Wednesday, 5 August 2015

जिँदगी मेँ चाहेँ कितनी भी खुशियाँ (Real Fact)

Real Fact...
जिँदगी मेँ चाहेँ कितनी भी खुशियाँ
क्यूँ ना हो हमारे पास लेकिन हम
तब तक खुश नही हो सकते...!!

 जब तक हमारे साथ वो नही है
 जिसके साथ हम खुश होना चाहते है...!!

हम अपनी यादगार गजल छोड जाएगे

दौलत ना कोई ताजमहल छोड जाएगे
हम अपनी यादगार गजल छोड जाएगे
तुम आज चाहे जितनी हँसी ऊडाओ
मगर रोता हुया तुम्हे कल छोड जाऊगा

जंगल मेँ सभी जानवरोँ ने सोचा कि लोकतंत्र लाया जाये।

एक बार की बात है, जंगल मेँ सभी जानवरोँ ने सोचा कि शेर की राजशाही खत्म करके लोकतंत्र लाया जाये। तो इसके लिये एक संविधान बनाया गया और फिर आम चुनाव कराये गये। जिसमेँ जंगल के मंत्रीमंडल का प्रमुख गीदड़ को बनाया गया। और गीदड़ ने सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा लोमड़ियोँ को सौपी। लोमड़ियो ने छिपकलियो की प्रशासन करने तथा सुरक्षा व्यवस्था देखने के लिये भर्ती की। दण्ड देने के लिये चीटीँ को नियुक्त किया गया। शेर सहित अन्य जानवर 'हम जंगल के लोग' बने। इस प्रकार जंगल एक राज्य के रुप मेँ उभरा। पर गीदड़ गलत काम करने लगा और संविधान को निष्क्रिय करने के लिये लोमड़ी मौसी ने चाल चली। लोगो से बोलने का या विरोध करने का हक छीन लिया। इस प्रकार गीदड़ सरकार आत्ममुग्धता को पोषित रखा। जनता छिपकली से डरती नही है पर सबको घिन लगती है कि कौन पचड़े मेँ पड़े। अभी ऊपर कूद पड़ेगी। पर जनता को क्या पता छिपकली खुद डरपोक है। जंगल मेँ रहने वाली जनता संविधान और मौलिक अधिकार से अनभिज्ञ है इसलिये वो दण्ड देने वाले प्राधिकरण के पास नही जाती। और लोमड़ी से शोषण कराती रहती है, गीदड़ भभकी से डरती है। पर जनता ये नही जानती है कि चीटीँ जब नाक मेँ घुस जाती है तो जान लेकर ही पीछा छोड़ती है। मेरे लेख का मनुष्य के समाज से लेना देना नही है। ये जंगलराज की कहानी है। पर कुछ भी हो ये जंगली मनुष्योँ से अच्छे है।:-):-)

जिन्दगी मेँ बहुत ऊबड़ खाबड़ रास्ते आते है।

जिन्दगी मेँ बहुत ऊबड़ खाबड़ रास्ते आते है। मेरे ख्याल से अच्छे वक्त का अहसास शायद दो वक्त पर होता होगा। एक तो खुद की सफलता पर दूसरा किसी के प्यार पर। सबसे ज्यादा खराब लाइफ मेँ वो टाइम होता है जब आप पर्वतारोहण कर रहे होते है और आपके अपने आपकी टांग खीँचते है या पर्वत से नीचे गिर जाने की परिस्थितियोँ को पैदा करते है। पर आप इन पर गुस्सा भी नही कर सकते। सामाजिक व्यवस्था ऐसी है। जिसके साथ आप प्रेम के बंधन मेँ बंधे होते है, वो भी खराब वक्त मेँ आपको तोड़ देता है। आपके घोर अपमान का कारण बना व्यक्ति आपके जीवन को पशुवत बनाने की परिस्थितियाँ ला देता है। कभी कभी ऐसा भी होता है, जब हम एकदम अकेले पड़ जाते है। सब सामने होते है फिर भी लाइफ काला पानी की सजा जैसी लगती है। जिन्दगी कुंद हो जाती है। ऐसे मेँ सब्र रखने के सिवा क्या किया जा सकता है? मै जानती हूँ मौत से ज्यादा तो कुछ नही हो सकता। वैसे भी भगवान ने अपना रोल अदा करने के लिये भेजा है। एक दिन चुपचाप ख़ामोशी के साथ चले जायेगेँ।

दो गज घूंघट...

दो गज घूंघट... भारत मेँ जब चोली के नीचे और चुंदरी के पीछे जैसे गाने बनेगेँ तो क्या होगा?:-) 
बहुत खूब बहुत बढिया! जिस भारत की सभ्यता घूघंट करने और करवाने मेँ निहित हो, वहाँ पोर्नोग्राफी देखने मेँ चौथा स्थान क़ाबिले तारीफ है। जहाँ लाइट ठीक से न मिलती हो, वहाँ मोबाइल पर पोर्नोग्राफी देखने मेँ तीसरा स्थान तो और भी गौरवान्वित कराने लायक है। हमने नग्नता मेँ बहुत तरक्की कर ली है। देखिये हम केवल नवदुर्गो मेँ बच्चीओ को कन्या मानते है बाकी अकेले मेँ बच्चीओ की पोर्न साइड अच्छी लगती है। हम बहू भी लाते है पर पर्दा जरुर कराते है। दो गज घूंघट निकालकर खेतो मेँ शौच मेँ हमेँ दिक्कत नही है। वाह! ऐसे लोगो के तो थप्पड़ मारने का भी मन नही करता बल्कि दया आती है। बेशक पोर्न देखता व्यक्तिगत अधिकार हो सकता है पर बच्चो की पोर्न देखना और अव्यस्को का पोर्न देखना उचित है? आपको अच्छा लगेगा कि अभी दूध के दाँत भी नही टूटे और पोर्न साइड देखे बच्चे। जिस उम्र मेँ बुजुर्ग संस्कार देते है, उस उम्र मेँ ये बीजारोपण किया जा रहा है।

Monday, 3 August 2015

धूप ने मुझे तपा दिया बरसात ने मुझे टिका दिया

इस सृष्टि मै ,
कुछ भी बेवज़ह नहीं ,
मुझ से पूछकर मेरी औकात ,
समझकर धूल मुझे उड़ा देने वालों का नहीं है ,कोई कसूर ,
मै धूल जहां पर बैठती , सब धूंधला कर देती जिस पर चढ़ी सब धूमिल ,
 कभी घर आँगन में पढ़ी ,मैं धुल जहवां बैठती वहां से हटा दी जाती ।
कोई ठिकाना नहीं मेरा ,
कभी हवा के झोंको के साथ इधर -उधऱ भटकती जहां हवा पटकती वहीँ बैठ जाती आँधी,
-तूफ़ान संग उड़ती. ,रेत के टीले बनाती. नहीं था
मुझे कोई एहसास की ,मेरा भी बन सकता है अस्तित्व, 
पर मैं धूल जब एक जगह एकत्रित होती गयी तब मुझे मेरी पहचान मिली , 
एक के ऊपर एक परत जब एक चढ़ती गयी ,
 धूप ने मुझे तपा दिया बरसात ने मुझे टिका दिया , 
पहले में बनी पाषाण ,फिर विशाल पर्वत जब तक थी मै ,
 बिखरी बिखरी अकेले में न थी मेरी कोई औकात , 
पर्वत बनकर मैंने खुद को साबित किया, 
मुझे मेरी पहचान मिली,मेरा जीवन सफल हुआ ।

