Sunday, 31 May 2015

सरदारजीने अपनी और अपने बिवीकी पहचान कराई

संता एक शाम अपनी बिवी, छोटा 3 सालका लडका और छोटी 4 सालकी लडकी को लेकर एक पार्टीमें गया. संताने हालहीमें इंग्लीश स्पिपींगका कोर्स लगाया था इसलिए उसने अपनी और अपने पुरे परीवारकी पहचान सबको इंग्लीशमें कराई -

आय ऍम सरदार ऍन्ड शी इज माय सरदारनी - सरदारजीने अपनी और अपने बिवीकी पहचान कराई.

हि इज माय किड ऍन्ड शी इज माय किडनी - सरदारजीने अपने छोटे लडके और लडकीकी पहचान कराई. 

उसका इल्जाम है

उसका इल्जाम है
वह लगातार ताकता है मुझे
लेकिन यह तो बता
की ' मै ताकता हूँ'
यह  पता कैसे चला तुझे

सरदारजी टॅक्सी में घर से हवाई अड्डेके लिए निकला था

एक सरदारजी टॅक्सी में घर से हवाई अड्डेके लिए निकला था. जाते जाते एक जगह बिचमेंही ड्रायव्हरने टॅक्सी रोक दी.

सरदारजी - क्या हूवा?

ड्रायव्हर - साब हम अब आगे नही जा सकते ... क्योंकी पेट्रोल खतम हो गया है..

सरदारजी - कोई बात नही ... टॅक्सी पिछे घर वापस लो.. 

गर मै सुबह से अपनी कार में निकलू तो

मुकेश अम्बानी : अगर मै सुबह से अपनी कार में निकलू
तो शाम तक अपनी आधी प्रॉपर्टी भी नहीं देख सकता
संता : हमारे पास भी ऐसी खटारा कार थी। .... बेच दी .

नीली झील में छिपकर जो चाँद बैठा है

नीली झील में छिपकर
जो चाँद बैठा है
तुम हाथ बढ़ाकर हटा दो
पानी निकाल लाओ
मेरे लिए और पहना दो
कभी कलाइयों में कंगन
सा कभी कानों में बालियों सा
बादलों को हटा कर कुछ
तारे तोड़ लेना
मेरी पायल में टांक
दो सितारों के घुँघरू
या अंगूठी में मोती सा
जड़ देना यूँ ही खेलें चाँद
तारों से हम तुम यूँ ही
रोके रहें रात और फिर छोड़ दें
इसे सागर तक बहते दरिया में .....

लडकियों को आत्म रक्षा के लिए लाठी चलानी सिखाई जाती थी

जेनरेशन गैप में मैने अपने बच्चों का वर्णन करते हुए अपनी माँ के बारे में थोड़ा बहुत लिखा है | मेरी माँ के पिता अर्थात मेरे जागीरदार नाना कालेज में प्रिंसिपल और जाने माने अंकगणित के माहिर थे | माँ अंग्रेजों के समय में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार ( पिकेटिंग ) करने के लिए धरने देती थीं मेरे चारो मामा स्वतन्त्रता सेनानी थे एक मामा जी आजाद हिन्द फौज में भाग लेने सुमात्रा गये थे आजाद हारने के बाद लौटने पर जेल गये लेकिन जल्दी ही देश आजाद हो गया , उन्होंने पहला चुनाव भी जीता , जल्दी ही उनकी मृत्यु हो गई | मेरी माँ और मौसी के स्कूल में उस जमाने में लडकियों को आत्म रक्षा के लिए लाठी चलानी सिखाई जाती थी मेरी मौसी दोनों हाथों से लाठी चलाती थी और मेरी माँ एक हाथ से, पूरा परिवार एक आदर्श परिवार परिवार था | उन दिनों ब्राह्मणों में संगीत ,ज्योतिष और आयुर्वेद सीखने का प्रचलन था नाना जी ने घर में सूरदास से अपने बच्चों को क्लासिकल म्यूजिक की शिक्षा दिलवाई मेरी अम्मा बहुत अच्छा गाती हैं |
जबकि मेरे पिता जी बहुत साधारण परिवार के थे लेकिन उन्होंने पढाई में स्कूल कालेज में सदा रिकार्ड बनाया | मेरे नाना को मेरे पिता बहुत पसंद आये उन्होंने रिश्ते की बात चलाई और मेरी माँ शायद सोलह बरस की होंगी उनका विवाह हो गया मेरे पिता जी बहुत गोरे हेंडसम थे फिर भी मेरी दादी ने बहू को देखा घबरा गई उनके घुटनों तक लंबे बाल गेहुआं रंग यह तो उनके बेटे को मोहित कर लेगी |हम पूछते माता जी मोहित क्या होता है ?वह चिढ़ कर कहती अरे नयनतारा बन जायेंगी |बहुत अच्छे दिन थे अम्मा सख्त थी पिता जी नर्म और हमारी दादी, हम उन्हीं को अपनी माँ समझते थे |सुबह हम सब की आँख अम्मा के राग भैरवी से खुलती कभी पिता जी भी उसमें सुर मिलाते अम्मा ने सबको हौबी में संगीत की शिक्षा दी मुझे भी सिखाने की कोशिश की परन्तु हारमोनियम के स्वर से कभी मेल नही बैठा अत :अम्मा कहती बेसुरी तेरे बस का म्यूजिक नहीं हैं आज भी घर में भजन कीर्तन होता हैं मैं बस ताली बजाती हूँ |
मुझ ग्रेजुएशन करनी थी घर से कालेज पांच मिनट की दूरी पर था लेकिन केवल लडकियों का कालेज काफी दूर था मुझे मेरी दादी के विरोध के बाद भी कोएजुकेशन में पढ़ने भेजा पढाई पूरी करने के बाद पी.एच .डी. करने दिल्ली भेजा |पढाई के मामले में अम्मा बेहद सख्त थी वह साइंस के अलावा किसी विषय को विषय ही नहीं समझती थी |हम चार बहने दो भाई थे मेरी शादी भी दिल्ली में हुई |मेरे पति देव का वर्णन करते समय वह उनकी डिग्री बाद में बताती इनका इस तरह बखान करतीं वह पुलिस का डाक्टर है पुलिस वाले उससे थर-थर कांपते है |
हमारा हंसता खेलता परिवार था मेरी एक बहन की शादी पढ़ते – पढ़ते मेरे पिता जी के मित्र परिवार के अच्छे जानकर के सपुत्र से हुई उनसे घर जैसे सम्बन्ध थे अत : लडके की ज्यादा पूछताछ भी नहीं कर पाये लड़का सर्वदुर्गुण सम्पन्न निकला सुसराल ने शर्मिंदा होने के बजाय बहन को इतना तंग किया जो कहानियों में ही सुना था जब हम लेजाना चाहते उनके आधा दर्जन पुत्रों के सामने मेरे पिता लाचार आखिर में मेरे जीजा श्री ने अपनी किसी पुरानी मित्र से विवाह कर लिया उनके घर में उससे पुत्र ने जन्म लिया | मेरी बहन की वहाँ जरूरत ही नहीं थी बेटा उन्होंने रख लिया बेटी मेरी बहन के साथ |मेरी बहन की उम्र इक्कीस बर्ष की थी सामने वाले पूरे दबंग और उच्च पदासीन ,उनका सपुत्र कालेज का नेता , मेरे पिता भी अधिकारी थे परन्तु बेटियों के बाप थे मजबूर थे | कानून कुछ भी कहे पर हम लाचार बेबस अपना घर शहर भी छोड़न पड़ा उस वक्त नौयडा नया बसा था वहाँ हमारा छोटा सा घर था परिवार वहाँ आ गया मेरी माँ ने हिम्मत नहीं हारी उन्होंने लडकी से नौकरी नहीं कराई घर में ही स्कूल खोल लिया |
मेरी माँ पिता जी में बहुत प्रेम था एक दिन मेरे पिता जिन्होंने कभी माँ के सामने पीठ नहीं मोड़ी थी ऐसी मोड़ी फिर कभी नही उठे |वह अपनी असमर्थता को सह नहीं सके | मैं विदेश में थी अम्मा ने गजब की हिम्मत दिखाई पिता जी को नोएडा से लेकर अपने घर मेरठ लाई मेरी बहन की नन्ही बेटी पिता जी के शव पर लेटी थी वह कुल एक वर्ष की थी जब मेरे पिताजी की शव यात्रा निकली पीछे भीड़ ही भीड़ माँ ने बच्चों को संयत रहने को कहा सबसे छोटी बहन सुन्न हो गई वह लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज की वोटिंग लिस्ट में थी एडमिशन पक्का था वह उठ नही सकती थी छोटा भाई चुपचाप जो काम होता करता या सिर झुका कर बैठा रहता उसका इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन हो गया था मेरे पिता जी को श्रद्धान्जली देने के लिए भारी भीड़ थी अचानक छोटा भाई चीखने लगा अम्मा सब संकोच छोड़ कर उसको संयत करने लगी लिख नहीं सकती घर पर कैसा पहाड़ टूटा था बस जिन्दा रहे|
अपने माता पिता की इकलोती लाड़ली बेटी अचानक रानी मधुमक्खी (मेरे पति का दिया नाम ) बन गई |किसी से मदद नहीं ली, सबने सिर जोड़ कर अम्मा के सुपरवीजन में बहुत मेहनत की आज नोएडा के सम्मानित लोगों की श्रेणी में आते हैं हैं सब कुछ है बस नहीं हैं तो हमारे पिता जी | जिस बच्ची को बेकार समझा था वह इंजीनियरिंग की पढाई कर रही थी उसका दादा रिटायर हो चुका था उसे देखने आया उसने पूछा तुम जानती हो मैं कौन हूँ पोती ने कहाँ हाँ मेरे बायलोजीकल बाप के बाप अब वह क्या बोलता | मेरी भांजी स्कालर शिप पर विदेश पढ़ने गई उसके बाद अमेरिका आज वह बहुत ऊचे पद पर काम कर रही हैं| उसके घर एक नन्हीं बच्ची ने समय से पहले जन्म लिया वह बेहद कमजोर थी उसने अम्मा को बुलाया अम्मा आप ही मेरी बेटी को बचा सकती हो और अम्मा 84वर्ष की उम्र में बम्बई गई उस बच्ची को बचा लिया | मेरी बहन को सभी जानते हैं लोग सुसराल में कमजोर पड़ी अपनी बेटियों को समझाने लाते हैं अब वह एक पत्रिका की सम्पादक है व्यंग भी लिखती हैं उसका बेटा भी माँ के पास आगया |
16 मई के दिन हमारे अनोखे पिता ने संसार से विदा ली थी अत: उनकी पुण्य तिथि के दिन हम सब इकट्ठा होते हैं सब बेहद उदास, काफी समय बीत गया ऐसा लगता है कल की बात है कभी कोई पिताजी कह कर चीखने लगता है हम सब रोने लगते हैं अम्मा सबको चुप कराती है कोई भी कह देता हैं अगर अम्मा तुम चली गई तो हम भी तुम्हारे साथ ही सता हो जायेंगे |सब बच्चे अम्मा से बेहद प्यार करते हैं उनका जन्म दिन मनाते हैं बकायदा पोतियाँ एंकरिंग करती हैं अम्मा केक काटती हैं | मदर्स डे पर अपनी क्वीन बी माँ का सफर लिख रही हूँ |

