Tuesday, 19 May 2015

दशहरा सूना सा लगता है.....

रावण दहन...जब छोटे थे तब इस दिन के कितने मायने हुआ करते थे...दोपहर से नानी के घर पहुंचकर धमाचौकड़ी करना...फिर शाम होते ही मामा हम सभी भाई - बहनों शास्त्रीनगर से लेकर परेड तक में खड़े रावण दिखाने ले जाते.... उस समय हर बड़े की तरफ से हम बच्चों को मेला घूमने के लिए 10 रूपए मिला करते थे....हालंकि आज उसे बढ़ाकर 20 रूपए कर दिया गया है...खैर, कुछ खरीदने का मन हो तो वो भी उन्ही रुपयों में खरीदो जैसे....लकड़ी से बने सांप, रावण, धनुष बाण, कागज़ की तलवार, दफ्ती की गदा...चारों ओर बिखरी रंग-बिरंगी रौशनी, झूले और 2 रूपए का एक फिल्मी पोस्टर....सबकुछ उन्हीं रुपयों में...और जो बच जाता था उससे हम सब रात भर बैठकर तीन पत्ती खेलते.... 
मुझे घर में छोटा होने का हमेशा फायदा मिला अगर तीन पत्ती में जीत गए तो सारे रूपए मेरे और अगर हार गए तो बड़े भाई बहन मिलकर मेरे नुकसान की भरपाई कर देते थे....कहते "छोटी है इसे वापस कर दो".... आज सब कुछ एक सपने जैसा लगता है, एक वो दशहरा था....एक ये दशहरा है.....घर के अन्दर बंद, टीवी, लैपटॉप, और कोई भी साथ नहीं आज दशहरे का रावण सिर्फ कहानियों का हिस्सा भर लगता है.... दशहरा सूना सा लगता है.....

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