Sunday, 17 May 2015

छुट्टियाँ मानाने का साधन भर मानते है

साधारण सी यात्राओं पर जाने को हम छुट्टियाँ मानाने का साधन भर मानते है . शायद ये ठीक नहीं है, यात्रा एक ख्वाब की तरह होती है . एक अच्छा ख्वाब जो पूरा होने पर आप को एक सुखद अहसास में भर देता है . अगर हम सभ्यता की यात्रा की गहराई में उतरे तो पाएंगे की यात्रा ही वह चीज है जिसने मानव समाज को विकसित किया . यात्रा ने विज्ञान ,कला ,व्यापार संस्कृति के साथ-साथ मूल्यों का भी विस्तार दिया . 
हमारे अन्दर विचार भरे उन विचारो को विश्लेषित करके कारणों तक पहुचाया। ये विचार ही तो थे की एक राजकुमार बुद्ध बन गया और संसार को एक नया धर्म दिया , बोध की इस यात्रा ने न जाने कितने संत, महात्मा हमें दिए। एक बार फिर हमें यात्रा के खोये अर्थ तलाश करने होंगे . आज हमारी यात्राएँ कर्मकांडो या शायद व्यस्त जीवन से कुछ फुर्सत के समय बिताने के लिए छुटिया मानाने का एक माध्यम भर है पर हमें यात्रा के इस मानसिकता को थोड़ा बदल कर देखना होगा। असल में यात्रा हमें धरा से जोडती है इतिहास ,संस्कृति आप से बाते करने को बेताव रहते है लेकिन तब जब आप एक यात्री होते हैं ,पर्याटक नहीं । यात्रा एक तलाश है, अपने को जानने की समझने की , ये प्रकृति की पुकार है जो आप को पहाड़ो की चोटिया नापवाती अजनवी घाटियों में घुमती है। महल ,झीले किले, दर्रे . मंदिर मीनारे . सागर . गंगा सागर से गंगोत्री जहाँ भी जाये इनके बीच इनकी बाते सुनिए ध्यान से, ये कुछ कहते है। ये अपनी कहानी कहते है अपनी व्यथा अपनी कथा आप को सुनाएगे अगर आप सिर्फ इन्हें देखने जाते है तो ये खामोश खड़े रहेगे। इस बार इनको भी सुनिए ,यात्रा करिए। ये यात्राए पसंद नहीं तो अनंत की यात्रा कीजिये आप अनंत के यात्री हैं ध्यान करिए यह यात्रा अंतहीन है। परमात्मा अनंत है उसकी कोई सीमा नहीं ये यात्रा भोगोलिक नहीं ये अंतर -मन की यात्रा है। अब ये आप के ऊपर है की आप को कौन सी यात्रा पसंद आती है भौगोलिक या अनंत से अनंत की।

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