Wednesday, 5 August 2015

माँ" तू है, तो हम है...

"माँ" तू है, तो हम है...
"माँ" एक रिश्ता नहीं एक अहसास है,
भगवान मान लो या खुदा , खुद वो माँ के रूप में हमारे आस पास है..
इस एक शब्द में पूरे जीवन का सार समाया है,
जब भी रहा है दिल बैचेन मेरा , सुकून इसके आँचल तले ही पाया है ||
पलकें भीग जाती है पल में ...... "माँ"को जब भी याद किया है
तन्हाई में,
जब भी पाया है खुद को मुश्किलों से घिरा, साथ दिखी है वो मुझे
मेरी परछाई में ||
न जाने कौन सी मिट्टी से "माँ" को बनाया है ऊपर वाले ने...
कि वो कभी थकती नहीं , कभी रूकती नहीं ,
उसे अपने बच्चों से कभी शिकायत नहीं होती ...
आसुओं का सैलाब है भीतर ,पर आँखों से वो कभी रोती नहीं ||
उसे टुकड़ा -टुकड़ा हो के भी , फिर से जुड़ना आता है,
अपने लिये कुछ किसी से, नहीं उससे माँगा जाता है ||
कितना भी लिखो इसके लिये कम है , सच है ये कि"माँ" तू है,तो हम है ||

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