वो पतझड़ के दिन
वसंती इंतजार के पल
सावन की भींगी
शांम
और चांदनी में लिपटी
रात
वो छतरी
जो धूप से बचाने के
लिए
साथ ले आई
हमें
और भिगों गई
एहसासों की बरसात में
उस में मैं आज भी भींग रही हूँ
तेरी वो गीली खुश्बू
आज भी लिपट
कर
पूछती है
मुझसे
अब वैसी
धूप क्यों नहीं होती
#kiran
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