प्रेम और विवाह ।

प्रेम और विवाह ।
प्रेम विवाह ।
प्रेम की आतुरता?
प्रेम गायब।
विवाह कायम ।
क्षण क्षण कटता क्षण।
कटुता का क्षण।
राग भी, विराग भी ।
आजादी के अहसास ।
गुलामी की चाह।
स्व रोकता है ।
स्व धर्म टोकता है ।
दिल है दरवाजे पर।
दाग चेहरे पर ।
कोई है, जो नहीं लौकता है।
काम? पता है ।
क्रोध? आता है ।
अपनों के साथ का लोभ भी है ।
अपनों से मोह भी है ।
एक चोर है, जो पकड़ में नहीं आता है ।
शायद मद? यानी अहंकार ।
यही तो, जो मिलन से रोकता है?
दिल दलित और माथा अमीर हो गया है ।
क्या कर सकते हैं? 
पढते पढते थक रहे हैं 
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, 
प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा प्रजा जेई चाहै, 
शीश देई ले जाय।।

गांव और खेतों में बैलों की जोड़ी (गोईं) ढूंढ़ता रहा

बैल अब अनुपयोगी हो गये हैं 
बीस दिन घर पर गुजारे...और इस दौरान करीब 1200 किमी मोटरसाइकिल भ्रमण किया... जिधर से भी गुजरा गांव और खेतों में बैलों की जोड़ी (गोईं) ढूंढ़ता रहा...17वें दिन एक गोईं दिखी...घर आकर इसकी चर्चा पिता जी से की तो पता चला कि हमारे गांव अब एक ही घर में गोईं बची है....पहले कभी एक घर में चार गोईं होती थी...बैल अब ग्राम्य जीवन में अनुपयोगी हो चुके हैं...अब न बैलों से जुताई होती है और न ढुलाई....बछड़ों को मुफ्त में कोई किसान पालने से रहा...ऐसे में उनकी नियति कटना ही है...वहीं गांव में बहुत कम ही गोपालक मिलेंगे जो गोवध के विरोध में बड़ी-बड़ी बातें करें...गो वंश के नाम की माला जपने वाले ज्यादातर भूमिहीन हैं...उनके पास खेती नहीं है...वे पशु नहीं पालते...उनका मकसद सिर्फ राजनीतिक है..गो वध को रोकना है तो जीवित गाय-बैलों की उपयोगिता तय करनी होगी

गुलाबी दुनिया में सूने खंडहर


तुम कितनी सुंदर लगती हो जब हो 
जाती हो तुम उदास ज्यों किसी 
गुलाबी दुनिया में सूने खंडहर के 
आसपास मदभरी चांदनी जगती हो! 
मुख पर ढ़क लेती हो आंचल ज्यों डूब रहे 
रवि पर बादल या दिन भर उड़कर थकी
किरण सो जाती हो पांखे समेट, 
आंचल में अलस उदासी बन 
दो भूले भटके सांध्य विहग,
 पुतली में कर लेते निवास तुम
 कितनी सुंदर लगती हो 
जब हो जाती हो तुम उदास

Saturday, 30 May 2015

तन्हाई की रातो में गर एक सहारा होता,

तन्हाई की रातो में गर एक सहारा होता,
चाँद होता और चांदनी का नजारा होता,
दिल के जज्बात महफूझ रहते जिगर में,
अल्फ़ाझो को सुखनवर ने खूब सवारा होता,
आयने के टूटने का डर न होता किसीको,
पत्थरो से कांच को ना कोई ख़सारा होता,
उलझती रहती प्यार के नक़ाब में नफरते,
मुहब्बत में रक़ीब भी शायद गवारा होता,
जिसे लोग ठुकराते ग़नीम समझकर यहाँ,
 प्यार पा कर वोह हमनफ़स हमारा होता !!!!

Friday, 29 May 2015

पिछे पड गया था एक पागल कुत्ता

कभी हिम्मत ना हारना
 मै जब जब लडखडाकर गिरता
मेरा खडे होकर फिरसे दौडना
ना छूटता क्योंकी...
मेरे पिछे पड गया था एक पागल कुत्ता

साईकिल पर बैठकर काफिले में जाने लगे थे. ( कॉमेडी साईकिल पार्ट-4)

अब हम साईकिल पर बैठकर काफिले में जाने लगे थे. काफिलेंमें साइकिल चलाना मतलब मजाक नही. एक का भी संतूलन बिगड गया तो बाकिका साईकिलके साथ गिरना लगभग निश्चीत. वैसे संतूलन बिगडनेकीही उम्र थी वह. हम 8-9 लोग गृपमें कॉलेज जाते थे. एक दिन गृपमें जाते वक्त ढीश... ट्यू... कीसीके ट्यूब फटनेका आवाज आया. हम सबलोग खिलखिलाकर हसने लगे. शाम्या मोटा होनेसे हसते वक्त पहले सिर्फ उसका शरीर हिलता था और हसनेका आवाज बादमें आताथा. जैसे बिजली चमकने के बाद होता है - पहले बिजली दिखती है और आवाज बादमें आता है. जबकभी हंसनेकी बात होती तब हंसनेकी पहली फेरी होनेके बाद हम शाम्याको हंसते हूए देखकर हंसनेकी दूसरी फेरी शुरु करते थे. शाम्याका चेहरा हसते हसते एकदमसे मायूस हो गया जब उसे पता चला की उसकेही साईकिलका ट्यूब फटा है.
एकबार हमारे साईकिल गृपका जोक सेशन हूवा. सेशनकी खांसीयत यह थीकी सब जोक्स साईकिलकेही थे. सबकी अपेक्षाके अनुरुप पहला जोक शाम्याने बताया - जोक बताने वक्त उसके पात्र भी हमारेंमेंसेही रहते थे ताकी जोकका औरभी मजा आए -
शाम्या जोक बताने लगा -
एक दिन सुऱ्या और संज्या साईकिलपर डबलसिट जा रहे थे. उनको एक ट्रफिक पुलिसने रोका. वह पुलिस उनको फाईन लगाने के उद्देशसे उनकी कसकर जांच पडताल करने लगा. लेकिन कुछ नही मिला. तब संज्याने गर्वसे कहा - आप हमे कभी पकड नही सकोगे... क्योंकी हमारा भगवान हमेशा हमारे साथ रहता है... ऐसा क्या फिर मै आप लोगोंको टीबलसीट साईकिल चलानेके जुर्ममें फाईन लगाता हूं ...
फिर संज्या जोक बताने लगा -
एकबार शाम्या मोट्या पैदल कॉलेजमे जा रहा था. पहले तो वह पैदल कॉलेजमें जा रहा था यही सबसे बडा जोक ... और दुसरा जोक, उसे एक साईकिलवालेने टक्कर मारी. टक्कर मारकर उपरसे वह साईकिलवाला बोलता क्या है - ' तुम किस्मतवाले हो ... तुम बडे किस्मतवाले हो'. शाम्याने पुछा 'कैसे?'
'' क्योंकी जनरली मै बस चलाता हूं..
'' अब सुऱ्या जोक बताने लगा -
एक बार शाम्या नई कोरी साईकिल लेकर आया. तब संज्याने उसे पुछा - 'अरे नई साईकिल ली क्या?'
शाम्या बोला, ' अरे नही ... कल क्या हूवा ... मै घर जा रहा था तब सामनेसे एक सुंदर लडकी इस साईकिलपर आई. उसने साईकिल रोडपर फेंक दी. मेरे पास आकर उसने उसके बदनपरके सारे कपडे निकालकर रोडपर फेंक दीए और मेरे करीब आकर मुझे बोली, '' ले तुझे जो चाहिए वह ले''
संज्या बोला, '' तुमने बहुत अच्छा किया साईकिल ली ... क्योंकी कपडे तो तेरे कुछ काम नही आए होते''
कॉलेज खतम हूवा. जिंदगीकी रफ्तार बढ गई और साईकिल छुट गई. शायद जिंदगीके रफ्तारके सामने साईकिलकी रफ्तार कम पडती होगी. साईकिलके 'टायर' की जगह काम ना करते हूए आनेवाले 'टायर्डनेस'ने ली. साईकिलके 'सिट' के बजाय लडकोंके ऍडमिशनकी 'सीट' या फिर मंत्रीयोंके 'सीट' पर जादा चर्चा होने लगी. इतनाही नही 'स्पोक' यह शब्द 'स्पीक' का भूतकाल जादा लगने लगा. जिंदगी वही थी लेकिन जिंदगीके मायने बदल गए थे.
लेकिन अब बहुत सालोंके बाद फिरसे मै साईकिल चलाने लगा.
 हर दीन .. हर दिन शामको बिस मिनट... डॉक्टरने कहां है इसलिए ! ...

अपनी साईकिल कमल ( कॉमेडी साईकिल पार्ट -3)

एकबार हम दोस्त दुसरे गांव गए. दूसरे गाव जाकर साईकिल चलाना और वह भी किराएसे लेकर मजा कुछ और ही होती है. वैसे दुसरे गावको करनेके लिए बहुत सारी मजेवाली बाते होती है. ... अब यह सब मैने आपको बताना नही चाहिए... क्योंकी उसमें मेराही अज्ञान जाहिर होनेका डर है... राम्याने और मैने एक साईकिल किराए से ली. राम्याके सरपर साइकिलका इतना पागलपन सवार था की किसी दुसरे गाव गए तो पहले यह क्या देखेगा की वहां साईकिलका दुकान कहा है. इतनाही नही उसे किसीने अगर बताया की अरे कल साईकिलसे जाते हूए मेरा ऍक्सीडेंट होगया है तो यह तुरंत पुछेगा ' साईकिलकोतो कुछ नही हुवा ना?'. किराएके साईकिलको कॅरीयर नही रहता है. एक डंडेपर बैठेगा और दुसरा साईकिल चलाएगा.
किराएकी साईकिल लेकर हम खुब घुमें. प्यास लगी इसलिए एक टपरीके सामने साईकिल लगाई. मस्त चाय पी. वहांसे निकले तो सिधे शाम होनेतक घुमते रहे. बिच बिचमें रुककर जेबके पैसोंका और इस्तेमाल कीये घंटोंका तालमेल होता की नही यह देखते थे. नहीतो उस साईकिलवालेको एक दिनके लिए क्योंना हो.. फौकटमें पंचर निकालनेवाला मिल जाएगा. शामको साईकिल वापस करनेके लिए गए.
'' कितने हूए'' राम्याने साईकिल साईकलवालेके हवाले करते हूए पुछा.
साईकिलवाला बोला, '' अरे... यह किसकी साईकल ले आए तुम... यह मेरी साईकिल नही है...'' हम तो हक्के बक्के ही रह गए. ''
अरे तेरा दिमाग तो ठिक है?
'' राम्याने कहा. '' हम सुबह तेरे से ही
तो ले गए थे यह साईकिल''
'' वह मुझे पता है... लेकिन यह किसकी साईकिल लाई तुमने?'' साईकिलवाला बोला, '' यह विमल साईकिल स्टोअर वालेकी ... उसका दूकान बसस्टॅंडके पास है... मेरा देखो कमल साईकिल स्टोअर्स...'' उसने अपने बोर्डकी तरफ निर्देश करते हूए कहा. हमने उसके एक किलेको लटककर कसरत कर रहे बोर्डकी तरफ देखा. उस बोर्डपर क्या लिखा है यह पढनेके लिए हमें गर्दनके काफी व्यायामके प्रकार करने पडे. सचमुछ वह उसकी साईकिल नही थी.
'' अब आगई ना आफत '' मैने राम्यासे कहा,
'' अब आगई ना आफत '' मैने राम्यासे कहा,
लेकिन साईकिलकोतो लॉक था'' राम्याने कहा.
'' उसकी चाबी इसको लग गई शायद... ऐसा होता है कभी कभी'' मैने कहा.
'' इसका मतलब अपनी साईकिल कमल सायकल वाले के पास गई होंगी..'' राम्याने कहा.
राम्याके दिमागमें सिर्फ प्याज टमाटर ही भरे ना होकर औरभी कामका कुछ भरा हुवा है यह मेरा विश्वास पहली बार दृढ हूवा. लेकिन दुसरेही क्षण राम्याने एक गहन सवाल पुछा और मेरा विश्वास भिरसे कमजोर पड गया.
'' अब हमें बस स्टॅंडपर कमल साईकिल स्टोअर्सवालेके पास जाना पडेगा.. जाते हूए हम उसके इस साईकिलपर जा सकते है... लेकिन वापीस आते हूए कैसे आएंगे.''
हम दोनो फिरसे साईकिलपर बैठे और बस स्टॅंडकी तरफ रवाना हो गए... कमल साईकिलवालेके पास.
वहां पहूंचे तो '' यह आगई ... यह आगई '' कहते हूए एक ग्राहकने खुशीसे हमारा स्वागत किया.
उसके पास हमारी साईकिल थी. दोनो साईकिलें दिखनेमें एकदम सेम-टू-सेम थी. मानो सगी बहनें हो. वह ग्राहक अकेला था और हम दो थे.
हम दोनोंको देखकर वह चिढते हूए लेकिन दबे स्वर में बोला, '' अरे कैसे हो तुम लोग? ... अपनी साईकिल के बजाय मेरीही साईकिल ले गए''
'' तुम ले गए की हम?'' गिनतीमें हम दो होनेका फायदा लेते हूए राम्या उसपर हावी हो गया.
'' तुम्हारा अच्छा ... कमसे कम लॉक तो खुला ... मेरा तो लॉकभी नही खुला... इतनी दुरसे पिछवाडा उपर कर कर चलाते हूये लाया इसको..'' वह फिरसे चिढकर बोला.
इसने पिछवाडा उपर कर साईकिल कैसी चलाई होगी इसकी कल्पना मै नही कर पा रहा था. मेरी तो हिम्मत नही बनी लेकिन राम्या सिधा उस आदमीके पिछवाडेकी तरफ अविश्वाससे देखने लगा. मेरे प्रश्नार्थक मुद्राकी तरफ और राम्याका अविश्वासभरी नजरका रुख देखकर वह बोला, '' अरे भले लडको... पिछवाडा इस साईकिलका ... मेरा नही... इस साईकिलका लॉक खुला नही इसलिए इसका पिछला पहिया उठाकर यहांतक धकेलते हूए लाया इसको...'' उसने साइकिलका पिछला पहिया उठाकर दिखाते हूए कहा.

