वह अल्हड सी लड़की अब बहू हो चुकी है
नर्म हाथों से वह रोटियां उठा लेती है
जिसे चिमटे से छूने में भी डरती थी
बाबा की राजकुमारी
अब पति के इशारों पर चलती है
चावल से कंकड़ों को बीनती
सिल-बट्टे पर मसाले पीसती
माथे पर आए पसीने को पोंछती
मुस्कुराती है हर आदेश पर
किसी का खाना किसी का बिछौना
किसी का पानी किसी का दाना लिए
दिन-रात घर में डोलती
आमदनी और खर्चे को जोड़ती
हर पल फुदकती, चहकती वो लड़की
सहनशील, संस्कारी बन गई है
बोलना मना है उसे किसी के बीच
अपनी राय लिए सो जाती है हर रात
सुबह शाम तो होती है रोज पर
रोटियों को गोल-गोल घुमाते
बच्चों के टिफिन लगाते
झूठे बर्तन मांजते निकल जाती है
वह हंसती है क्योंकि
उसके पति और बच्चे खुश हैं
उसकी खुशी के मायने बदल जो चुके हैं
वह अपने लिए नहीं उनके लिए खुश होती है
वह भूल चुकी है कि चारदीवारी से बाहर
दुनिया कैसी दिखती है, सुबह कैसी लगती है
वह भूल चुकी है अपना अस्तित्व, अपनी पहचान
उसे नहीं कहलाना बाबा की गुड़िया या मां की बिटिया
वह अल्हड़ सी लड़की अब बहू हो चुकी है।
No comments:
Post a Comment