Saturday, 6 June 2015

क्या मोहब्बत क्या हुस्न क्या शौक़ क्या दीदार.अब लेटा हु अर्थी में

क्या मोहब्बत क्या हुस्न क्या शौक़ क्या दीदार.अब लेटा हु अर्थी में और मेरे अपनों की आखो से झलक रहा है प्यार ....न जाने ये लोग आज इतने आँशु क्यों बहा रहे है.या तो सच में गम है इन्हे या फिर ये किरदार अपना निभा रहे है....जब था जिन्दा तो की लाखो बुराइयाइन्होने मेरी.अब मर चूका हु तो अच्छाइयाँ मेरीगिनवा रहे है ...दर दर की खायी है मैंने ठोकरे जीते जी अकेले .आज मर गया तो शौक से ये कंधो पे लेजा रहे है....जिन्होंने चेहरा देख के मेरा बंद कर दी थी अपनी चौखटे .आज मेरी एक झलक पाने को यो कतार में आ रहे है....देख के नियम दुनिया के मै आज अजीब सी कश्मकश में था .मौत है जब इतनी शानदार मै क्यों जिंदगी के बस में था ...अब जल चुकी है चिता राख हो चूका हु मैं ....मिट्टी की संतान था मिटटी में खाक हो चूका हु मै........

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