Sunday, 26 July 2015

सावन की भींगी शांम और चांदनी

वो पतझड़ के दिन 
वसंती इंतजार के पल
सावन की भींगी 
शांम और चांदनी में लिपटी 
रात वो छतरी 
जो धूप से बचाने के 
लिए साथ ले आई 
हमें और भिगों गई 
एहसासों की बरसात में 
उस में मैं आज भी भींग रही हूँ 
तेरी वो गीली खुश्बू 
आज भी लिपट
कर पूछती है 
मुझसे अब वैसी 
धूप क्यों नहीं होती ‪

#‎kiran‬

No comments:

Post a Comment