Wednesday, 20 May 2015

मैंने कभी जात-पात...पुर्लिंग-स्त्रीलिंग को आड़े नहीं आने दिया.

इस कहानी पर लिखते लिखते मैं कई बार रुकी....हर बार सोचा की किसी समाज या समुदाय पर एकदम से लिख देना सही नहीं है...कई लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँच सकती है...लेकिन क्या इस बारे मैं सोच कर मैं उस लड़की को दरकिनार कर दूं जो ना चाहते हुए भी सीधे तौर पर इस समस्या से जुड़ी हुई है...
दोस्ती मैं मैंने कभी जात-पात...पुर्लिंग-स्त्रीलिंग को आड़े नहीं आने दिया... यही वजह है की कायस्थ के साथ-साथ पंडित, ठाकुर, जैन, सिन्धी, मराठी, गुजराती से लेकर मुस्लिम भी मेरे अच्छे दोस्त है...हर किसी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है...उनकी संस्कृति, सभ्यता रहन-सहन सब कुछ... पर इसके साथ ही इनसे जुड़े कुछ ऐसी बातें भी सामने आते है जो एक हद के बाद समझ के परे होने लगती है...हो सकता है ये हर घर की या हर लड़की की कहानी न हो...या हो भी सकती है पर ये कितनी और कहाँ तक जायज़ है?????
शहर के एक संपन्न परिवार से ताल्लुख रखने वाली...अंग्रेजी माध्यम से पढ़ी...ख़ुद कार ड्राइव करने वाली...बड़े से घर में रहते हुए महंगे से महंगे कपड़े और सामान इस्तेमाल करने वाली मेरी दोस्त के पास देखा जाये तो वो सब कुछ है जो एक अमीर घर की लड़की के पास होना चाहिए...दूर से देखने पर यही लगेगा कि उसे किसी बात की कमी नहीं...लेकिन उसे करीब से जानने के बाद, न जाने क्यों मैं खुद को उससे ज्यादा खुशनसीब मानने लगी... वह अपने परिवार में किसी से खुल कर मन की बात नहीं कर सकती.... क्यूंकि दायरे में रहने की सलाह मिल जाती है... स्नातक करते ही उसके ऊपर शादी का दबाव बनाया जाने लगा... जैसे तैसे घर में लड़-झगड़ कर फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद भी वो नौकरी कर खुद की पहचान नहीं बना सकती... क्यूंकि जिस समाज में वो रहती है वहां लड़कियों का नौकरी करना सीधे पिता को नीचा दिखाने के बराबर है...यानि पिता के कमाने में ही कहीं चूक रही होगी, तभी लड़की को बाहर निकल कर नौकरी करने की ज़रुरत आन पड़ी...और तो और उसकी शादी में भी सिर्फ इसी वजह से अड़चने आयेगी...किस तरह का समाज है ये जो एक लड़की को आत्मनिर्भर नहीं होने देना चाहता...????
उसके परिवार में लड़कों से दोस्ती करना तो दूर, बात करना भी मना है... उसे एक फ़िल्म देखने के लिए भी घर में झगड़ा करना पड़ता है...क्यूंकि परिवार को डर है, उनकी बेटी के बगल वाली सीट में कोई लड़का ना बैठा हो... कहीं किसी ने देख लिया तो शादी कैसे होगी.... प्यार करना तो जैसे उसके घर में क़त्ल करने के बराबर है... समाज में खबर फ़ैल गई, तो कौन शादी करेगा... फैशन डिजाइनिंग का कोर्स भी इसलिए करने दिया कि शादी के बायो-डेटा में एक डिग्री ही नज़र आ जाएगी... प्यार से बोल कर, ज़िद करके, बग़ावत करके, हर तरीके से घर वालों को समझा कर देख लिया...पर परिणाम वहीँ का वहीँ...हर बात उसकी शादी से शुरू होकर शादी पर ख़तम हो जाती है... और उसे इस बात के लिए डराया जाता है की समाज वाले क्या कहेंगे.....वो जैसे सोने के महल में कैद एक चिड़िया बन कर रह गयी है...जिसके माता पिता इस पिंजरे से निकाल कर शादी करके दूसरे पिंजरे में डालने की तैयारी कर रहे...
मैंने यहाँ उसके समाज का जिक्र नहीं किया... क्यूंकि समाज में हर किसी की कहानी एक नहीं होती... साथ ही इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हर जात या धर्म में समाज के ऐसे ठेकेदार तो मिल ही जायेंगे... कई परिवार भी ऐसे मिल जायेंगे... इसलिए सीधे तौर पर एक समाज, जात या धर्म पर ऊँगली उठा देना जायज़ नहीं है...

तेरे छूने से याद किसी की आती है हमें....

हवाओं ने दोस्ती कर ली आज हमसे...