साईकिल की अलग अलग ट्रीक् स सिखनेमें मुझे जादा वक्त नही लगा.(कॉमेडी साईकिल पार्ट -2)

साईकिल की अलग अलग ट्रीक् स सिखनेमें मुझे जादा वक्त नही लगा. घंटी बजाकर इशारे करना, कट मारना, कट मारना यह प्रकारमे तो मैने विषेश महारथ हासिल की थी. साईकिलकी चैन कैसी बिठाना इतना ही नही तो साईकिल की चैन कैसे गिराना यह भी मै सिख गया. ताकी ऐन वक्त कीसी घरके सामने मटरगश्ती करनेमें दिक्कत ना हो. एक बार ऐसाही मै साईकिल डंडेसे चलाते वक्त अचानक गिर गया. ऐसा जोर से गिरा की पुछो मत. उठकर खडे होकर किसीकोभी टक्कर ना लगते हूए मै कैसा गिरा यह ढूंढने लगा. तबतक दो तिन तमाशबीन वहां जमा हो चूके थे. उसमेंसे एकने कहा '' चेन निकल गई है''
असलमें डंडेसे साईकिल चलाते वक्त साईकिलकी चैन निकल गई थी . इसलिए मै गिर गया था. लेकिन उसने '' चेन निकल गई है'' कहतेही कुछ ना समझते हूए झटसे मैने अपने पॅंटकी चैन चेक कर ली. हो सकता है घरसे निकलते वक्त खुली रही हो.
एक दिन मै और मेरा मित्र राजा डबलसीड़ जा रहे थे. लडकोंको डबलसीट लेनेके आगे अभी मै नही गया था. सामनेसे एक साईकिलवाला बॉल दबाये जैसे इशारे कर एक फटफटी वालेको कुछ बोलनेका प्रयत्न कर रहा था. जैसा की अपेक्षीत था पिछे बैठे राजाने पुछा, '' अरे क्या बोल रहा है वह?''
'' अरे कुछ नही ... हेडलाईट शुरु है ऐसा बता रहा है...'' मैने कहा.
'' सालोंको मुफ्तमें बिजली इस्तेमाल करने की आदतही है... क्या करेंगे '' राजा चिढकर बुदबुदाया. मै अपना चूपचाप साईकिल चला रहा था. इतनेमें सामनेसे एक दुसरी फटफटी आगई. राजाने उसके हाथकी बिच वाली ऊंगली हिलाकर उस फटफटी वालेको कुछ अजिब इशारा किया. राजा अचानक ऐसा कुछ करेगा इसकी मुझे अपेक्षा नही थी.
मै राजाको '' चूप बैठ ... मार खिला एगा क्या?'' कहकर साईकिल जोरसे चलाने लगा.
राजा पिछे मुडमुडकर उस फटफटी वालेको वही इशारा कर रहा था. वह फटफटी वाला क्या बदमाश लडके है इस अविर्भावसे देख रहा था. मैने उस फटफटीवालेको मुडकर हमारे पिछे आते देखा. मैने मन ही मन प्रार्थना की, '' भगवान... अब तुही बचारे बाबा.. कैसी दुर्बुद्धी हुई जो इस राजाको पिछे बिठाया. फिरभी राजाका अपना बिचवाली उंगली हिलाकर इशारा करना जारी था. उस फटफटी वालेने हमारे साईकिलके सामने अपनी फटफटी घुसाकर रोकी. मुझे ब्रेक लगानेके सिवा कुछ चारा नही था. उसने फटफटीसे उतरकर सिधे राजाकी कॉलर पकडकर एक जोरदार झापड उसके कानके निचे जमाया.
'' अंकल सुनो तो..'' बेचारा राजा कुछ बोलनेका प्रयास कर रहा था.
उस गाडीवालेने और एक उसके कानके निचे जमाई और फिर कहा, '' हां, अब बोल..''
'' अंकल .. कबसे मै आपको बत्तानेकी कोशीश कर रहा था की आपके गाडीका साईड स्टॅंड उपर है करके...'' बेचारा राजा लगभग रोनेको आकर अपनी बिचवाली उंगली हिलाकर बोल रहा था.

अविश्कारी स्वभाव के कारण मै साईकिल जल्दी सीख गया. (कॉमेडी साईकिल पार्ट -1)

उम्र के छे सालसे उम्रके बाईस साल तक जादातर मेरा समय साईकिल पर गया. इसलिए साईकिलके साथ एक नजदिकी एक अनोखा रिश्ता रहना लाजमी है. नजदिकी वो भी इतनी दिर्घ समय तक... यहां गलतफहमी होनेकी संभावना है . या फिर कोई कहेगा पहलेही इतने प्रकार क्या कम थे की इस नये अनोखे प्रकार का अविश्कार करने की जरुरत आन पडी. ... तो जिवनके बहुतसे अच्छे बुरे समयमें साईकील ने मेरा साथ निभाया.
जब मेरी सही उम्र होगई ... मतलब साईकिल चलाने के लिहाज से. तब छोटी साईकिलें नही थी ऐसा नही. लेकिन हमें सीख ही ऐसी थी की जो है उसमें एडजेस्ट करना चाहिए. इसलिए डायरेक्ट बडी साईकिल सिखने के पिछे मै पड गया. एकबार अपनी सीख भूलकर मैने घरमें जूते लेने की जिद की. जिद के बैगेर कुछ मिलनेवाला नही ऐसा मेरे बचपनके गुरु का कहना था. जुते मिले... लेकिन पीठ पर. इसलिए मै छोटी साईकिल का विचार त्यागकर डायरेक्ट बडी साईकिल सिखने लगा.
अब बडी साईकिल कैसे चलाई जाए? मेरी उम्रके लडके डंडे के निचेसे एक पैर डालकर साईकिल चलाते थे. उसे हम कैंची कहते थे. पहले पहले आधा पायडल मारकर साईकिल चलाना ... उसे हम हाफ कैची कहते थे. और पुरा पायडल मारा की होगई फुल कैंची.
मेरे अविश्कारी स्वभाव के कारण मै साईकिल जल्दी सीख गया. हाफ कैंची से फुल कैंची पर आगया. मेरा अविश्कारी स्वभाव मुझे चैन से बैठने नही दे रहा था. यहा अविश्कारी की बजाय मैने शरारती या पाजी यह शब्द इस्तमाल किया होता... . लेकिन आगे जहां जहां शरारती या पाजी यह शब्द आया है वहा कौनसा शब्द इस्तमाल करना चाहिए यह गहन प्रश्न मेरे सामने उत्पन्न हुवा होता. हमसें बडे लडके हाथ छोडकर साईकिल चलाकर शेखी बघारते थे. मै भी हाथ छोडकर साईकिल चलाने का प्रयास करने लगा. सबसे पहले मैने एक हाथ छोडकर साईकिल चलाना सिख लिया. लेकिन उतनेसे संतोष माननेवाला मै थोडे ही था. ? इसलिए दोनो हाथ छोडकर देखे. रास्तेके किनारे पत्थरोंमे जाकर गीर पडा. दोनों हाथ छोडकर कैची चला नही सकते यह मै स्वानुभव से सिख गया. वैसे गिरने का एक फायदा भी हूवा. मेरा सामने के एक दात को किडा लगा था. सारे दात गिरकर दुसरे आये थे. लेकिन वह साला गिरने का नाम नही ले रहा था. साईकिलसे गिरने की वजह से वह दात अपने आप मेरे हाथमें आया . ....अच्छा वह तो आया ही, साथ मे दुसरे एक बगलके बेगुनाह दात कोभी साथ ले आया.
जैसे जैसे उम्र बढ रही थी वैसे वैसे मेरी तरक्की हो रही थी ... मतलब साईकिल चलानेमें. अब तो मै डंडेपरसे साईकिल चलाने लगा. सिर्फ साईकिल चलानेमेंही नही तो साईकिल से जुडी सारी बातोंमें मै महारथ हासील कर रहा था. गुस्सैल टिचर की साईकिल की हवा निकालना, उनपर का गुस्सा उनके सायकिल के सिट पर उसे ब्लेड से फाडकर निकालना. उस वक्त मुझे तो हमेशा लगता था की नोबेल प्राईज में के 'नोबेल' का साईकिल को बेल ना होनेसे जरुर कोई समंध रहा होगा. एक बार मै डंडेपरसे साइकिल चला रहा था. तब बेलबॉटम की फॅशन थी. साईकिलकी बेल बजानेके चक्करमें मेरे बेलबॉटम की बेल साईकिल के चैनमे अटक गई. ऐसी अटक गई की निकालते निकल नही रही थी. खिंचकर निकालने के प्रयासमें वह पॅंट साईकिलकी चैनसे लेकर पॅंटकी चैन तक फट गई. वह देखकर हमारे क्लास की लडकियॉ मुंह पर हाथ लगा लगाकर हंस रही थी. एक बार मेरी साईकिल ढलान से जोरसे निचे आ रही थी. आगे से एक लडकी हौले हौले साईकिल चलाते हुए ढलान से उपर चढ रही थी. अचानक वह बिचमें आगई. बडी मुष्कीलसे टक्कर बच गई. लेकिन वह बेल बजाकर 'डूक्कर... डूक्कर' चिल्लाकर मझे चिढाने लगी. मै क्या उसे ऐसेही छोडता. मै भी पिछे पलटकर चिल्लाने लगा " तु डूक्कर तेरा बाप डूक्कर तेरा पुरा खानदान डूक्कर '. आगे जब मै एक डूक्कर के झूंडसे टकराकर निचे गिर गया ... तब मुझे समझमें आया की बेचारीको क्या कहना था.

