Thursday, 4 June 2015

नदी झरने समंदर भी अधर पे मुस्कुराते हैं

तुम्हारे प्रेम के पंछी नज़र में गीत जाते हैं ,
नदी झरने समंदर भी अधर पे मुस्कुराते हैं
इसी उम्मीद पे जीती हूँ कि कह कर गए थे तुम,
अंधेरी रात कितनी हो सवेरे जीत जाते हैं

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