Sunday, 26 July 2015

गाँधी हो या ग़ालिब हो

गाँधी हो या ग़ालिब हो
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ,
इन्हें अब कर दें दफ़्न ख़त्म करो
तहज़ीब की बात,
बंद करो कल्चर का शोर सत्य,
अहिंसा सब बकवास,तुम भी
क़ातिल हम भी चोर गाँधी हो या ग़ालिब हो,
दोनों का क्या काम यहाँ अबके बरस भी क़त्ल हुई,
इक शिक्षा,इक की ज़बाँ ख़त्म हुआ
दोनों का जश्न आओ,
इन्हें अब कर दें दफ़्न

ग़ालिब के बारे में न ज्यादा जानता हूँ और न ही ज्यादा जानने की तमन्ना की।पर जहाँ तक रही बात गाँधी जी की तो उनके बारे में कुछ कहने से पहले उन्हें पूरी तरह समझने की जरूरत है।सौरी साहिर लुधियानवी बिग अनलाइक फॉर यू।अगेन यू हैव प्रूव्ड वन ऑफ माय क्वोटेशन "केवल नाम ही काफी नही की आँख मूँद भरोसा करूँ तुमपे, मैंने अक्सर देखा है नामचीन बनिये को मिलावट का सामान बेचते हुए"।एक आक्रोश के रूप में भावनाओं में बह जाना और जनसमुदाय को आकर्षित कर लेना तथा एक सिद्धांत के लिए सीने पर गोली खाना दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।गाँधी एक इंसान नही बल्कि एक जीवन शैली है जिसे समझना कमजोर इरादों वाले के लिए पोसिबल नही है।अपनी कमजोरी को स्वीकार करने के बजाय एक सिद्धांत पर ही सवाल उठाना निश्चित ही आपके जैसे व्यक्तित्व के लिए अशोभनीय है। ‪

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