सुबह सुबह लाफ्टर क्लब के लिए निकला था

यार तु बडा डिप्लोमॅटीक है... इससे जादा साफ सुधरा डिप्लोमॅटीक कोई स्टेटमेंन्ट नही होगा. क्योंकी असल में उसको कहना होता है... साले ... तु बडा हरामी है... वैसे डिप्लोमसीकी अगर 'डीप्लोमॅटीक' व्याख्या की जाए तो उसका मतलब होता है ... टॅक्टीकली बिहेव करना ताकी उसमे सब का हित हो. लेकिन आज के जमाने के हिसाब से डिप्लोमसीका मतलब होता है .... मुहं मे राम बगल में छुरी. या फिर अपने दिल की बात चेहरे पर जाहिर ना होने देना. कुछ लोग तो उसके भी आगे जाते है. वे दिल में कुछ, चेहरे पर कुछ , बोलते है कुछ, और करते है और कुछ. ये अलग बात की होता और ही कुछ है. और यकिन मानिए जमाना ही आजकल वैसा है की अगर आप डिप्लोमॅटीक नही हो तो आपकी खैर नही. अरे भाई हम किसी के साथ खुले दिल से हंस नही सकते. हंसे तो फंसे. अगर किसी को गलती से खुलकर स्माईल दो तो वह आपको सिधासादा समझकर जरुर कही ले जाकर बकरे की तरह काटेगा. कुछ दिन तक तो आप स्माईल करनाभी भूल जाओगे. अरे हंसो तो कुछ लोग सोचते है क्या पागल की तरह हंस रहा है. ऑफिसमें हंस नही सकते... किसी सुंदरीका काम आपके पल्ले पडने का डर है ... घरमें खुलकर हंस नही सकते... जेब कटने का डर है. इसिलिए शायद आजकल लाफ्टर क्लब में लोगोंकी भीड जरा जादाही जमने लगी है.
मै ऐसेही आज सुबह सुबह लाफ्टर क्लब के लिए निकला था. रस्तेसे उसतरफ से एक आदमी आ गया. अक्सर मै उसे लाफ्टर क्लब में देखता था. उसको देखतेही मैने उसे एक मिठीसी मुस्कान दी. और आश्चर्य की बात उसने भी मुस्कान का जवाब मुस्कान सेही दिया. ... क्योंकी आजकल ऐसा बहोत कम देखा जाता है.
"" आप यहां इस कॉलनीमें रहते है? '' मैने पुछा.
"" हां ... आप कहां रहते है'' उसने पुछा.
"" उधर उस बगलवाली कॉलनी में'' मैने जवाब दिया.
एक ही बिल्डींगमें आमने सामने रहनेवाले लोगभी अगर ऐसी बातें करें ... तो आजकल आश्चर्य नही होना चाहिए. बातें बढते बढते... कहां काम करते है... घर में कौन कौन काम करता है... से लेकर कितना पॅकेज मिलता है यहां तक पहूंच गई. फिर इन्कम टॅक्स का सरल फॉर्म भरा क्या ... उसमे कौनसा डिडक्शन बताया.. वैगेरा वैगेरा. उस सरल फॉर्म के बारेमें मुझे हमेशा एक सवाल आता है की ... इतने तेडे फॉर्म को सरल किस हिसाब से कहते है?
फिर बातें बदलकर आज आदमी ने कितनी तरक्की कर ली इस विषय पर आकर रुकी. उस आदमी का कहना था की आज आदमी चांदसे आगे मंगल पर जाने की सोच रहा है. फोन टीव्ही मोबाईल इन्टरनेट के जरीये आदमी कितना भी दूर क्यों ना हो क्षणोंमे बात हो जाती है. वैगेरा वैगेरा...
मैने कहा यह कैसी? तरक्की इसको भी क्या तरक्की कहते है... 
इतनेमे लाफ्टरक्लब का पार्क आगया और हमारी बाते बंद हूई...

नहीं तो मैं पापा को बता दूँगा ,

माँ – सो जा नहीं तो गब्बर आ जायेगा ,
बेटा – नहीं पहले 100 रुपये दो ,
माँ -क्यों ?
बेटा – नहीं तो मैं पापा को बता दूँगा ,
की रोज रात को गब्बर आता है

ऑक्सफोर्ड का मतलब होता है बैलगाडी

एक बार जंता सिंगका इंटरव्हू था. इंटरव्हू लेनेवालेने जंता सिंगको सवाल पुछा
इंटरव्हूअर - सरदारजी यह फोर्ड क्या है?
जंता सिंग - फोर्ड गड्डी है.
इंटरव्हू अर - अच्छा सरदारजी अब यह बताओ ऑक्सफोर्ड क्या है?
जंता सिंग - ऑक्स यानीकी बैल और फोर्ड यानी गाडी.
यानी की ऑक्सफोर्ड का मतलब होता है बैलगाडी.

सरकारी नौकर के बिवी की महिनेके गुजरते दिन

सरकारी नौकर की महिने के गुजरते दिन के अनुसार अलग अलग अवस्थायें
तारीख 1 से तारीख 10 - गरम
तारीख 11 से तारीख 20 - नरम
तारीख 21 से तारीख 30 - बेशरम
सरकारी नौकर के बिवी की महिनेके गुजरते दिन के अनुसार अलग अलग अवस्थायें
तारीख 1 से तारीख 10 - चंद्रमुखी
तारीख 11 से तारीख 20 - सुर्यमुखी
तारीख 21 से तारीख 30 - ज्वालामुखी

संता - याद नही यार बहुत पुरानी बात है.

संता - पता है जब मै छोटा था तब दसवे मालेसे गिरा था. .
बंता - तो? ... तो फिर बच गया की टपक गया ?
संता - याद नही यार ... बहुत पुरानी बात है.

'' लडकों को लेडीज रुम में जानेकी अनुमती दी जाए''

एक कॉलेज में नोटीस लगी थी. उसमें लिखा था
लेडीज रुम में सुधार के लिए सुझाव प्रस्ताव मंगाए जाते है.
एक बदमाश लडकेने नोटीसके निचे लिख दिया,
'' लडकों को लेडीज रुम में जानेकी अनुमती दी जाए''

अलग अलग रंग से रंगाया हूवा युवक आकर बैठ गया.

एक बुढा आडमी एक मॉलमें बेंचपर बैठा था. इतनेमें वहा एक अपने बाल अलग अलग रंग से रंगाया हूवा युवक आकर बैठ गया. उस युवकके बाल कही पिले, कही हरे तो कही गुलाबी रंगसे रंगाये हूवे थे. उसके आंखोके आसपासभी काला रंग लगाया हूवा था. वह बुढा आदमी एक टक उस युवक की तरफ देख रहा था. उस बुढे को अपनी तरफ एकटक देखता देखकर उस युवकने गुस्सेसे कहा, '' ऐसे क्या देख रहा है बुढ्ढे, कभी अपनी जवानीमें तुने ऐसी मस्ती नही की थी क्या?''
उस बुढे आदमीने जवाब दिया, '' की थी ना ...जब मै जवान था तब एक बार मै बहुत पिया था.. वैसी हालतमें मुझे एक तोता मिल गया... मुझे उस तोतेसे इश्क होगया था, और फिर बहुत कुछ होगया ... मै सोच रहा था कही तुम उस तोतेका और मेरा लडका तो नही हो''

यह तो सरदार बिल्ली है.

1. यह तो एक बिल्ली है.
2. यह तो सरदार बिल्ली है.
3. यह तो पांच बिल्ली है.
4. यह तो मिनट बिल्ली है.
5. यह तो तक बिल्ली है.
6. यह तो कैसे बिल्ली है.
7. यह तो उलझा बिल्ली है.
8. यह तो रहा बिल्ली है.
अब हर एक लाईन पढीये.
अब तिसरे शब्दपर जाईए और उपर से निचे तक हर लाईनका तिसरा शब्द पढिए.

एक मॉडर्न लड़की और सिविल इंजीनियर लड़का डेट पर

एक मॉडर्न लड़की और सिविल इंजीनियर लड़का
 डेट पर गए...
 लड़के ने कैंडिल लाइट डिनर की तैयारी
कर रखी थी, और सोच रखा था
कि अगर सबकुछ ठीक रहा तो
उसे प्रपोज कर देगा...
डेट पर मिलने के थोड़ी देर बाद...
लड़की ने शर्माते हुए पूछा- ये
प्यार क्या होता है....???
लड़के ने सोचा इंप्रेशन जमाने
कायही मौका है... .
उसने जवाब दिया- प्यार
का रिश्तादो इंसानों में वही होता है
जो सीमेंट और रेत के बीच
पानी का होता है, फर्ज करो.
लड़का = सीमेंट
लड़की = रेत
प्यार = पानी
अब अगर सीमेंट और रेत को
आपस में मिला दिया जाए
तो वो स्ट्रांग नहीं होंगे
लेकिनअगर इसमें
पानी मिक्स कर दिया जाए
तो कोई इनको जुदा
नहीं कर सकता...
लड़के का यह जवाब
सुन लड़की हंसते हुए
 बोली...
"कमीने तू शक्ल से ही मजदूर लगता है...

कौनसा दिन मेरे लिए शुभ रहेगा

भक्त - भगवन मुझे बताइए कौनसा दिन मेरे लिए शुभ रहेगा
भगवान - सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या वीर
               जिस दिन सोया देर तक भूखा रहे फ़कीर

तोता कहकर छुट गया था

एक बार एक आदमी रोड से जा रहा था उसके पास गाड़ी के कागजात नही थे।, तो एक पुलिस वाले ने रोक दिया। तो उसने कहा सर आपको जो लेना हो ले लें लेकिन आगे जाकर फिर कुछ न देना पड़े। पुलिस वाले ने कहा की ठीक है अगर आगे कोई पुलिस वाला रोके तो कहना ''तोता''
 वो आदमी आगे गया। उसे एक पुलिस वाले ने रोका और कागजात के बारे में पूछा तो उसने कहा ''तोता'' पुलिस वाले ने कहा ठीक है जाओ। दुसरे दिन जब वो किसी और रोड से निकल रहा था तो फिर एक पुलिस वाले ने रोक लिया। तो उसने सोचा की कल तोता कहकर छुट गया था,आज भी कह दो। तो उसने कहा ''तोता'' पुलिस वाले ने कहा ''गाड़ी साइड में लगा दो आज ''कौवा'' है। '' .

एक सुंदर युवतीने प्लेनमें सफर करते हूए

एक सुंदर युवतीने प्लेनमें सफर करते हूए अपने बगलमें बैठे साधुसे कहा,
'' स्वामीजी आप मुझपर एक मेहरबानी करेंगे?''
'' जरुर... आप बोलीयेतो मै आपकी क्या मदद कर सकता हूं?''
'' मैने एक किमती इलेक्ट्रॉनीक हेअर ड्रायर खरीदा है... लेकिन वह कस्टमके लिमीटके उपर जा चूका है... और मुझे चिंता है की वे कस्टमवाले उसे मुझसे जब्त करेंगे... क्या आप उस हेअर ड्रायरको आपके चोंगेक अंदर छुपाकर ले जाओगे?'' युवतीने कहां.
'' मुझे आपको मदद करनेमें खुशी होगी, लेकिन मै आपको अभीसे इत्तला कर दु की मै झुठ नही बोलूंगा'' स्वामीजीने कहा.
'' स्वामीजी आपके मासूम चेहरेके वजहसे आपको कोई पकडेगा नही ... तो झुट बोलनेका सवालही नही आता'' युवतीने कहा.
''ठिक है ... जैसी आपकी मर्जी'' स्वामीजी राजी होगए.
जब प्लेन लॅंड हूवा और सब कस्टमसे जाने लगे तो उस युवतीने स्वामीजीको अपने आगे जाने दिया. कस्टमके ऑफीसरने हर यात्रीकी तरह स्वामीजीसे पुछा,
'' स्वामीजी क्या आपने गैरकानुनी तौर पर कुछ छिपाया है?''
'' मेरे सरसे निचे कमरतक मैने गैरकानुनी तौर पर कुछ छुपाया नही है'' स्वामीजीने कहा.
ऑफीसरको यह स्वामीजीका जवाब कुछ अटपटासा लगा. इसलिए उसने आगे पुछा, '' और कमर से निचे जमिन तक क्या आपने गैरकानुनी तौर पर कुछ छिपाया है ?''
'' हां एक छोटीसी सुंदर चिज छिपाई हूई है ... जिसका इस्तेमाल औरते करती है ... लेकिन मेरे पास जो है उसका इस्तेमाल अभितक हूवा नही है'' स्वामीजीने कहा.
जोरसे ठहाका लगाते हूए ऑफीसरने कहा, '' ठिक है स्वामीजी आप जा सकते है ... नेक्स्ट!''

स्मार्ट कार्ड रिडरपर दर्ज कीया जाता था.'' जिम्मेदारी ''

सुबहका वक्त. कांचके ग्लासेस लगाई इमारतोंके जंगलमें एक इमारत और उस इमारतके चौथे मालेपर एक एक करके एक आयटी कंपनीके कर्मचारी आने लगे थे. दस बजनेको आए थे और कर्मचारीयोंकी भीड अचानक बढने लगी. सब कर्मचारी ऑफीसमें जानेके लिए भीड और जल्दी करने लगे. कारण एकही था की देरी ना हो जाए. सब कर्मचारीयोंके आनेका वक्त दरवाजेपरही स्मार्ट कार्ड रिडरपर दर्ज कीया जाता था. सिर्फ जानेका वक्तही नही तो उनकी पुरी अंदर बाहर जानेकी गतिविधीयां उस कार्ड रिडरपर दर्ज किई जाती था. कंपनीका जो कांचसे बना मुख्य दरवाजा था उसे मॅग्नेटीक लॉक लगाया था और दरवाजा कर्मचारीयोंने अपना कार्ड दिखानेके सिवा खुलता नही था. उस कार्ड रिडरकी वजहसे कंपनीकी सुरक्षा और नियमितता बरकरार रखी जाती थी. दसका बझर बज गया और तबतक कंपनीके सारे कर्मचारी अंदर पहूंच गए थे. कंपनीकी डायरेक्टर और सिईओ अंजलीभी.
 अंजलीने बी.ई कॉम्प्यूटर किया था और उसकी उम्र जादासे जादा 23 होगी. उसके पिता, कंपनीके पुर्व डायरेक्टर और सिईओ, अचानक गुजर जानेसे, उम्रके लिहाजसे कंपनीकी बहुत बडी जिम्मेदारी उसपर आन पडी थी. नही तो यह तो उसके हंसने खेलनेके और मस्ती करनेके दिन थे. उसकी आगेकी पढाई यु.एस. में करनेकी इच्छा थी. लेकिन उसकी वह इच्छा पिताजी गुजर जानेसे केवल इच्छाही रह गई थी. वहभी कंपनीकी जिम्मेदारी अच्छी तरहसे निभाती थी और साथमें अपने मस्तीके, हंसने खेलनेके दिन मुरझा ना जाए इसका खयाल रखती थी.
हॉलमें दोनो तरफ क्यूनिकल्स थे और उसके बिचमेंसे जो संकरा रास्ता था उससे गुजरते हूए अंजली अपने कॅबिनकी तरफ जा रही थी. वैसे वह ऑफीसमें पहननेके लिए कॅजुअल्स पहनावाही जादा पसंद करती थी - ढीला सफेद टी शर्ट और कॉटनका ढीला बादामी पॅंन्ट. कोई बडा प्रोग्रॅम होनेपर या कोई स्पेशल क्लायंट के साथ मिटींग होनेपर ही वह फॉर्मल ड्रेस पहनना पसंद करती थी. 
ऑफीसके बाकी स्टाफ और डेव्हलपर्सकोभी फॉर्मल ड्रेसकी कोई जबरदस्ती नही थी. वे जिन कपडोमें कंफर्टेबल महसूस करे ऐसा पहनावा पहननेकी उन सबको छूट थी. ऑफीसके कामके बारेमें अंजलीका एक सूत्र था. की सब लोग ऑफीस का कामभी ऍन्जॉय करनेमें सक्षम होना चाहिए. अगर लोग कामभी ऍन्जॉय कर पाएंगे तो उन्हे कामकी थकान कभी महसूसही नही होगी. उसने ऑफीसमेंभी काम और विश्राम या हॉबी इसका अच्छा खासा तालमेंल बिठाकर कर उसके कंपनीमें काम कर रहे कर्मचारीयोंकी प्रॉडक्टीव्हीटी बढाई थी. उसने ऑफीसमें स्विमींग पुल, झेन चेंबर, मेडीटेशन रुम, जीम, टी टी रुम ऐसी अलग अलग सुविधाए कर्मचारीययोंको मुहय्या कराकर उनका ऑफीसके बारेमें अपनापन बढानेकी कोशीश की थी. और उसे उसके अच्छे परिणामभी दिखने लगे थे. उसके कॅबिनकी तरफ जाते जाते उसे उसके कंपनीके कुछ कर्मचारी क्रॉस हो गए. उन्होने उसे अदबके साथ विश किया. उसनेभी एक मीठे स्माईलके साथ उनको विश कर प्रतिउत्तर दिया. वे सिर्फ डरके कारण उसे विश नही करते थे तो उनके मनमें उसके बारेमें उसके काबीलीयतके बारेमें एक आदर दिख रहा था.
 वह अपने कॅबिनके पास पहूंच गई. उसके कॅबिनकी एक खासियत थी की उसकी कॅबिन बाकि कर्मचायोंसे भारी सामानसे ना भरी होकर, जो सुविधाएँ उसके कर्मचारीयोंको थी वही उसके कॅबिनमेंभी थी. 'मै भी तुममेंसे एक हूँ.' यह भावना सबके मनमें दृढ हो, यह उसका उद्देश्य होगा. वह अपने कॅबिनके पास पहूँचतेही उसने स्प्रिंग लगाया हूवा अपने कॅबिनका कांचका दरवाजा अंदरकी ओर धकेला और वह अंदर चली गई.

Thursday, 28 May 2015

फ्राड मीडिया पेड मीडिया

बीते कल की समीक्षा... तोमर की डिग्री सही, कॉलेज ने Highcourt में affidavit दिया, लगभग ब्लैक आउट.... बाबा रामदेव का भाई पातंजलि आश्रम गेट पर गोली चलाकर हत्या करने के मामले में गिरफ़्तार, सरसरी ख़बर, कोई संध्या बहस नहीं... दिल्ली विधानसभा की पक्षपात पूर्ण बीजेपी एंगल से बीजेपी नेताओं के दो-दो तीन तीन वर्जन के साथ कवरेज, हाई कोर्ट के फ़ैसले के केन्द्र/ एलजी का परदाफ़ाश करते अंश ख़बरों से ग़ायब... फिर क्यों न कहा जाए कि पेड मीडिया फ्राड मीडिया.

जीने के लिए काम करता हूँ या काम

लौट आता हूँ वापस घर की तरफ, हर रोज़
थका-हारा, आज तक समझ नहीं आया की
जीने के लिए काम करता हूँ या काम करने
के लिए जीता हूँ। बचपन में सबसे अधिक
बार पूछा गया सवाल – “बङे हो कर क्या बनना है ?
” जवाब अब मिला है, – “फिर से बच्चा बनना है.

4 बच्चों को जन्म 65 की उम्र में इस दादी ने दिया

पैंसठ साल की एक जर्मन महिला ने एक साथ चार बच्चों को जन्म दिया है। जर्मन टीवी आरटीएल ने खबर दी है कि औरत का कृत्रिम गर्भाधान हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया है कि अन्न्हुग्रेट राउनिक ने बर्लिन के एक अस्पताल में एक साथ तीन बेटों और एक बेटी को जन्म दिया। हालांकि राउनिक की डिलीवरी 26वें सप्ताह में ही हो गई और उनका ऑपरेशन हुआ, लेकिन बच्चों के जीवित रहने की पूरी संभावना बताई जा रही है। राउनकि को पहले से ही 13 बच्चे हैं। उनके सात नाती-पोते भी हैं।
एक साथ चार बच्चों को जन्म देने वाली वो सबसे अधिक उम्र की औरत हैं। उन्होंने फिर से मां बनने का इरादा तब किया जब उनकी सबसे छोटी बेटी (जो 10 साल की है) उनसे कहने लगी कि उसे एक भाई या बहन चाहिए।
किसके पास है रिकॉर्ड?
जेनी हिल का कहना है कि राउनिक का यूक्रेन में किया गया गर्भाधान और उनका गर्भ जर्मनी में काफी चर्चा में रहा। कुछ डॉक्टरों ने भी सवाल उठाया था कि क्या वो गर्भ के दौरान स्वस्थ रह पाएंगी। हालांकि स्कूल में शिक्षक के तौर पर काम करने वाली राउनकि बच्चों को जन्म देने वाली सबसे अधिक उम्र की महिला नहीं हैं। ये रिकॉर्ड स्पेन की एक औरत के नाम हैं, जिन्होंने 2006 में 66 साल की उम्र में बच्चों को जन्म दिया था।
 हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि इसका श्रेय भारतीय ओंकारी पँवर को है जिन्होंने 70 साल की उम्र में बच्चे पैदा किए थे।

महारानी घोड़े से संबंध बनाते वक्त मारी गई !

यूं तो इतिहास में राजा रानियों को लेकर कई तरह के किस्से कहानियां हैं लेकिन रूस की महारानी कैथरीन दि ग्रेट ‌द्वितीय के अजीबोगरीब यौन व्यवहार को लेकर समय समय पर चौंकाने वाली कहानियां सामने आती रहती हैं।
 रूस में 1729 से 1796 तक एकछत्र राज करने वाली कैथरीन दि ग्रेट ‌द्वितीय अपने आप में सशक्त महिला था। इतिहास में कैथरीन की राज चलाने की बेहतरीन क्षमता के साथ साथ उसके अजीबोगरीब यौन व्यक्तित्व को लेकर भी कई किस्से हैं। कहा जाता है कि कैथरीन ने अपने पति पीटर से संबंध खत्म करने के बाद अपने महल में सैंकड़ों सेक्स गुलाम पाले थे। रानी के हर छोटे बडे काम के लिए कुंवारे जवान सेवक तत्पर रहते थे। रानी ने अपने महल के हर कमरे में इन गुलामों को तरह तरह के काम दे रखे थे।
 खास बात ये है कि रानी के महल में कोई सेविका नहीं थी। रानी अपने निजी और अंतरंग कामकाज भी गुलामों से करवाना पसंद करती थी।
नामर्द राजा और विव‌ाहेत्तर संबंधों की दास्तां
कहा जाता है कि कैथरीन और उनके पति पीटर के बीच संबंध अच्छे नहीं थे। रानी की बायोग्राफी 'कैथरीन द ग्रेट - लव सेक्स एंड पॉवर' में इस बात का जिक्र है कि आठ साल तक दोनों के कोई संतान नहीं हुई और जनता के बीच पीटर की मर्दानगी को लेकर बातें उठने लगी थी।
 दोनों के बीच संबंध इस कदर कमजोर हुए कि बेबस पीटर अपने महल में रंगीनियों में डूब गए और कैथरीन अपने सेनापति के साथ विवाहेत्तर संबंधों में रम गई। इसी बीच कैथरीन ने पहले बेटे पॉल को जन्म दिया। अफवाहें उड़ी कि पीटर नामर्द थे और ये बच्चा कैथरीन और सेनापति का था।
हालांकि बाद में कैथरीन ने कई प्रेमी बदले और तीन और बच्चों को जन्म दिया और हर बार पीटर की नामर्दी पर सवाल उठे। पीटर और रानी कैथरीन के बीच कैथरीन के प्रेमियों को लेकर कई बार तकरार हुई और ये तकरार महल के बाहर भी सुनाई दी लेकिन कैथरीन अपने प्रेमियों से दूरी नहीं बना पाई।
सेक्स सैलून और बैचलर पार्टी विद क्वीन
 सीक्रेट्स डॉट टीवी पर दिखाए गए 'हरमिटेट स्टेट्स सीक्रेट्स' नामक एपिसोड में इस बात का उल्लेख है कि रानी ने महल के पास सेक्स सैलन बनवाया था। रानी के अजीबोगरीब शौक थे। 
वो अपने सेवकों के साथ संबंध बनाती थी। रानी की मौत के बाद शासक बने उसके बेटे पॉल प्रथम ने जब महल की छानबीन कराई तो रानी के महल के ठीक बराबर में एक छिपा हुआ सेलून मिला जहां यौन कलाकृतियों वाली मसाज कुर्सियां मिली। इन कुर्सियों पर संभोगरत महिला और पुरुषों की आकृतियां उकेरी गई थी।
 कहा जाता है कि यहां रानी अपनी यौन आकांक्षाओँ को पूरा करने के लिए बैचलर पार्टी कराती थी जहां राज्य के जवान लड़कों को पार्टी करने के लिए बुलाया जाता था। रानी इन युवकों के साथ सेक्स प्रयोग करती और अपनी यौन आकांक्षाओं को बनाए रखने के हर संभव प्रयास करती। रानी ने इस पैलेस को पेटिट हरमिटेज का नाम दिया था। रूस में स्टेट हरमिटेज म्यूजियम में रखी सैलून की यौन आकृतियों वाली मसाज कुर्सियां इस बात की गवाह है कि अपने पति और प्रेमियों के बावजूद रानी कैथरीन में अजीबोगरीब यौन अतृप्तति थी जिसे पूरा करने के लिए वो हर तरह के प्रयोग करती थी।
घोड़े के साथ यौन संबंध करते वक्त हुई मौत!

हालांकि रानी की मौत को लेकर इतिहासकार अलग अलग राय रखते हैं। कुछ का कहना है कि रानी की मौत टॉयलेट सीट पर बैठे ह‌ुए हार्ट अटैक से हुई जबकि कुछ इतिहासकार दावा करते हैं कि रानी घोड़े के साथ संभोग करने की कोशिश करते वक्त मारी गई। 
 कैथरीन दि ग्रेट  लव सेक्स एंड पॉवर में भी इस बात का उल्लेख है कि रानी की मौत को लेकर  रूस में घोड़े की कहानी काफी चर्चित हुई थी। हालांकि उस वक्त रूस के आधिकारिक महल के प्रवक्ता ने कहा था कि रानी की मौत अस्तबल में ह्रदयाघात के चलते हुई। 
 रानी और घोड़े की बात को बल इस बात से मिलता है कि अपने शासन के चरम दौर में शहरी वर्ग में ये अफवाह उड़ी कि रानी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने की आदी है और वो जानवरों के साथ भी संबंध बनाती है। रानी के सौ घोड़ों के अत्याधुनिक अस्तबल और घोड़ों की सेवा के लिए सैंकड़ों सेवकों की उपस्थिति भी इस ओर इशारा करती हैं कि रानी को घोड़ों से कुछ अलग तरह का लगाव था।

Wednesday, 27 May 2015

डॉक्टर की बेटी को एक लड़के से प्यार हो गया ,

एक दातों के डॉक्टर की बेटी को एक लड़के से प्यार हो गया ,
वो रोज लड़के को अपने पापा के पास शादी की बात करने भेजती थी ,
लेकिन लड़का कुछ बात नहीं कर पाता था ,
लड़की – क्या तुमने आज पापा से बात की ?
लड़का – नहीं ,
लड़की(गुस्से में) – क्यों ?
लड़का(रोता हुआ)- हिम्मत नहीं पड़ी ,
आज फिर चुपचाप एक दाँत और निकलवा कर आ गया

सच तुम बहुत खूबसूरत हो

बेशक तुम्हें देखा है
बंद आँखों से
जिया है तुम्हें
हकीकत में
हाँ तुम वैसे ही हो
मेरे मन चाहे
तभी तो चाहती हूँ तुम्हें
कि तुम बहुत खूबसूरत हो
मेरे ख़याल
सच तुम बहुत खूबसूरत हो

मुलाक़ात की आदत डालो,

दिल साफ़ करके मुलाक़ात की आदत डालो,
क्योंकि जब गर्द हटती है, तो आईने भी चमक उठते हैं".. !!!!

एक पुराना मौसम लौटा.

मुझे अंजाम न लिक्खो मेरा अंजाम बन जाओ |
अगर लिखते हो सुबहा तो सुहानी शाम बन जाओ |
जुड़ो ऐसे कि दोनों में कोई दूरी न रह जाए |
मेरी किस्मत की तहरीरों में लिक्खा नाम बन जाओ ||
तुम्हारी बातों में कुछ कुछ नशा महसूस होता है|
करो बाहों को मयखाना हमारे जाम बन जाओ||
ज़माने ने नवाज़ी जो मुझे तोहमत हज़ारों हैं |
मेरे हिस्से में तुम आओ मेरा ईनाम बन जाओ||
मैं पागल सी जिसे ढूंढा करूँ अपनी किताबों में |
किसी पन्ने पे छोटा सा वही पैगाम बन जाओ||

तुम्हें मैं प्यार करती हूँ यही तो है मेरी पूजा

जो तुम मेरी तरफ देखो तो चलती है मेरी धड़कन
ज़रा भी दूर रहते हो तो आँखों से झरे सावन
तुम्हें मैं प्यार करती हूँ यही तो है मेरी पूजा
तुम्हारा नाम तो मेरे लिए गंगा सा है पावन
दिया बनकर हमारे सामने संझा को आ जाओ
मुझे तुलसी बनाकर तुम लगा लेना सजन आंगन
मैं उड़ती फिर रही तबसे सजन जबसे बंधी तुमसे
बता दे माहिया मेरे ये कैसा प्यारा है बंधन
सुनो इक बात है कहनी बड़ी छोटी सी है अर्ज़ी
गले से तुम लगा लो बस मेरा इतना सा तो है मन

Sunday, 24 May 2015

सावन की गीली हवाओं में

तुम्हे सुना था मैं ने
सावन की गीली हवाओं में
जब रोपती थी तुम कोई गीत नया
जब साँझ पड़े अँधेरा हाथ पसारे
भर रहा होता बाँहों में दिन को 
दिया जला प्रकाश को रस्ता दिखाती
वो तुम ही थी
अशोक को साक्षी बना
अस्तित्व की रक्षा करती
वो भी तुम थी
इतिहास में मानवता की लाज बचाती
तुम ही थी कोई और नहीं
फिर आज तुम क्यों भूल बैठी हो खुद को
तोड़ दो वक्त की बाड़ें
बिछा लो समय को अपने लिए
विकसित करो अपने अन्दर
जीवन कर्म का सौन्दर्य
फिर से सुनाओ संभावनाओं के गीत

जहाँ प्रेम था शांति और दर्शन था

वो जब मिला था मुझे 
ऐसा लगा कि मानो 
उसके अन्दर बुद्ध हो 
फिर ईशु की तरह लगने लगा 
दुनिया का सबसे अच्छा और
सच्चा आदमी मुझे उससे मिलकर 
एक साथ कई महान आत्माओं के दर्शन
होने लगे मेरी तो जैसे दुनिया 
ही बदल गई मैं दूसरी दुनिया मैं थी
जहाँ प्रेम था शांति और दर्शन था 
अर्थ का कोई नामोनिशान नहीं
 मैंने मन ही मन कहा मतलबी 
दुनिया तुझे सलाम मैं चली मेरी 
दुनिया में हम घंटो नदी किनारे या
 किसी दर्रे में बैठे बात करते जिसमे
 सब कुछ होता गीत कविता 
दर्शन संगीत फिर एक दो तीन ..
.न जाने कितने दिन उसने मुझे
 प्रेम का दर्शन बताया दर्शन ने आकार
 लेना शुरू किया और मेरे अस्तित्व
 में दिखाई देने लगा और अचानक एक रात वो
 अपने दर्शन के साथ अकेला छोड़ 
किसी नए दर्शन की तलाश में जो गया
 तो नहीं लौटा मैं
 आज कल सुबह सात से शाम सात बजे 
मिल की मशीनों के बीच रहती हूँ 
अर्थ दर्शन को और रात
दर्शनशास्त्र की किताबों को फाड़ लिफाफे बनाती हूँ

आग का दरिया पार कर लेगा

गली में आते जाते वो मिला मुझे
देखा और मुस्कुराया मैं समझी
उसे प्रेम है मुझसे और एक दिन
सच में उसने रोक कर मेरा रस्ता
बना कर मुझे राजकुमारी
कदमो में मेरे गिर कर कहा
मैं प्रेम करता हूँ तुम से
मुझे विश्वास नहीं हो रहा था
खूद पर क्या मुझ से भी कोई
प्रेम कर सकता है
वो राँझा मजनू और न
जाने क्या क्या बन गया ऐसा लगा मानो,
आग का दरिया पार कर लेगा
मैंने कहा तू अकेले नहीं
मैं भी तेरे सफ़र में तेरी हमसफर हूँ
और मैं अपनी पहचान, अपनी दृष्टि,
अपनी समझ कपड़ों के साथ रख किनारे
दरिया पार करने के लिए
आग में कूद पढ़ी उसके साथ उसके ही
तरीकों से तैरने के लिए अचानक
एक दिन उसने कहा,
तू अच्छी तैराक नहीं तू कभी
मेरी तरह तैर ही नहीं सकती
और जो मैं इतना तैरी?
उसने कहा बहस फ़िजूल है
मैंने एक और तैराक खोज ली है
और मुझे आग के दरिया के
बीचो बीच छोड़ कर चलता बना
तब से मैं फीनिक्स की तरह उस
आग के दरिया में जल जल कर
ईजाद कर रही अनगिनत तरीके
तैराकी के बचाना है उन सभी को,
जिसे उसने एक एक कर छोड़ा है
आग के दरिया में बीचोबीच.

