Friday, 1 May 2015

वर्षा की बूँदों की झनका

कुछ मिलने, कुछ होने की कामना का अंत
 कर वासना का कर विसर्जन
 सुन पा रही हूँ प्रकृति के कण-कण का संगीत
 सूखे पत्तो की मीठी राग
 फूलो की पंखुड़ियों का थरथराना
वर्षा की बूँदों की झनका
 अंतस के गीत
इस तरह
वाक्यों और शब्दों के बंधनों से मुक्त
 अक्षर बन जाती हूँ मैं
 और पहुंच जाती
 उस विराट उर्जा के पास
 घुल जाती हूँ सृष्टि के प्रत्येक परमाणु में 
यही मेरी नियति, प्रारब्ध और आध्यात्म है।

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