फलक पर फिर उजाला हो रहा है,
चाँद बाहों में छुपकर सो रहा है।
किसी मासूम बच्चे सा लगा वो,
मेरे पहलू में जैसे रो रहा है।
वो क्यारी की कतारों से उठाकर,
मिरे आंचल में खुशबू बो रहा है।
दिवानी बदलियों सा वो बरसकर,
मेरी रूसवाईयों को धो रहा है।
सफर में ज़िंदगी के दर्द को भी,
वो असबाबों के जैसे ढो रहा है।
उसी पागल को मैंने पा लिया है,
जिसे लगता है मुझको खो रहा है।
.कनुप्रिया
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