आज गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष
सूना है, उदास सा अकेला
कल तक जो उसकी गोद में
खेला करते थे, वे बच्चे
आज बड़े हो गये हैं
धूल भरे उलझे बालों की
चोटियां गूथती वो गुड़िया जैसी थी
और उसे मारता, दुलारता वो
नन्हा
पर शैतान सा बच्चा
परदेश गए थे जब दोनों तो यहीं पर
अपने दोस्तों से मिलकर
फफक उठे थे सारे और फिर
वापस आने का वादा कर गए
उनकी राह देखते आज बरगद का पेड़
अपनी लटें बिछाए बैठा है पर
उसकी जवानी के दिनों के बच्चे
जवान हो गए है, फिक्र में खो गए हैं
अब उनकी दुनिया
बहुत बड़ी हो चुकी है
शायद बरगद से भी बड़ी जहां,
खेलकर वे बड़े हुए थे
और जर्जर होता वृक्ष इस आस में
किसी दिन ढह जाएगा कि
शायद वापस आकर कभी परदेश से
यहां तक पहुंचेंगे उसकी आंखों के तारे
No comments:
Post a Comment