलियो की प्रशासन करने तथा सुरक्षा व्यवस्था देखने के लिये भर्ती की। दण्ड देने के लिये चीटीँ को नियुक्त किया गया। शेर सहित अन्य जानवर 'हम जंगल के लोग' बने। इस प्रकार जंगल एक राज्य के रुप मेँ उभरा। पर गीदड़ गलत काम करने लगा और संविधान को निष्क्रिय करने के लिये लोमड़ी मौसी ने चाल चली। लोगो से बोलने का या विरोध करने का हक छीन लिया। इस प्रकार गीदड़ सरकार आत्ममुग्धता को पोषित रखा। जनता छिपकली से डरती नही है पर सबको घिन लगती है कि कौन पचड़े मेँ पड़े। अभी ऊपर कूद पड़ेगी। पर जनता को क्या पता छिपकली खुद डरपोक है। जंगल मेँ रहने वाली जनता संविधान और मौलिक अधिकार से अनभिज्ञ है इसलिये वो दण्ड देने वाले प्राधिकरण के पास नही जाती। और लोमड़ी से शोषण कराती रहती है, गीदड़ भभकी से डरती है। पर जनता ये नही जानती है कि चीटीँ जब नाक मेँ घुस जाती है तो जान लेकर ही पीछा छोड़ती है। मेरे लेख का मनुष्य के समाज से लेना देना नही है। ये जंगलराज की कहानी है। पर कुछ भी हो ये जंगली मनुष्योँ से अच्छे है।:-):-)
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