Thursday, 18 June 2015

ख्यालों का कुछ ऐसा समां बंध गया है ,

ख्यालों का कुछ ऐसा समां बंध गया है , 
कि दर्द हीं दिल का दवा बन गया है , 
सपने बिखर रहे बन के रेत हाथों से , 
जो बचा था , 
कुछ धुंवा कुछ हवा बन गया है | 

मंजीलें थीं मेरी तेरे आस पास , 
पर जिस पे साथ चलते थे वो रासता किधर गया , 
जो ना डरता था ज़माने में किसी से, 
आज ख़ुद क्यों अपने आप से डर गया | 

 क्यों ये जानना ज़रूरी था की कौन सही , 
कौन ग़लत है, अब दूर होकर क्यों पास आने की तलब है, 
फ़िर से पुरानीं गलतियों को दोहराने को जी चाहता है , 
बदले की आरजू है या प्यार की कशीश है |

तुम हीं रुक जाओ की वक्त तो रुकता नहीं , 
क्यों ये पर्वत तो कभी झुकता नहीं , 
मेघ बनके बरस जाओ तुम मुझ पर , 
की ओस की बूंदों से प्यास बुझता नहीं | 

तूफ़ान है तूझमें मुझे टूटने बीखर जाने दो , 
इससे अच्छा और क्या मिल सकता सिला है , 
ख्यालों का कुछ ऐसा समां बंध गया है , 
की दर्द हीं दिल का दवा बन गया है |

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