Sunday, 26 July 2015

मैं एक ईमानदारी स्त्री हूँ

मैं एक स्त्री ईमानदारी से अपने सारे दोष को स्वीकार करती हूँ और उनकी जाँच - पड़ताल करती हूँ तो ये पाती हूँ हर बार पुरुष जाति पर लगा के तोहमत और बन कर अबला मैंने अपने उन दोषों को खूबसूरती से छिपाया है जिन्होंने मुझे हमेशा कमजोर किया है . इन दोषों को मैंने मेरे अन्दर खुद ही पैदा किया सदियों से उन्हें पोषा और वक्त आने पर उन दोषों को बिचारी , अबला, त्याग की देवी और ना जाने कितने नाम देकर अपने वजूद के साथ ऐसा आत्मसात किया कि सतयुग से लेकार आज तक मैं उनका इस्तेमाल अपनी सुविधा अनुसार करती आ रही हूँ और जब कभी मैं इसमे सफल नहीं हो पाती तो लगा कर पुरुषों पर दोषारोपण अपने दोष को जस्टिफाई करती रही हूँ .
परम्पराएँ , रीति -रिवाज , संस्कार सब को बनाने में मेरा साथ था और उन्हें समाज को सिखाने में मेरी भूमिका पुरुष से ज्यादा थी फिर भी मेने ही उन परम्पराओं की दुहाई दे दे कर अपने आप को कमजोर करने में जुटी रही क्यों ....? क्योकि मैं अपने ही बनाए खोल से बाहर नहीं निकलना चाहती थी . 
मैं एक स्त्री आज ईमानदारी से ये स्वीकार करती हूँ कि हमारी दुनिया कि क्रांति सिर्फ और सिर्फ हमारे दोषों को स्वीकार करने में है खुद को खुद से बचाने में है शायद ये प्रतिक्रांति ही हमें हमारे आत्मसम्मान , आत्मविश्वास से मिला सकती है जिसे हमने अपने खोल में जिसमे हम वर्षो से बंद है उसके बाहर कही दूर फेक दिया हैं . ‪

#‎किरण‬

सूक्ष्म मन से आ रही उसकी गंध

रात मेरे मन की तरह बिना सितारे के भी सुन्दर है
बुन रही है रात मन में मेरे कुछ
एहसास जो भर रहे हैं सांसों में विश्वास
सूक्ष्म मन से आ रही उसकी गंध
वो और कोई नहीं मेरा मैं है
निशब्द पर रिक्त नहीं भरा भरा पूर्ण
मेरे इस प्रेम बिंदु को नहीं जरुरत
 किसी और की नहीं चाहिए
मेरी काया को किसी और कि
काया और इस तरह उतर कर
अपने अन्दर भारती हूँ
अपने ही प्रेम से उर्जा जो मेरी
स्रष्टि को करता है
सत्यम शिवम् सुन्दरम

Thursday, 23 July 2015

देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से इतने ऊँचे उठो

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे सब हैं
प्रतिपल साथ हमारे दो
कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने ( माखनलाल चतुर्वेदी)

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊँ,

चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं, सम्राटों के शव पर,
है हरि, डाला जाऊँ चाह नहीं,

देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!

मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।


माखनलाल चतुर्वेदी

वर दे, वीणावादिनि वर दे (सरस्वती)

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे।

काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।

नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव नव
नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।
वर दे, वीणावादिनि वर दे।


सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

मैया मैं नहीं माखन खायौ (सूरदास ) ॥

मैया मैं नहीं माखन खायौ ॥
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ ॥
देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ ॥
हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसैं करि पायौ ॥
मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्हीं, दोना पीठि दुरायौ ॥
डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ ॥
बाल-बिनोद-मोद मन मोह्यौ, भक्ति -प्रताप दिखायौ ॥
सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ ॥

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी 
किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी ॥ 
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वै है लाँबी-मोटी । 
काढ़त-गुहत-न्हवावत जैहै नागिनि-सी भुइँ लोटी ॥
काँचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी । 
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी ॥

यौवन की माया, सखि, वसन्त आया

सखि, वसन्त आया
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर-तरु-पतिका
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल हार गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

अवृत सरसी-उर-सरसिज उठे;
केशर के केश कली के छुटे,

स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया।