Wednesday, 26 August 2015

मन में आह उपजाती,वेदना का कहर


मन में आह उपजाती,वेदना का कहर
अविरल उच्छवासों में
समेट कर छुपाती हूं।

अटकती सांसें
आत्मा को चीरकर,
आंसुओं के दामन में
लुढ़क जाती हैं।

पीड़ा की कठोरता
 मुझमें  टूटकर तब,
भावनाओं को लिये
आंखों में पिघल जाती है।

उलझनों की लहरों को
जीवन के आह्लादों पर,
ठोकरें मारने से
कहां रोक पाती हूं।

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