Tuesday, 23 June 2015

बॆटियॊं का बाप हूँ मैं जानता हूँ सच सुनों,

सूख जाते फ़ूल पत्तॆ शाख़ भी हिलती नहीं !!
क्यूँ ग़रीबी कॆ बगीचॆ मॆं कली खिलती नहीं !!
बॆटियॊं का बाप हूँ मैं जानता हूँ सच सुनों,
आज कॆ इस दौर मॆं बॆटी सहज पलती नहीं !!
बात करतॆ हॊ यहाँ अच्छॆ दिनॊं की तुम बहुत,
तीरग़ी सॆ है भरी यॆ रात क्यूँ ढलती नहीं !!
दॆख लॊ मुझकॊ तुम्हारॆ मुल्क का मज़दूर हूँ,
आज भी मुझकॊ ज़िया-ए-रॊशनी मिलती नहीं !!
आसमां की छांव मॆं दिन रात बीतॆ ‘राज़’ के,
तल्ख़ियॊं की आग से माँ की दुआ जलती नहीं !!

No comments:

Post a Comment