Saturday, 23 May 2015

अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसते हुए

महाभारत में देखा था अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसते हुए, एक वीर योधा होने के बावजूद भी वह चक्रव्यूह को भेद नही पाया, हर संभव प्रयास किया मगर असफल रहा, अंत में मृत्यु को प्राप्त होकर ही उस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाया !
एक बच्चा जब जन्म लेता है तब वह किसी को नही जानता, जैसे-जैसे दिन गुजरते हैं उस बच्चे की सोचने समझने की शक्ति भी विकसित होती जाती है, अब वो अपनी माँ को जानता है, पिता को जानता है और धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ ही घर के, पड़ोस के लोगो को भी जानने लगता है ! फिर वह बच्चा थोडा और बड़ा होता है, स्कूल जाने लगता है, वहां नये-नये दोस्त बनते हैं, नये लोगो से मिलना होता है, उनसे मेल-मिलाप होता है, फिर उन सभी दोस्तों में से कोई एक या दो दोस्त खास बन जाते हैं !
वक़्त थोडा और गुजरता है, अब वो बच्चा जो स्कूल जाता था कॉलेज जाने लगता है, स्कूल के अनगिनत दोस्तों के साथ-साथ कॉलेज में भी अनगिनत दोस्त उसका इंतजार कर रहे होते हैं, वक़्त थोडा और गुजरता है, अब वह बच्चा, बच्चा नही रहता, बड़ा हो जाता है, पढाई पूरी कर लेता है, नौकरी करने लगता है, ये वो समय है जब उसे लगता है कि वो अब अकेला नही है, उसके बहुत सारे दोस्त हैं, रिलेटिव्स है, उसका अपना एक परिवार है, माता-पिता हैं, भाई-बहन हैं, अड़ोसी -पडोसी हैं, कुल मिलकर अब उस छोटे से बच्चे को जानने वाले लाखो लोग हैं !
जैसे-जैसे उम्र का एक-एक दिन बढ़ता है वैसे-वैसे इंसान इस जीवन रूपी चक्रव्यूह में फँसता चला जाता है, बचपन से ही मोह-माया के ऐसे जाल में फँसने लगता है कि अगर जीवन में कभी किसी मोड़ पर निकलना भी चाहे तो भी अथक प्रयास के बावजूद भी नही निकल पाता !
अगर भावनाओ को नज़रअंदाज कर दिया जाये तो इस जीवन में ऐसा कुछ भी नही है कि इसे बेकार के मोह-माया में फंसकर बर्बाद किया जाये ! क्या रखा है इस दुनिया में, दूर तक देखो तो हर तरफ बस दर्द, दुःख, परेशानियाँ, नफरत यही सब तो भरा पड़ा है, कोई खुश नही, खुश हो भी तो कैसे, एक की ख़ुशी दूसरे से जुडी है और इस दुनियॉ में किसी को किसी दूसरे की खुशियो की परवाह कहाँ है !
पैसे नही है, गरीबी से ज़िंदगी भर जूझते रहो, अपनी शान को बरकरार रखने के लिए लोगो के सामने भीख मांगते रहो, इस काम के लिए पैसे चाहिए, अब दे दो, जैसे ही मेरे पास होंगे मैं लौटा दूंगा, पैसे आते हैं और उधार चुकाने में ख़त्म हो जाते हैं, जमीन का बटवारा हो गया फिर भी दोनों भाइयो को लगता है कि मुझ से ज्यादा दुसरे को मिल गयी, घर में देवरानी, जिठानी, सास घर के काम को लेकर झगडती हैं, सब्जी में नमक कम है, दाल पकी नही ठीक से, उसने मेरे बारे में ये कहाँ, उसने वो कहाँ, रोटी कच्ची रह गयी, उसे ज्यादा गहने मिल गये, मुझे कम मिले, सोना-चांदी यहाँ तक कि आर्टिफीसियल गहनों पर भी लड़ाई-झगडे होते हैं !
मुस्कुराने का मन न हो तो भी पागलो की तरह सिर्फ दुसरो को दिखाने के लिए हँसते रहो, अपने आप को पूरी दुनिया के साथ इतना अटेच कर लो कि फिर उसके छोड़ कर जाने पर रोते रहो, बेवजह दुखी होते रहो, उसने मुझे छोड़ दिया, उसने मुझसे बात नही की. वो मुझे प्यार नही करता/करती , बला बला बला बला …
सारी जिंदगी इसी लड़ाई-झगडे में, ताने सुनने में, देने में, नमक, मिर्च, सब्जी- रोटी इसी सब में निकल जाती है, और अंत में मिलता क्या है, मौत ? वो भी कैसी होगी कौन जाने !
बहुत ऊब महसूस होने लगी है अब दुनिया को देख कर ! इसके रंग-ढंग देख कर, मन बार-बार कहता है कि चल मुक्त हो चल इस जहाँ से, कहीं दूर निकल जा, जहाँ ये झूठे रीति-रिवाज, कानून, नियम, ओहदे, और झूठे इन्सान कोई न हो, जहाँ कोई नमक मिर्च को लेकर झगडा न करे, जहाँ कोई अपना न हो और सब अपने हो, किसी से कोई अटैचमेंट नही, बस अपना कर्म करना हो ! जहाँ इन्सान सिर्फ अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए दुसरो की जिन्दगी के साथ न खेलता हो, लेकिन ये सब सोचना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल, इस जहान रूपी चक्रव्यूह से इस युग में भी जिन्दा रहते हुए निकलना नामुमकिन है, म्रत्यु ही शायद एक मात्र रास्ता हो इस चक्रव्यूह से निकलने का !
खैर जो भी हो, मैं तो बस निकलना चाहती हूँ, मुक्त होना चाहती हूँ, उस दर्द से जिसकी कोई ठोस वजह ही नही है, मुक्त होना चाहती हूँ उन आर्टिफीसियल रिश्तो से जो अपने होने का दंभ भरते हैं मगर सिर्फ ख़ुशी में, अमीरी में ! गरीबी में वही अपने रिश्ते अजनबियों की तरह साइड से निकल जाते हैं, :) 
बार-बार एक ही सवाल मन में उठ रहा है कि क्या जिन्दगी के साथ रहकर भी मुक्त हुआ जा सकता है ???

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