Friday, 17 July 2015

मंगतू के पास तू क्या उल्टा-सीधा बोला है

लघुकथा--अंतर्द्वंद
मालकिन जब से बताई हैं की जाने किस कारण से मालिक इसबार देवेन्द्र से कुपित हैं रामधुन कुछ सोच नहीं पा रहा जितना अपने मन के अंतर्द्वंद से निकलना चाह रहा और गहरे धंसते जा रहा है । देवेन्द्र के मारने पर यदि मालिक का विरोध किया और मालकिन किसी आपदा में फंस गई तो वो अपने आप को कभी माफ़ नहीं कर पायेगा। सहानुभूति,प्यार का वो क्षणिक आवेश था नहीं तो मालकिन भोली और पवित्र हैं। स्याह चरित्र तो मालिक का है ,हर घर में उनके बीबी और बच्चे हैं । 
मेरे घर में भी तो उनका बेटा पला रहा है, मैं तो सब जानकर भी उसे बेटा मानता हूँ और प्यार करता हूँ। कल ही तो मालिक धमका गये हैं "मंगतू के पास तू क्या उल्टा-सीधा बोला है रे,मार-मारकर खाल उघेड़ देंगे। "थरथरा गया रामधुन "न मालिक ऐसी मेरी मज़ाल कहाँ?" गेहूं का भूसा गोदाम में रखवा रहा था की जोरों से चिल्लाने की आवाज आई,रामधुन दौड़ा हवेली की तरफ भागा। मालिक देवेन्द्र को मार रहे थें, जुबान लगा लिया था उनसे । रामधुन पास जाकर हाथ पकड़ लिया मालिक का। "इतनी बड़ी गलती हो गई है क्या जो आप उसे जान से मार दोगे? मालिक आवाक हो त्योरी चढ़ा के चिल्लायें अरे साले रामधुनवा मैं मारूँ या जिलाऊँ तुम्हे क्या हो रहा है रे बेटा है तुम्हारा? " जी मालिक तभी तो कलेजा फटता है।

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