Sunday, 24 May 2015

जहाँ प्रेम था शांति और दर्शन था

वो जब मिला था मुझे 
ऐसा लगा कि मानो 
उसके अन्दर बुद्ध हो 
फिर ईशु की तरह लगने लगा 
दुनिया का सबसे अच्छा और
सच्चा आदमी मुझे उससे मिलकर 
एक साथ कई महान आत्माओं के दर्शन
होने लगे मेरी तो जैसे दुनिया 
ही बदल गई मैं दूसरी दुनिया मैं थी
जहाँ प्रेम था शांति और दर्शन था 
अर्थ का कोई नामोनिशान नहीं
 मैंने मन ही मन कहा मतलबी 
दुनिया तुझे सलाम मैं चली मेरी 
दुनिया में हम घंटो नदी किनारे या
 किसी दर्रे में बैठे बात करते जिसमे
 सब कुछ होता गीत कविता 
दर्शन संगीत फिर एक दो तीन ..
.न जाने कितने दिन उसने मुझे
 प्रेम का दर्शन बताया दर्शन ने आकार
 लेना शुरू किया और मेरे अस्तित्व
 में दिखाई देने लगा और अचानक एक रात वो
 अपने दर्शन के साथ अकेला छोड़ 
किसी नए दर्शन की तलाश में जो गया
 तो नहीं लौटा मैं
 आज कल सुबह सात से शाम सात बजे 
मिल की मशीनों के बीच रहती हूँ 
अर्थ दर्शन को और रात
दर्शनशास्त्र की किताबों को फाड़ लिफाफे बनाती हूँ

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