Tuesday, 23 June 2015

जीवन कॆ दिन ऎसॆ बीतॆ,पल-पल हारॆ पल-पल जीतॆ

जीवन कॆ दिन ऎसॆ बीतॆ,पल-पल हारॆ पल-पल जीतॆ !!
उथल-पुथल कॆ दिवस रात थॆ,बड़ी निराली उस की माया,
साथ-साथ थॆ सुख-दुख दॊनॊं,घट-घट प्यासा पनघट पाया,
चातक तृष्णा मानॆ कैसॆ,सुधा भरॆ घट झटपट रीतॆ !!
जीवन कॆ दिन ऎसॆ बीतॆ,पल-पल,,,,,
छाँव सुलानॆ आ गई अगर,घर पर जानॆ अनजानॆ मॆं,
धूप खड़ी हॊ जाती आ कर,उस सॆ पहलॆ सिरहानॆ मॆं,
तुम्ही बताऒ आखिर मॆं हम,कैसॆ मरतॆ कैसॆ जीतॆ !!
जीवन कॆ दिन ऎसॆ बीतॆ,पल,,,,,,
सहन नहीं हॊ पाता था यह, तब अपनी भी तरुणाई थी,
आँख मिचौली कह लॊ वरना,किस्मत की हाथा-पाई थी,
अमिय संग हम गरल गटागट,बड़ॆ मजॆ सॆ रहतॆ पीतॆ !!
जीवन कॆ दिन ऎसॆ बीतॆ,पल,,,,,
कभी चैन की नगरी मॆं हम,कभी दर्द कॆ मुख द्वारॆ पर,
अपनॆ मन की नहीं चली थी,हम चलतॆ रहॆ इशारॆ पर,
नॊंच रहॆ थॆ अगल बगल सॆ,राग द्वॆष कॆ खूनी चीतॆ !!
जीवन कॆ दिन ऎसॆ बीतॆ,पल,,,,,

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