एक समय की बात है पूर्वांचल के सुदूर पूर्व से एक लड़का रोजगार की तलाश में दिल्ली को आया।लड़के ने कुछ दिन हाथ-पाँव मारे और एक प्रतिष्ठित कम्पनी में एकाउंटेंट के पद पर कार्यरत हो गया।सबकुछ सही से चलने लगा और लड़के ने अपने आप को व्यवस्थित कर लिया।तभी उसकी जिंदगी में एक अहम मोड़ आया जब एक लड़की उसके ऑफिस में आई।लड़की खूबसूरत थी तो आकर्षण तो बनता ही था।लड़का भी धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होता चला गया।दोनों लंच टाइम में खूब गप्पे लड़ाते,ऑफिस से छूटने के बाद आइसक्रीम और गोलगप्पे के ठेले पर टूट पड़ते।लड़की अपनी स्कूटी से लड़के को उसके रूम तक छोड़ जाती और फिर मुस्कुराते हुए दोनों एक-दूसरे से विदा होते।दिन कटते जा रहे थे और ये आकर्षण बढ़ता ही जा रहा था।यहाँ तक की लड़का अब लड़की को प्रपोज करने की सोच रहा था।तभी एक दिन (जिस दिन सभी बहने अपने प्यारे भाइयों की कलाई पर राखी बाँध रही थी) उनकी किसी बात पर बहस हो गयी और लड़की ने उसे कहा की 'देख भैया तू ना मेरे से बात मत करियो'।लड़के का दिल धक से रह गया इसलिए नही की लड़की ने बात करने से मना कर दिया बल्कि इसलिए की उसने उसे भैया बोल दिया।अब वो मन ही मन सोचने लगा की यार ये मुझे भाई समझती है और मैं इसके बारे में क्या-क्या सोच रहा था।लड़के को काफी ग्लानि होती है खुद पर और वह लड़की से कटने लगा।ना उसके कॉल का जवाब देता और ना ही मैसेजेज का।लड़की ने काफी कोशिश की बात करने की पर लड़का उसकी तरफ देखता ही नही था क्योंकि वह अंदर ही अंदर शर्मिंदा था खुद पर।आखिर एक दिन लड़के के हाथो में शादी का कार्ड मिलता है जो की उसी लड़की का था।लड़का शादी वाले दिन गिफ्ट लेकर पहुँचा।लड़की ने उसे अकेले में बुलाया और नम आँखों से कहा की अगर तुमने मुझसे सही समय पर बात की होती तो आज दूल्हे के जगह पर तुम होते।ये सुनते ही लड़के के पैरों तले जमीन खिसक गयी और वो हकलाते हुए बस इतना ही कह पाया की प...रररर तुम तो मुझे भा....ई मानती हो ना।तभी तड़ाक से एक चमाट उसके गाल पर मारते हुए लड़की बोली की डफर ये तुमसे किसने कहा।लड़का बोला तुमने ही तो कहा था की देख भैया आगे से मेरे से बात मत करियो तो मुझे लगा की तुम मुझे भाई मानती हो क्योंकि मेरी तरफ तो भैया मतलब भाई होता है।लड़की ने तड़ाक से दुसरे गाल पर भी तमाचा मारते हुए कहा की डफर हमारी तरफ भी भैया मतलब भाई ही होता है पर बोलचाल में तो मैं अपने पापा को भी भैया बोल देती हूँ इसका क्या।और इस प्रकार एक अंकुरित होती प्रेम कहानी का समापन भैयागिरी पर खत्म होता है और तबसे वो लड़का साल के बाकि दिन तो ठीक रहता है पर सावन का महिना आते ही मानसिक विक्षिप्त सा हो जाता है और तबतक "रक्षाबंधन कब है,कब है रक्षाबंधन" की रट लगाता रहता है जबतक की रक्षाबंधन बीत ना जाए।
#मोरल:- शब्दों पे मत जाओ भावनाओं को समझो.....
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