जो सह लेती है ज्ञानी उद्धव-सी चुप्पी

मुझे अवतार नहीं बनना देव मैं
 तो कर्म सौन्दर्य
करती हूँ संघटित ।
उसी से मेरा स्वरूप
भिन्न है मनु तुम से
मेरे जीवन में उसी से माधुर्य आता है ।
 माधुर्य मुझे देता है
 ज्ञानी उद्धव-सी चुप्पी
जो सह लेती है
वाचा का अन्तिम तीर
जो तुम से मुझ तक आता है ।

बिंदी कुमकुम चूड़ी पायल

आओ घर में आँगन बोयें
और बोयें इक चाँद
तुलसी चौरा संग प्रभाती
दीप जले हर साँझ
बिंदी कुमकुम चूड़ी पायल
जीवन हो संगीत
अम्मा बाबा से मिल जाये
आँचल भर आशीष
ड्योढ़ी पर की नीम
ठाँव फिर हो जाये चलो
कि एक बार साथी
हम फिर गाँव हो जायें

छत पर जुट आती थीं औरते

बीते समय में
छत पर जुट आती थीं औरते
झाड़ती थीं छत को,
मन को बनाती थी पापड़,
बड़ियाँ अचार साथ में
बनाती थी ख़्वाब
रंगीन ऊन के गोले सुलझाते-सुलझाते
उलझती थी बारम्बार ।
पर आज की औरते
जाती नहीं छत पर ।
उनके पाँव के नीचे छत नहीं पुरी दुनिया है
उनके पास है जेनेटिक इंजीनियरिंग, एंटी-एजिंग, क्लोनिंग ,
आटोमेंटेंशन
जिनके एप्लीकेशन में उलझी सुलझाती है
पूरी दुनिया की उलजाने

तुम एक देश नहीं, भारत !

तुम एक देश नहीं, भारत !
तुम सृष्टि हो
तुम हिमालय हो
सम्पूर्ण पुरुष हो
या सम्पूर्ण स्त्री के अवतार ।
तुम ब्रह्मविद्या हो
शिव हो आदिशक्ति हो
तुम नारियों के स्रोत हो
सन्दर्भ हो ।
तुम अज्ञात हो तुम ओम हो
तुम मौन हो तुम शून्य हो
 इसलिए ही तुम सम्पूर्ण हो ।
 हिन्द हमें गर्व है
हम तुम में हैं और तुम हम में ।

प्यार चाहे तीन रोज का हो या तीन सौ पैसठ दिन का ।

रूह को भी उसका एहसास न हुआ जिस्म समझ नहीं पाया आँखे देख न सकी बस उसका होना हमारे होने से टकराया और हमारा होना न होना होकर रहा गया। मानो रूह ने साथ छोड़ा हो जिस्म का। ऐसा ही होता है प्रेम किसी अनजाने से गाँव की पगडंडी से चलता हुआ एक उदास घर में एक उदासी से मिलता है , फिर आदान प्रदान होता है ' शेखर एक जीवनी" या 'गुनाहों का देवता' का और रात भर बारिश होती है कहानी भींगती है। ठिठुरी हुई लम्बी रातों में दो तारे बारी - बारी से जागते हैं। 
कही दूर किसी सिसकी का जवाब होता है तेरे नाम और तेरे ध्यान की कश्ती से मैं दरिया पार कर लूँगा .ऐसा ही होता है प्यार चाहे तीन रोज का हो या तीन सौ पैसठ दिन का ।
किसी ने आवाज दी
जिन्दगी मुस्काई
कली ने पखुडियाँ खोली
और उदासी ढल गई

"सृजन और विनाश की एक ऐसी स्पंदनकारी प्रक्रिया है

भौतिक शास्त्र के अनुसार गति और लय किसी भी पदार्थ का आधारभूत गुण है हम सभी इस जगत में एक लय में जीते है और प्रकृति के साथ उस लय में उसके नृत्य में शमिल होते है । यह नृत्य "सृजन और विनाश की एक ऐसी स्पंदनकारी प्रक्रिया है जहां केवल पदार्थ ही नहीं बल्कि सृजनकारी एवं विनाशकारी ऊर्जा का अंतहीन प्रतिरूप शून्य भी जगत नृत्य में हिस्सा लेता है इसको आप हिन्दू धर्मग्रन्थो में शिव के नटराज छवि के प्रतीक रूप में देख सकते हैं । 
ये रचना कविता , गीत आदि कि तरह है पर एक विज्ञान है जिससे जगत का प्रत्येक पदार्थ संचालित होता है ।लेकिन ये लय पूर्ण होती है शक्ति से क्योकि शिव मृत है एक शव , प्राण फूंकने वाली स्वर ध्वनि शक्ति के बिना जीवन संभव नहीं शिव की शक्ति तो देवी है उनका बल उनकी स्त्रैण उर्जा उनकी दिव्य क्रीड़ा उनकी माया का कारण और प्रभाव दोनों हैं । शिव जिस उर्जा को अपने तप में प्रयोग करते हैं शक्ति उन सभी क्रियाओं को धारण करती है ।
 हमारी पुरानी कथाएं हमें जटिल भले ही लगे पर उन्हें पढ़ कर हमें स्त्री- पुरुष के समाकृति रूप की गहरी समझ और लैंगिकता दोनों का व्यापक स्वर बोध होता है ।

वासना का कर विसर्जन शब्दों के बंधनों से मुक्त अक्षर बन जाती हूँ

कुछ मिलने,
कुछ होने की कामना का अंत कर
वासना का कर विसर्जन
सुन पा रही हूँ
प्रकृति के कण-कण का
संगीत सूखे पत्तो की
मीठी राग फूलो की पंखुड़ियों
का थरथराना वर्षा की बूँदों की
झनकार अंतस के गीत
 इस तरह वाक्यों और
शब्दों के बंधनों से मुक्त अक्षर बन जाती हूँ
 मैं और पहुंच जाती
उस विराट उर्जा के पास घुल जाती हूँ
सृष्टि के प्रत्येक परमाणु में यही
मेरी नियति,
प्रारब्ध और आध्यात्म है।

कालचक्र अनवरत घूमता है

कोई गतिशील बिंदु
 किसी बिंदु से मिले
 उस अंतराल के
बीच उसे बांधने के
भ्रम में खड़ी मैं बट गई हूँ
पहरों, घंटो,
मिनिट और सेकेण्ड में देख रही हूँ
एक मीठी दोपहर को कोई
शायद गुजरा है
बिना किसी आहट के वो जो अविरल,
अनत है सन्निकट था
मेरे अब किसी
दूरदराज के खेतों में विहंसती
सरसों की पीली बालियों के बीच झूम रहा है
और
मैं एक एक बोझिल
पालो को समेट रही हूँ
 इस आस में कि इन पलों
पर फिर छिटकेगी मुस्कान
उसकी जो कर देगी
मुझे लींन उस अनूठी लय में
जिसमे कालचक्र अनवरत घूमता है

माँ की दी हुई मुस्कान

जब उड़ने लगती है सड़क पर धूल
 और नीद के आगोश में होता है फुटपाथ
तब बीते पलों के साथ
मैं आ बैठती हूँ बालकनी में अपने
बीत चुके वैभव को अभाव में तौलती
अपनी आँखों की नमी को बढाती
पीड़ाओं को गले लगाती तभी न जाने
कहां से आ कर माँ पीड़ाओं को परे
हटा हँस कर मेरी पनीली आँखों
को मोड़ देती है फुटपाथ की तरफ
और बिन कहे सिखा देती है
अभाव में भाव का फ़लसफा
मेरे होठों पर सजा के संतुष्टि
की मुस्कान मुझे ले कर चल
पडती है पीड़ाओं के जंगल में जहाँ
बिखरी पडी हैं तमाम पीड़ायें
मजबूर स्त्रियां मजदूर बचपन
मरता किसान इनकी पीड़ा दिखा
सहज ही बता जाती हैं मेरे जीवन
के मकसद को अब मैं अपनी पीड़ा
को बना के जुगनू खोज खोज के
उन सबकी पीड़ाओं से बदल रही हूँ
माँ की दी हुई मुस्कान और
सार्थक कर रही हूँ
माँ के दिए हुए इस जीवन को

Saturday, 23 May 2015

“खैर जो भी हो, मैं तो बस निकलना चाहती हूँ,

मैं तो बस निकलना चाहती हूँ, मुक्त होना चाहती हूँ, उस दर्द से जिसकी कोई ठोस वजह ही नही है, मुक्त होना चाहती हूँ उन आर्टिफीसियल रिश्तो से जो अपने होने का दंभ भरते हैं मगर सिर्फ ख़ुशी में, अमीरी में ! गरीबी में वही अपने रिश्ते अजनबियों की तरह साइड से निकल जाते ” जीवन बहुत सुखदायी है यदि इसमें नमक मिर्च न हो तो संतों का समाज बन जायेगा जैसी दुनिया हैं भगवान की बनाई है हर पात्र अपने अनुसार चलता है

हम दोनों मुस्करा दिये (Wah Kaun Thee)