फिज़ाओं ने संगती कर ली आज हमसे...

कुछ कह रही है मानो छू के हमें...

कुछ गुनगुनाने की गुज़ारिश कर रही है आज हमसे...

ऐ हवा तू यूँ छेड़ न हमें...

तेरे छूने से याद किसी की आती है हमें...

हम तो यूँ ही छत पर मिलने आये थे तुझसे...

तेरी अठखेलियों में शामिल होने,

कुछ अपनी सुनाने, कुछ तेरी सुनने...

पर तेरी इन नादान शैतानियों ने...

यादों के सफ़र को ताज़ा कर दिया...

निगाहों में बंद झलक को फिर से छलका दिया...

बस अब इतनी सी ख्वाहिश और है...

बह चलूँ साथ तेरे मैं भी...

बाहें फ़ैला कर उड़ चलूँ साथ तेरे मैं भी...

तेरी अठखेलियों में शामिल हो जाऊं मैं भी...

Tuesday, 19 May 2015

छीन ली माँ की गोद जन्म लेने से पहले

क्यों विदा कर दिया मुझे ब्याह से पहले
छीन ली माँ की गोद जन्म लेने से पहले 
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं 
राह में फेंक दिया मुझे, 
आँखें खुलने से पहले 
अनजान थी माँ तेरे प्यार से मैं 
क्यों सुला दिया मुझे लोरी सुनाने से पहले
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं
रुसवा कर दिया अपने आँचल से मुझे
क्यूँ कर दी ज़िन्दगी की शाम, सुबह होने से पहले
पालना तेरा बुलाता है मुझे माँ 
क्यों फर्श पर छोड़ दिया मुझे 
चलना सीखने से पहले 
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं 
प्यार मेरे दिल में भी कम नहीं
एक मौका देकर तो देखती माँ
आंसू तेरा कभी गिरने न देती 
मेहनत तेरी मैं बांट लेती 
अपने पैरों में बंधी पायल की छन-छन से 
घर में रौनक मैं ला देती 
पर तूने माँ ना जन्मा मुझे 
दूर कर दिया खुद से पास आने के पहले
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं 
जीने का एक मौका देकर तो देखती माँ
तेरे आंगन की धूप बन जाती
तो कभी पेड़ की ठंडी छाँव बन बिछ जाती
ना बनती कभी बोझ तुम पर
तेरे बुढ़ापे का सहारा मैं बन जाती
क्यों उजाड़ दी बचपन की बगिया खिलने से पहले 
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं.... 
 


यादों की किताब से बचपन की शैतानियों तक

अदभुत है ये बचपन खुशियों से भरा,
हर बात से अनजान हर कैद से
आज़ाद है ये बचपन.....
खुद में पूरी दुनिया समेटे
हर मुस्कान पे जीने के वादे लिए,
 हँसता खिलखिलाता अठखेलियाँ करता
 माँ के आँचल में छिप जाता है ये बचपन....
कभी सावन की बारिश में,
पेड़ की डालियों पर पड़े झूलों के
साथ ऊँची पींगे भरता है ये बचपन....
कभी बारिश की बूंदों में दूर
 निकल जाने की आस में,
कागज़ की नाव बनाता है ये बचपन......
रेनी डे पर स्कूल का गोला
कैंटीन का वो ठंडा कोला किताबों से
जी चुराता क्लास बंक करके कहीं छिप जाता
दोस्तों के साथ घंटों बैठकर गप्पे मारता है ये बचपन....
दादी नानी की कहानियों में
कभी परियों के देस में
तो कभी तारों की छावं में
बिछ जाता है ये बचपन.....
कभी रूठता, कभी मनाता लड़-झगड़ कर,
 दुश्मन को भी प्यार करता हर
खता को माफ़ कर देता है ये बचपन...
झूठ की परछाइयों से दूर भागता
 सच को गले लगाता
भोलेपन की मिसाल है ये बचपन....
मिट्टी के खिलौने बनाता
पोषम पा भई पोषम करता
खुद से ही छुपन-छुपाई खेलता है ये बचपन....
  न भूल पाने वाली यादों के साथ
कभी न लौट आने का वादे
करके रूठ के चला गया वो बचपन.....
यादों की किताब बनकर 
ज़िन्दगी के सफ़र में कहीं पीछे छूट 
चुका सचमुच बहुत अदभुत था वो बचपन.....

दशहरा सूना सा लगता है.....

