Sunday, 26 July 2015

सूक्ष्म मन से आ रही उसकी गंध

रात मेरे मन की तरह बिना सितारे के भी सुन्दर है
बुन रही है रात मन में मेरे कुछ
एहसास जो भर रहे हैं सांसों में विश्वास
सूक्ष्म मन से आ रही उसकी गंध
वो और कोई नहीं मेरा मैं है
निशब्द पर रिक्त नहीं भरा भरा पूर्ण
मेरे इस प्रेम बिंदु को नहीं जरुरत
 किसी और की नहीं चाहिए
मेरी काया को किसी और कि
काया और इस तरह उतर कर
अपने अन्दर भारती हूँ
अपने ही प्रेम से उर्जा जो मेरी
स्रष्टि को करता है
सत्यम शिवम् सुन्दरम

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