Monday, 24 August 2015

रात भर जागती रहती है,

ख्वाब आँखों में जगाकर के, सुला देता है|
खूब रोती है नज़र प्यार, भुला देता है |
वो परिंदे सहम गए हैं अब, नहीं आते |
कि ये इंसान है, ज़ेहराब पिला देता है |
ये मुहब्बत यकीन भी तो, बदगुमानी भी |
दिल डराता है तो चेहरा भी खिला देता है |
दोस्ती हासिल-ए-ईमान, ज़िंदगी का सबक |
कहीं कान्हा को सुदामा से, मिला देता है |
फूँक देता है ये तेज़ाब, मुहब्बत का मगर |
चाह मिलती है तो चाहों का, सिला देता है |
रात भर जागती रहती है, कलेजे में जलन यही तूफान चरागों को, जला देता है |


..कनुप्रिया

धड़कनों से कभी फरियाद तो, करती होगी।

शब-ए-फ़ुरक़त में सवालात तो, करती होगी ।
धड़कनों से कभी फरियाद तो, करती होगी।
रूठ जाती थी जो तनहाई में, अकसर तुझसे । 
तेरी यादें भी मुझे याद तो , करती होगी।

आदमी आदमी से जलता है..!

चंद लाइनें बहुत ही खूबसूरत अगर आप तक पहुँच सकें....। 
फजूल ही पत्थर रगङ कर आदमी ने चिंगारी की खोज की,
अब तो आदमी आदमी से जलता है..! 
मैने बहुत से ईन्सान देखे हैं,
जिनके बदन पर लिबास नही होता।
और बहुत से लिबास देखे हैं,
जिनके अंदर ईन्सान नही होता।
कोई हालात नहीं समझता ,
कोई जज़्बात नहीं समझता ,
ये तो बस अपनी अपनी समझकी बात है..., 
कोई कोरा कागज़ भी पढ़ लेता है,
तो कोई पूरी किताब नहीं समझता!!
"चंद फासला जरूर रखिए हर रिश्ते के दरमियान! 
क्योंकि"नहीं भूलती दो चीज़ें चाहे जितना भुलाओ....!.....
एक "घाव"और दूसरा "लगाव"...

Sunday, 16 August 2015

गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष

आज गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष
सूना है, उदास सा अकेला
कल तक जो उसकी गोद में
खेला करते थे, वे बच्चे
आज बड़े हो गये हैं

धूल भरे उलझे बालों की
चोटियां गूथती वो गुड़िया जैसी थी
और उसे मारता, दुलारता वो
नन्हा पर शैतान सा बच्चा

परदेश गए थे जब दोनों तो यहीं पर
अपने दोस्तों से मिलकर
फफक उठे थे सारे और फिर
वापस आने का वादा कर गए

उनकी राह देखते आज बरगद का पेड़
अपनी लटें बिछाए बैठा है पर
उसकी जवानी के दिनों के बच्चे
जवान हो गए है, फिक्र में खो गए हैं

अब उनकी दुनिया
बहुत बड़ी हो चुकी है
शायद बरगद से भी बड़ी जहां,
खेलकर वे बड़े हुए थे

और जर्जर होता वृक्ष इस आस में 
किसी दिन ढह जाएगा कि 
शायद वापस आकर कभी परदेश से 
यहां तक पहुंचेंगे उसकी आंखों के तारे

मां मैं तेरी जैसी ही दिखती हूं

मेरे बचपन के गीतों में
तुम लोरी और कहानी में
तुम मुझमें हर पल हंसती हो
मैं तेरी जैसी ही दिखती हूं

वो दिन जब तुम मुझको ओ मां
गलती पर डांटा करती थी
फिर चुप जाकर कमरे में उस
खुद ही रोया करती थी मां

तुम पहला अक्षर जीवन का
तुम मेरे जीवन की गति हो
खुली आंखों का सुंदर स्वप्न
दुनिया में मेरी शीतल बयार

मैं तेरी छाया हूं देखो
तेरे जैसी ही चलती हूं
तेरे जैसी ही भावुक हूं
तुम जैसी ही रो देती हूं

अपने आंचल की ओट में मां
हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने
औरत होने का दंश झेलकर
अभागन कहलाकर

मेरी आजादियों पाबंदियों 
और दहलीजों में तुम हो पर मां, 
नहीं पूजूंगी तुम्हारी तरह जीवन भर 
किसी पत्थर दिल को अपना राम बनाकर

गुलाम बनकर जिओगे तो

गुलाम बनकर जिओगे तो.
कुत्ता समजकर लात मारेगी तुम्हे ये दुनिया
नवाब बनकर जिओगे तो, 
सलाम ठोकेगी ये दुनिया…. 
“दम” कपड़ो में नहीं, जिगर में रखो…. 
बात अगर कपड़ो में होती तो, सफ़ेद कफ़न में, 
लिपटा हुआ मुर्दा भी “सुल्तान मिर्ज़ा” होता.

अब बहू हो चुकी है वह अल्हड सी लड़की

वह अल्हड सी लड़की अब बहू हो चुकी है

नर्म हाथों से वह रोटियां उठा लेती है
जिसे चिमटे से छूने में भी डरती थी
बाबा की राजकुमारी
अब पति के इशारों पर चलती है

चावल से कंकड़ों को बीनती
सिल-बट्टे पर मसाले पीसती
माथे पर आए पसीने को पोंछती
मुस्कुराती है हर आदेश पर

किसी का खाना किसी का बिछौना
किसी का पानी किसी का दाना लिए
दिन-रात घर में डोलती
आमदनी और खर्चे को जोड़ती

हर पल फुदकती, चहकती वो लड़की
सहनशील, संस्कारी बन गई है
बोलना मना है उसे किसी के बीच
अपनी राय लिए सो जाती है हर रात

सुबह शाम तो होती है रोज पर
रोटियों को गोल-गोल घुमाते
बच्चों के टिफिन लगाते
झूठे बर्तन मांजते निकल जाती है

वह हंसती है क्योंकि
उसके पति और बच्चे खुश हैं
उसकी खुशी के मायने बदल जो चुके हैं
वह अपने लिए नहीं उनके लिए खुश होती है 

वह भूल चुकी है कि चारदीवारी से बाहर
दुनिया कैसी दिखती है, सुबह कैसी लगती है 
वह भूल चुकी है अपना अस्तित्व, अपनी पहचान
उसे नहीं कहलाना बाबा की गुड़िया या मां की बिटिया 

वह अल्हड़ सी लड़की अब बहू हो चुकी है।