Wednesday, 5 August 2015

कभी नज़रे मिलाने में ज़माने बीत जाते हैं

कभी नज़रे मिलाने में ज़माने बीत जाते हैं
कभी नज़रे चुराने में ज़माने बीत जाते हैं
किसी ने आँख भी खोली तो सोने की नगरी में
किसी को घर बनाने में ज़माने बीत जाते हैं
कभी काली सियाह रात हमें इक पल की लगती हैं
कभी इक पल बिताने में ज़माने बीत जाते हैं
कभी खोला दरवाजा खड़ी थी सामने मंज़िल कभी
मंज़िल को पाने में ज़माने बीत जाते हैं एक पल में
टूट जातें हैं उमर भर के वो रिश्तें जिन्हें बनाने में
ज़माने बीत जाते हैं

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