रावण दहन...जब छोटे थे तब इस दिन के कितने मायने हुआ करते थे...दोपहर से नानी के घर पहुंचकर धमाचौकड़ी करना...फिर शाम होते ही मामा हम सभी भाई - बहनों शास्त्रीनगर से लेकर परेड तक में खड़े रावण दिखाने ले जाते.... उस समय हर बड़े की तरफ से हम बच्चों को मेला घूमने के लिए 10 रूपए मिला करते थे....हालंकि आज उसे बढ़ाकर 20 रूपए कर दिया गया है...खैर, कुछ खरीदने का मन हो तो वो भी उन्ही रुपयों में खरीदो जैसे....लकड़ी से बने सांप, रावण, धनुष बाण, कागज़ की तलवार, दफ्ती की गदा...चारों ओर बिखरी रंग-बिरंगी रौशनी, झूले और 2 रूपए का एक फिल्मी पोस्टर....सबकुछ उन्हीं रुपयों में...और जो बच जाता था उससे हम सब रात भर बैठकर तीन पत्ती खेलते.... 
मुझे घर में छोटा होने का हमेशा फायदा मिला अगर तीन पत्ती में जीत गए तो सारे रूपए मेरे और अगर हार गए तो बड़े भाई बहन मिलकर मेरे नुकसान की भरपाई कर देते थे....कहते "छोटी है इसे वापस कर दो".... आज सब कुछ एक सपने जैसा लगता है, एक वो दशहरा था....एक ये दशहरा है.....घर के अन्दर बंद, टीवी, लैपटॉप, और कोई भी साथ नहीं आज दशहरे का रावण सिर्फ कहानियों का हिस्सा भर लगता है.... दशहरा सूना सा लगता है.....

असुरक्षित समझते हुए I Wish i had Smart suraksha with me

बात उन् दिनों की है जब मैं 15 साल की थी और 11वीं की छात्रा थी...रोज़ साईकिल से ही स्कूल आना जाना हुआ करता था....परीक्षा नज़दीक होने के कारण एक दिन मैं मेरी सहेलियां एक्स्ट्रा क्लास लेकर वापस आ रहे थे....स्कूल से घर की दूरी लगभग 5 किलोमीटर थी...रास्ते में मेरी साईकिल पंचर होने की वजह से मुझे वही रुकना पड़ा...जबकि मेरी सहेलियां आगे निकल चुकी थी...वहां पास में ही बड़े बाल और दाढ़ी में एक आदमी खड़ा सिगरेट पी रहा था...खुद को असुरक्षित समझते हुए मैंने तुरंत ही वहां से निकलना मुनासिब समझा....थोड़ी देर में मुझे अहसास हो गया की वो आदमी मेरे पीछे-पीछे आ रहा है...मैं घबरा गयी और तेज़ गति के साथ आगे बढ़ने लगी...तभी मुझे कुछ दूरी पैर एक चौकीदार दिखाई पड़ा...आनन् फानन में मैं उस चौकीदार के पास पहुच गयी...पीछे मुड कर देखा तो वो आदमी जा चूका था...मैंने चौकीदार से पूरी बात कही, मेरी बात सुनकर वह घूरते हुए उल्टा मुझपर ही फब्तियां कसने लगा...मैं डर गयी, दूर दूर तक मुझे कोई नहीं दिख रहा था और अँधेरा भी होता जा रहा था...इसी बीच वो बदमाश सा दिखने वाला आदमी भी वहां आ पंहुचा...दोनों को एक साथ देखकर तो मानो मेरी जान ही निकल गयी...उस आदमी ने मेरा हाल पूछते हुए मुझे घर छोड़ने की बात कही...मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करू...मैं उसके साथ चल पड़ी, अँधेरी रात में उस बदमाश जैसे दिखने वाले आदमी के साथ मैंने घर तक का सफ़र तय किया....पूरे रास्ते उसने मुझसे कोई बात नहीं की...जैसे ही मैं घर के अन्दर पहुची उस आदमी ने मेरा नाम पुकारा...और मेरा आई कार्ड हाथ में थमाते हुए चुप चाप वहां से चला गया...उस समय मुझे महसूस हुआ I Wish i had Smart suraksha with me (काश मेरे पास स्मार्ट सुरक्षा एप होता) तो ऐसे समय पर मुझे कितनी मदद मिल जाती...

आज फिर मुस्कुराने का दिल कर रहा है

आज फिर मुस्कुराने का दिल कर रहा है 
आज फिर बहक जाने को मन कर रहा है 
खोए थे जिस अंधेरे में हम 
फिर उसे रोशन करने का दिल कर रहा है
सूख चुकी थी जो कलियाँ मन की फिर
से उन्हें बारिश में भिगोने को दिल मचल रहा है 
रुक हुई ज़िन्दगी को आज 
उसे हवा में बहा ले जाने का दिल कर रहा है 
दूर थी जो खुशियाँ खुद से आज फिर 
उन्हें पाने का दिल कर रहा है फिर से जीने का दिल कर रहा है 
आज फिर मुस्कुराने का दिल कर रहा है...