मेरे सपने पूरे करने की आजादी दी।

मेरे अब तक के जीवन के आधार मेरे पिता रहे हैं वरना मैं कब की टूट कर बिखर चुकी होती। मेरा बचपन एरच में बीता, मेरे तीन भाई हैं। मेरे पिता की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बावजूद उन्होंने मुझे पढ़ाया। मेरे सपने पूरे करने की आजादी दी।
इंटर तक की शिक्षा गांव में पूरी की, आगे की पढ़ाई के लिए मैंने पापा से गुजारिश की, जिसे उन्होंने काफी मान-मनौव्वल के बाद स्वीकार करते हुए मेरा एडमीशन झांसी में कराया। झांसी में मौसी के घर रहकर मैंने बीएसएसी की पढ़ाई शुरू की। परीक्षा के दौरान दो पेपर देने के बाद ही मुझ पर मौसी व उनके घरवालों ने गलत आरोप लगाए और मेरे घर फोन कर दिया, जिस पर पापा रात के दो बजे मौसी के यहां पहुंचे। अगले दिन सुबह मेरा तीसरा पेपर था। पापा ने आगे न पढ़ने की बात कहते हुए किसी तरह पेपर देने के लिए जाने दिया। मैं पेपर के दौरान सोचती रही कि अब मेरे सपने अधूरे ही रह जाएंगे। पेपर देकर वापस आई। किसी ने मेरी नहीं सुनी। लेकिन अगर आप सच्चे हैं तो भगवान आपकी मदद करता है। इसी तरह मेरे दूर की चाची की बहन जो पारीछा में रहती हैं, जिनसें मैं कभी पहले नहीं मिली थी, मेरे लिए भगवान बन गईं, उन्होंने मुझे अपने यहां रखकर बीएससी फर्स्ट ईयर की पढ़ाई पूरी कराई।
मेरी गलती न होने की बात पता चलने पर पापा ने झांसी में किराए पर कमरा दिलाते हुए दादी के साथ रहने और पढ़ाई पूरी करने को कहा। झांसी में रहने के दौरान पापा को गांव के व अन्य लोगों ने काफी भला-बुरा कहा। बोले कि बेटी की पढ़ाई में पैसा बर्बाद कर रहा। कुछ लोगों ने मुझ पर गलत आरोप लगाए, लेकिन मेरे पापा ने किसी की बात नहीं सुनी। मेरे शिक्षकों ने भी मेरा साथ दिया। इससे मेरा मन मजबूत हुआ। इस बीच बीएससी सेकेंड ईयर पूरा कर लिया और कंप्यूटर सीखने लगी, पापा ने पढ़ाई की लगन देख मुझे लैपटॉप दिलाया। दादा ने पेंशन के पैसे मेरी पढ़ाई के लिए दिए। उनके कांपते हाथों से पैसे लेना आज भी मुझे रुला देता है। लैपटॉप मिलने से पढ़ाई का मेरा छोटा आंगन बड़ा हो गया। इस बीच बीएससी पूरी कर ली। पापा ने हौसला बढ़ाया तो बी-लिब किया, अभी एमलिब कर रही हूं। बीटीसी का फॉर्म भी डाला है, लेकिन अब तक कॉलेज न मिलने से मायूस हूं। कई सारे फॉर्म भरे हैं, मेहनत करती रहूंगी, कभी न कभी तो सफलता मिलेगी ही। असफलता के बारे सोचकर मैं पीछे नहीं हट सकती।
वर्तमान में चंद्रशेखर आजाद इंस्टीट्यट ऑफ साइंस टेक्नोलॉजी से एमलिब कर रही हूं। मेरा सपना है कि टीचर या लाइब्रेरियन बनकर लोगों को शिक्षित क रूं और उन्हें बता सकूं कि किताबों में लिखे शब्द बस काली स्याही भर नहीं हैं। कुछ महीने पहले आईआईएमआर के झांसी सेंटर में प्रवेश लेना चाहा, लेकिन उसकी फीस अधिक होने से मन मसोस कर रह गई। झांसी में रहने का कोई ठिकाना नहीं रहा। कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनसे घबराकर पापा ने घर से ही पढ़ाई करने को कहा है। लेकिन गांव से आगे बढ़ने के दरवाजे सीमित हो गए हैं। फिर भी मेरा प्रयास अंत तक जारी रहेगा।
मेरे घरवालों को मेरी शादी की चिंता सताने लगी है। सबको मेरी नौकरी लगने का इंतजार है। पापा सोचते हैं कि मेरी नौकरी के बाद उन पर शादी के खर्च का बोझ कम हो जाएगा, साथ ही मेरा अच्छे परिवार में रिश्ता होगा। मैं चाहती हूं कि मेरी जहां भी शादी हो, बस वो लोग पढ़े- लिखे हों, मुझे आगे पढ़ने का मौका दें, मैं अपनी शिक्षा से अन्य लोगों को शिक्षित करना चाहती हूं। मैं किसी भी कीमत में हार नहीं मानूंगी। मेरे घरवालों को मुझसे बहुत उम्मीदें हैं मैं उनकी उम्मीदों को पूरा करना चाहती हूं और मुझ पर गलत आरोप लगाने वाले और बेटियों को गलत समझने वाले लोगों के मुंह बंद करना चाहती हूं। 
मैं सिर्फ अपने लिए पढ़कर नौकरी नहीं हासिल करना चाहती, बल्कि मैं उन सभी मां- बाप को दिखाना चाहती हूं जो समझते हैं कि बेटियां सिर्फ पराया धन हैं, उन्हें उच्च शिक्षा दिलाना बेकार है। मेरी पढ़ाई में सहयोग करने वाले किसी भी शख्स का मैं चेहरा नहीं भूल सकती। मैं सफल होकर उन सबका शुक्रिया अदा करूंगी और हर पहलू पर उनका साथ दूंगी। करिअर के मुकाम तक अभी नहीं पहुंच सकी हूं, इसके लिए संघर्ष जारी रहेगा।