Thursday, 27 August 2015

धूल भरे उलझे बालों की चोटियां गूथती वो

आज गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष
सूना है, उदास सा अकेला
कल तक जो उसकी गोद में
खेला करते थे, वे बच्चे
आज बड़े हो गये हैं

धूल भरे उलझे बालों की
चोटियां गूथती वो गुड़िया जैसी थी
और उसे मारता, दुलारता वो नन्हा
पर शैतान सा बच्चा

परदेश गए थे जब दोनों तो यहीं पर
अपने दोस्तों से मिलकर
फफक उठे थे सारे और फिर
वापस आने का वादा कर गए

उनकी राह देखते आज बरगद का पेड़
अपनी लटें बिछाए बैठा है पर
उसकी जवानी के दिनों के बच्चे
जवान हो गए है, फिक्र में खो गए हैं

अब उनकी दुनिया
बहुत बड़ी हो चुकी है
शायद बरगद से भी बड़ी जहां,
खेलकर वे बड़े हुए थे

और जर्जर होता वृक्ष इस आस में 
किसी दिन ढह जाएगा कि 
शायद वापस आकर कभी परदेश से 
यहां तक पहुंचेंगे उसकी आंखों के तारे

मां हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने

मेरे बचपन के गीतों में
तुम लोरी और कहानी में
तुम मुझमें हर पल हंसती हो
मैं तेरी जैसी ही दिखती हूं

वो दिन जब तुम मुझको ओ मां
गलती पर डांटा करती थी
फिर चुप जाकर कमरे में उस
खुद ही रोया करती थी मां

तुम पहला अक्षर जीवन का
तुम मेरे जीवन की गति हो
खुली आंखों का सुंदर स्वप्न
दुनिया में मेरी शीतल बयार

 मैं तेरी छाया हूं देखो
तेरे जैसी ही चलती हूं
तेरे जैसी ही भावुक हूं
तुम जैसी ही रो देती हूं

अपने आंचल की ओट में मां
हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने
औरत होने का दंश झेलकर
अभागन कहलाकर

मेरी आजादियों पाबंदियों 
और दहलीजों में तुम हो पर मां,
नहीं पूजूंगी तुम्हारी तरह जीवन भर 
किसी पत्थर दिल को अपना राम बनाकर

कुएं का पानी हर मौसम में

गांव की झोपड़ियों के बीच
एक कुएं का पानी हर मौसम में
सबकी प्यास बुझाता है
तृप्त चेहरे देख, विचित्र संतोष उसमें ‘जीवन’ भर देता है।

लगभग न दिखने वाले अस्तित्व में भी
अपनी सूखती धमनियों से
निचोड़ कर तमाम जलराशि
उस गांव की छोटी-छोटी बाल्टियों में भर देता है

कुएं की डाबरों में सिमटी जलराशि ने
जैसे कर लिया हो गठबंधन
धरती की अथाह जलराशि से
कि वो सूखकर भी खाली नहीं हुआ है

गांव के घरों की ढिबरी की रोशनी
नहींं पहुंचती उसके अंधेरे वर्तमान तक
लेकिन वह हर दिन सूखते हुए भी
सींच रहा है सैकड़ों जीवन

कोई अभिलाषा शेष नहीं है
उम्मीद कोई पैदा नहीं होनी है अब
उसे मालूम है अपना अंजाम पर उससे पहले 
वह निभा रहा है कर्त्तव्य धरती पर ‘जीवन’ कहलाने का

मेरे बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो

मेरे बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो
खुद से दूर भेजना चाहते हो
अपने आंगन की लाडली को
किसी को सौंप देना चाहते हो

मेरे प्यारे बाबा ऐसा वर ढूंढो
जो मेरा हाथ थामकर चले
सात जन्मों के बंधन नहीं मानती मैं
पर यह जन्म उसका और मेरा साझा हो

मेरे हिस्से की धूप-छांव
साथ खड़े रहकर महसूस करे
पर ऐसे वर से मत मांधना बंधन मेरा
जो किसी के साथ कभी खड़ा ही न हुआ हो

जो अपनी शान और अस्तित्व को
थोपकर मुझे जड़ कर दे
मत देना मेरा हाथ उसके हाथों में
जो मेरी सरलता को ब्याहकर खरीद ले

जो प्रेम का मतलब न जानता हो
उससे प्रीति का संबंध मत लगाना मेरा
कि कुंद कर दे वो मेरे भीतर की स्त्री का हृदय
कठोरता के लबादे से ढंक दे कि मैं उस जैसी ‘सभ्य’ दिखूं

मेरी चंचलता को अपमान कह दे
जो मेरी शरारतें जिसके समाज में असभ्य लगें
मत ब्याहना ऐसे महलों में रहने वाले से
जो आपकी परवरिश का उपहास करे

छोटी-छोटी खुशियां बटोर कर
आंचल मैं फैला दूं तो भर दे जो
चांद-सितारों की चाहत नहीं मुझको
ब्याहना उससे जिसकी आंखों में नींद न आए मेरे रो देने पर

वर वही खोजना बाबा
जो मेरा देवता बनने को दबिश न दे
मेरा आधा हिस्सा बनकर जिए मुझमें
कि उसके या मेरे प्रेम पर ‘हमारा’ हक हो

चली जाऊंगी उससे ब्याह करके
जो मुझे मेरे हिस्से के आकाश को चूमने दे 
जो बांट ले मेरे जनम भर की रातें-दिन, सुख-दुख 
मेरे जीवन के शब्दकोश से मिटा दे अकेलापन 
बाबा ऐसा वर ढूंढो।

