दर्द-ए-दिल हर सुबह हर शाम दे गया
वो चंद मुलाकातों में अपना नाम दे गया
हम तो थे बेफिकर मौजों में थी
नजर
मुस्कुराकर मुहब्बत का इंतकाम ले गया
कल तक हो जो भी चाहत अब वो ही रह गया
मेरी हसरतों को इश्क का गुलाम कर गया
बसने लगा है आज धड़कनों की जगह
वो
जीने की वजह मुझको वो तमाम दे गया
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