Tuesday, 21 April 2015

शिव और शक्ति का संतुलन

मैं खोद रही हूँ इतिहास को 
और खोज रही हूँ खूद को
तलाशती हूँ ग्रंथो में 
रोकती हूँ रस्ता 
सृष्टि का 
पूछती हूँ उनसे मैं कहाँ हूँ? 
मैं दफन हूँ शायद 
 धर्म ग्रंथो में 
कि नीव में सदियों से दे रही सहारा इन्हें
 प्रेरणा देती मैं 
खड़ी रही हमेशा
 कभी भारती, कभी विद्दोतमा तो कभी रत्नावली बन 
बनाती रही नए नए मार्ग 
करती रही उन्हें प्रकाशित तुम्हारे लिए
 लेकिन तुम ने मेरा मार्ग कभी प्रकाशित किया क्या ? 
शायद मैंने कोई धर्म ग्रन्थ नहीं लिखा 
न सही 
पर आज मैं तुमसे और सारे 
ब्रहमांड से कहती हूँ 
अगर हमें लिखने दिया होता 
धर्म ग्रन्थ तो आज
 सारी दुनिया में होता प्रेम 
न बंटे होते लोग न होता ग्रंथो और जमीन का बंटवारा 
और मै, 
न होती इतनी त्याज्य 
 बदल देती 
स्त्री पुरुष के ऊँच नीच को 
स्थापित करती समाज में
 शिव और शक्ति के संतुलन को...



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