बैल अब अनुपयोगी हो गये हैं
बीस दिन घर पर गुजारे...और इस दौरान करीब 1200 किमी मोटरसाइकिल भ्रमण किया... जिधर से भी गुजरा गांव और खेतों में बैलों की जोड़ी (गोईं) ढूंढ़ता रहा...17वें दिन एक गोईं दिखी...घर आकर इसकी चर्चा पिता जी से की तो पता चला कि हमारे गांव अब एक ही घर में गोईं बची है....पहले कभी एक घर में चार गोईं होती थी...बैल अब ग्राम्य जीवन में अनुपयोगी हो चुके हैं...अब न बैलों से जुताई होती है और न ढुलाई....बछड़ों को मुफ्त में कोई किसान पालने से रहा...ऐसे में उनकी नियति कटना ही है...वहीं गांव में बहुत कम ही गोपालक मिलेंगे जो गोवध के विरोध में बड़ी-बड़ी बातें करें...गो वंश के नाम की माला जपने वाले ज्यादातर भूमिहीन हैं...उनके पास खेती नहीं है...वे पशु नहीं पालते...उनका मकसद सिर्फ राजनीतिक है..गो वध को रोकना है तो जीवित गाय-बैलों की उपयोगिता तय करनी होगी
No comments:
Post a Comment