Sunday, 31 May 2015

प्रेम और विवाह ।

प्रेम और विवाह ।
प्रेम विवाह ।
प्रेम की आतुरता?
प्रेम गायब।
विवाह कायम ।
क्षण क्षण कटता क्षण।
कटुता का क्षण।
राग भी, विराग भी ।
आजादी के अहसास ।
गुलामी की चाह।
स्व रोकता है ।
स्व धर्म टोकता है ।
दिल है दरवाजे पर।
दाग चेहरे पर ।
कोई है, जो नहीं लौकता है।
काम? पता है ।
क्रोध? आता है ।
अपनों के साथ का लोभ भी है ।
अपनों से मोह भी है ।
एक चोर है, जो पकड़ में नहीं आता है ।
शायद मद? यानी अहंकार ।
यही तो, जो मिलन से रोकता है?
दिल दलित और माथा अमीर हो गया है ।
क्या कर सकते हैं? 
पढते पढते थक रहे हैं 
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, 
प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा प्रजा जेई चाहै, 
शीश देई ले जाय।।

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