Wednesday, 26 August 2015

मां छांव तो पिता वो बरगद का पेड़ हैं

मां अतुल्य है जीवन की साक्षी है
लेकिन पिता बिना मां की परिभाषा कहां बन पाती
मां छांव तो पिता वो बरगद का पेड़ हैं
जिसकी छत्रछाया में मां हमें पालती है
 
मेरे पिता, बचपन में आपकी फटकार के संग
मैंने आपका दिल धड़कते महसूस किया है
पर मां की डांट के बाद आपका प्यार
मन के कोनों में प्रकाश भरता रहा है

आप हैंं तो जीवन सुंदरतम है
आपके होने से ही आंखों में इतने रंग हैं
आपका होना ही मेरा खुद पर विश्वास है
मेरे जीवन के कल्पतरु हैं आप पिता

जीवन के तमाम विषाद पीकर
हर दर्द को अपने सीने में समेटकर
 आपने दी हर मुश्किल को चुनौती
कि आज मेरी सफलताएं आपसे ही हैं

मेरी उपलब्धियों पर मुस्कुराते आप
मेरी विफलताओं पर अब कुछ नहीं कहते
नहीं, इतना बड़ा तो नहीं होना था मुझे
आप ही मेरे नायक हो, कुछ सवाल तो किया करो

आपका कुनबा बढ़ रहा है लेकिन
इस वटवृक्ष की जड़ें आप ही हो
कि आपकी गोद में सिर रखकर
अब भी वक्त बिताना अच्छा लगता है,

जी चाहता है तोड़ दूं दीवार घड़ी की सुइयां
कि आप बूढ़े नहीं हो सकते कभी
आपकी निरंतरता मेरी रगों में है
मैं दुनिया में आपका ही प्रतिरूप हूं,

आपके होने से ही मैं हूं पिता
आपका कभी न होना कल्पना से भी परे है
इन आंखों में सपने भरने वाले पिता
मैंने आपके बिना दुनिया सोची नहीं अब तक

मेरे मन के जीवट योद्धा 
जागो कि तुम ढले नहीं, बस थक गए हो 
मैं हूं तुम्हारी आत्मशक्ति देखो मुझे 
तुम्हारी आत्मा का अंश हूं, मुझमें जवान होते पिता

तुम्हारी परछार्इं को कैद कर लेना चाहती हूं

दिन भर की थकान के बाद
सूरज जब ढलने लगता है
उसकी सुनहरी रश्मियों से टकराकर बनने वाली
तुम्हारी परछार्इं को कैद कर लेना चाहती हूं

छत की मुंडेर पर खड़ी रहकर अनवरत
उस परछार्इं को जाते हर दिन देखती हूं
जो तुम्हारे लौटने के साथ-साथ
मुझसे दूर होती चली जाती है

हर दिन तुम्हें छूकर आने वाली
इन किरणों को आंखों से स्पर्श करती हूं
जैसे तुम्हारे और मेरे दरमियान
स्रेह का अस्तित्व बस इन्हीं से है

मेरी पहुंच से दूर रहकर भी
तुम मुझे रोज छूकर गुजर जाते हो
और तुम्हारी रोशन छवि निहारकर
मेरा मन प्रकाश से भर जाता है

 मेरे छज्जे से तुम्हारे छज्जे के कोने तक
ये दूरी जैसे जनम भर की हो पर
रोज तुम्हारे ओझल होने से पहले
मन की मखमली कैनवास पर
तुम्हारी तस्वीर उतार लेती हूं

ये फासले कब तक रहें कुछ पता नहीं लेकिन 
तुम्हारे प्रेम के उजाले से मेरा अस्तित्व जगमगा उठा है 
और देखो यह रोशनी हमारे मिलन की 
मौन रहकर इस रात को सवेरा बना रही है।

आपकी उंगली उस सहारे की तरह है पापा

मेरे जीवन ग्रंथ, मेरे कर्मयोगी पिता
आपके लिए आज का एक दिन तो क्या
जीवन भर जश्न मनाऊं तो कम है
कि आपके रूप में ईश्वर का हाथ मेरे सिर पर है

आप वेदों की पवित्रता हो मेरे लिए
जिसमें सजी हैं मेरे पुरखों की परिचय ऋचाएं
आपकी आंखों में साक्षात वह ब्रह्म है
जो पीड़ाओं का पहाड़ ढोकर भी उफ नहीं करता

आप मेरे साथ हैं तो तीनों लोक, चौहदों भुवन मेरे हैं
आप हंसते हैं तो जीवन में मुस्कुराहट बिखर जाती है
आपकी मौजूदगी है तो सुंदर हेमंत और बसंत क्या
चारों दिशाएं, आठो ऋतुएं मेरी बाहों में होती हैं

आप नाराज हो जाएं तो ऐसा लगता है
जीवन के आकाश पर बिजली कड़क उठी हो
अस्तित्व की बुनियाद कमजोर लगने लगती है
आपके टूटने से मेरी उम्मीदें जैसे परास्त होने लगती हैं

आपकी उंगली उस सहारे की तरह है पापा 
जिसके दम पर मेरा जीवन सार्थक होता है 
सचमुच पिता जीवन के हर लम्हे में शामिल हैं आप 
और मां तुम उस हर लम्हे की सुंदर साक्षी हो।