बहुत समय बाद वह एक समारोह में मुझे दिखी । लोगों से खूब बातचीत कर रही थी।मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा। वह इधर-उधर जा रही थी। थोड़ी देर में,मैंने देखा वह मेरे बगल में खड़ी खाना लिये आत्मीय ढंग से खड़ी है। हमने एक ही प्लेट में खाना खाया।उसके बाद वह बोली ,अच्छा, चलती हूँ। मैंने “ठीक है”कहा। वह आगे बढ़ी,फिर अपने पुराने अंदाज में पीछे मुडी। ठिठक कर पूछा”कुछ कहा क्या?” मैंने कहा नहीं। वह फिर चली गयी।
मैंने जिज्ञासावश बगल में खड़े आदमी से पूछा ” जो महिला मेरे साथ खड़ी थी उन्हें आप जानते हैं क्या?”
उसने कहा “हमारे बैंक की महाप्रबन्धक हैं”।
मैंने फिर पता पूछा। मैं रातभर सो नहीं पाया।सारी पुरानी घटनाएं जीवित हो गयी थी। सुबह हुई। मैं सीधे उनके निवास पर पहुँच गया। शायद इतवार का दिन था। मैंने घंटी बजाई , उसने दरवाजा खोला। और बोली “अरे आप” । वह मुझे अन्दर ले गयी। और बैठक में बैठा दिया।अभी आती हूँ कहकर चली गयी।
थोड़ी देर में वह चाय लेकर आयी । फिर बोली “चाय की एक घूँट ,मुझे तरोताजा कर गयी”
मैंने कहा ” कहीं सुना लग रहा है ”
“आपका ही लिखा हुआ है।” वह बोली। वह सामने बैठ गयी और मैं उसे अपलक देख रहा था।वह बोली क्या देख रहे हो।मैं बोला”तुम्हारी जवानी”।
 वह सिर झुकाकर , चाय कप में डालने लगी।उसने चाय का कप मुझे थमाया। मैंने जैसे ही कप थामा थोड़ी चाय मेरे दूसरे हाथ में गिर गयी। उसने अनायास मेरा हाथ पकड़ा और हाथ में गिरी चाय को जीभ से ठंडा कर दिया।
फिर बोली मैंने जिन अंगुलियों से पहली बार आपके हाथ को छुआ था , उन्हें मैं आज भी चूमती हूँ। लेकिन सामाजिक दबावों के कारण कुछ कह न पायी। आजकल क्या लिख रहे हो? उसने बातचीत को मोड़ा। मैंने एक पन्ना जेब से निकाला और उसे थमा दिया।जिसमें लिखा था –
थोडी देर खो जाऊँ
तुम्हारी हँसी में
ऐतिहासिक दृष्टि में
 तुम्हारी सुलझी सोच में
 उन बातों में जो नहीं हुई बस ,
सपनों सी बनी रही,
थोडी देर खो जाऊँ
 विद्यालय के ज्ञान में
 टन टन करती घंटी में
देवदारनुमा इतिहास में
उस गिरती बर्फ में
झील की मछलियों में
तुम्हारी अगली कहानी में ।
 मैं याद कर ले आऊँ
 पहाड़ियों की धड़कनें
 वृक्षों की शक्तियां घुले-मिले
त्योहार शाम की मुलाकातें
 उत्सुकता भरी प्रतीक्षाएं,
जन आन्दोलनों की गूँजें
जो अधर में लटकी हैं ,
छोटा सा एक सत्य जो
हमें पहिचानता है ।
 मैं ले आऊँ प्यार के अहसास
जिजीविषा का संघर्ष मन
 का खुलापन अपना भुलावा
तुम्हारा परियों सा पहनावा।
उसने ध्यान से इसे पढ़ा और उसकी आँखें डबडबा आयी। इतने में उसकी कामवाली आ गयी। उसने उससे चाय बनाने को कहा।
मैंने गम्भीर होकर कहा “तुम्हारी गोद में सिर रखने को मन करता है”
वह बोली “अगले जनम में।”
अब वह पुरानी झिझक नहीं रह गयी थी। विचारों में कुछ दार्शनिकता आ गयी थी।हमने फिर चाय पी। चाय पीने के बाद मैं एक पत्रिका लेने खड़ा हुआ। ज्यों ही मैंने कदम आगे बढ़ाये,मुझे हल्का सा चक्कर आने का आभास हुआ। मैं नीचे आँख मूँद कर बैठ गया। उसने जल्दी से मेरा सिर अपनी गोद में रख दिया। और पूछा”क्या हुआ?”
मैं मुस्करा दिया और बोला “ मन कर रहा है ,ऐसे ही सो जाऊँ “.
उसने मेरे मुँह में हाथ रख दिया । मैं उठा और जाने के लिए अनुमति माँगी। वह बोली आप अभी कहीं नहीं जा सकते हैं । तब नहीं बोल पाती थी लेकिन आज बोल सकती हूँ। कहाँ ठहरे हैं?,
मै बोला “ताज में” .
हाँ, बड़े आदमी वहीं ठहरते हैं वह बोली । फिर मुझे देख मुस्कराने लगी। तभी कामवाली वहाँ आयी और बोली “ साहब, मेम साब को इतना खुश कभी नहीं देखा।“
जिसे आप प्यार करते हैं और बिछुड़ गया हो, मिलने की कोई आशा न हो, फिर अचानक मिल जाय तो आप खुशी में उछ्ल पड़ेंगे। मानसिक संतोष की यह परम अवस्था होती है।
जब कामवाली चली गयी तो वह बोली “ हमारी हालत कुछ कुछ कृष्ण- राधा जैसी है।“ यह सुनते ही मैंने लम्बी साँस ली और मेरी आँखें भर आयीं। फिर उसने अपना घर मुझे दिखया। मनमोहक, अनेक तस्वीरों से सजे कमरों को देख बहुत अच्छा लगा। पुरांनी तस्वीरों में सब थे पर मैं नहीं था।
मैंने कहा “ मैं कहीं नहीं हूँ । ”
तो वह झट से बोली “ आप दिल में रहते हो।“ उसने पूछा” मेरी तस्वीर आप के पास है क्या?”
मैंने कहा “ नहीं”, “आप दिल में रहती हो।“
और हम दोनों मुस्करा दिये।

अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसते हुए

महाभारत में देखा था अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसते हुए, एक वीर योधा होने के बावजूद भी वह चक्रव्यूह को भेद नही पाया, हर संभव प्रयास किया मगर असफल रहा, अंत में मृत्यु को प्राप्त होकर ही उस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाया !
एक बच्चा जब जन्म लेता है तब वह किसी को नही जानता, जैसे-जैसे दिन गुजरते हैं उस बच्चे की सोचने समझने की शक्ति भी विकसित होती जाती है, अब वो अपनी माँ को जानता है, पिता को जानता है और धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ ही घर के, पड़ोस के लोगो को भी जानने लगता है ! फिर वह बच्चा थोडा और बड़ा होता है, स्कूल जाने लगता है, वहां नये-नये दोस्त बनते हैं, नये लोगो से मिलना होता है, उनसे मेल-मिलाप होता है, फिर उन सभी दोस्तों में से कोई एक या दो दोस्त खास बन जाते हैं !
वक़्त थोडा और गुजरता है, अब वो बच्चा जो स्कूल जाता था कॉलेज जाने लगता है, स्कूल के अनगिनत दोस्तों के साथ-साथ कॉलेज में भी अनगिनत दोस्त उसका इंतजार कर रहे होते हैं, वक़्त थोडा और गुजरता है, अब वह बच्चा, बच्चा नही रहता, बड़ा हो जाता है, पढाई पूरी कर लेता है, नौकरी करने लगता है, ये वो समय है जब उसे लगता है कि वो अब अकेला नही है, उसके बहुत सारे दोस्त हैं, रिलेटिव्स है, उसका अपना एक परिवार है, माता-पिता हैं, भाई-बहन हैं, अड़ोसी -पडोसी हैं, कुल मिलकर अब उस छोटे से बच्चे को जानने वाले लाखो लोग हैं !
जैसे-जैसे उम्र का एक-एक दिन बढ़ता है वैसे-वैसे इंसान इस जीवन रूपी चक्रव्यूह में फँसता चला जाता है, बचपन से ही मोह-माया के ऐसे जाल में फँसने लगता है कि अगर जीवन में कभी किसी मोड़ पर निकलना भी चाहे तो भी अथक प्रयास के बावजूद भी नही निकल पाता !
अगर भावनाओ को नज़रअंदाज कर दिया जाये तो इस जीवन में ऐसा कुछ भी नही है कि इसे बेकार के मोह-माया में फंसकर बर्बाद किया जाये ! क्या रखा है इस दुनिया में, दूर तक देखो तो हर तरफ बस दर्द, दुःख, परेशानियाँ, नफरत यही सब तो भरा पड़ा है, कोई खुश नही, खुश हो भी तो कैसे, एक की ख़ुशी दूसरे से जुडी है और इस दुनियॉ में किसी को किसी दूसरे की खुशियो की परवाह कहाँ है !
पैसे नही है, गरीबी से ज़िंदगी भर जूझते रहो, अपनी शान को बरकरार रखने के लिए लोगो के सामने भीख मांगते रहो, इस काम के लिए पैसे चाहिए, अब दे दो, जैसे ही मेरे पास होंगे मैं लौटा दूंगा, पैसे आते हैं और उधार चुकाने में ख़त्म हो जाते हैं, जमीन का बटवारा हो गया फिर भी दोनों भाइयो को लगता है कि मुझ से ज्यादा दुसरे को मिल गयी, घर में देवरानी, जिठानी, सास घर के काम को लेकर झगडती हैं, सब्जी में नमक कम है, दाल पकी नही ठीक से, उसने मेरे बारे में ये कहाँ, उसने वो कहाँ, रोटी कच्ची रह गयी, उसे ज्यादा गहने मिल गये, मुझे कम मिले, सोना-चांदी यहाँ तक कि आर्टिफीसियल गहनों पर भी लड़ाई-झगडे होते हैं !
मुस्कुराने का मन न हो तो भी पागलो की तरह सिर्फ दुसरो को दिखाने के लिए हँसते रहो, अपने आप को पूरी दुनिया के साथ इतना अटेच कर लो कि फिर उसके छोड़ कर जाने पर रोते रहो, बेवजह दुखी होते रहो, उसने मुझे छोड़ दिया, उसने मुझसे बात नही की. वो मुझे प्यार नही करता/करती , बला बला बला बला …
सारी जिंदगी इसी लड़ाई-झगडे में, ताने सुनने में, देने में, नमक, मिर्च, सब्जी- रोटी इसी सब में निकल जाती है, और अंत में मिलता क्या है, मौत ? वो भी कैसी होगी कौन जाने !
बहुत ऊब महसूस होने लगी है अब दुनिया को देख कर ! इसके रंग-ढंग देख कर, मन बार-बार कहता है कि चल मुक्त हो चल इस जहाँ से, कहीं दूर निकल जा, जहाँ ये झूठे रीति-रिवाज, कानून, नियम, ओहदे, और झूठे इन्सान कोई न हो, जहाँ कोई नमक मिर्च को लेकर झगडा न करे, जहाँ कोई अपना न हो और सब अपने हो, किसी से कोई अटैचमेंट नही, बस अपना कर्म करना हो ! जहाँ इन्सान सिर्फ अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए दुसरो की जिन्दगी के साथ न खेलता हो, लेकिन ये सब सोचना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल, इस जहान रूपी चक्रव्यूह से इस युग में भी जिन्दा रहते हुए निकलना नामुमकिन है, म्रत्यु ही शायद एक मात्र रास्ता हो इस चक्रव्यूह से निकलने का !
खैर जो भी हो, मैं तो बस निकलना चाहती हूँ, मुक्त होना चाहती हूँ, उस दर्द से जिसकी कोई ठोस वजह ही नही है, मुक्त होना चाहती हूँ उन आर्टिफीसियल रिश्तो से जो अपने होने का दंभ भरते हैं मगर सिर्फ ख़ुशी में, अमीरी में ! गरीबी में वही अपने रिश्ते अजनबियों की तरह साइड से निकल जाते हैं, :) 
बार-बार एक ही सवाल मन में उठ रहा है कि क्या जिन्दगी के साथ रहकर भी मुक्त हुआ जा सकता है ???

क्या बोलूं मैं जब तू ही सब कुछ बता रही है तो.. (Ek Chhoti Si Baat)

जानकार भी अंजान बन कर बहस करते रहना उसकी फ़ितरत में आ चुकी थी, और इस बात पर उसने गौर तब फरमाया जब ट्रेन के सबसे पीछे वाले डब्बे में वो और उसकी एक सहेली बैठी हुई थी.
रात का वो अजीब सा अंधेरो में घीरा हुआ चाँद पिघलने की कोशिश कर रहा था लेकिन क्या उसे चकोर की मुस्कुराहट रोक रही थी या कुछ और, ये तो पता नहीं लेकिन इतना ज़रूर था उन शोर-गुल के बीच भी मानो अजीब सी अशांति वाली शांति मिल रही थी. ग्रीन सिग्नल देखते हुए ट्रेन की जब आख़िरी हॉर्न बजी तो अचानक एक ही गति से सारे यात्री ट्रेन की दरवाजे की तरफ टूट पड़े मानो जैसे सिपाही दुश्मन को लपेटे में लेने के लिए एक साथ दौड़ते हैं.
ये दृश्य कोई ख़ास दृश्य तो था नही लेकिन इसकी ख़ासियत इसके ना ख़ास होने में ही थी…..फिर अचानक से..– – “एशा..एई लड़की,..कहाँ खोई हुई है??..इतनी देर से आवाज़ लगा रही”.
एशा ने बिना कुछ बोले काव्या के हाथों से पानी वाला बोतल ले लिया.
– “मानती हूँ की तू इंजिनियरिंग स्टूडेंट है इसका मतलब ये नही की तू हमारे जैसे उच्य कोटि के पी.ओ को भाव नही देगी”…और इस बात पर दोनो खिलखिलाकर हंस पड़े.
काव्या ने पास रखा न्यूसपेपर पढ़ने की कोशिश करी लेकिन शायद उसे ये कोशिश व्यर्थ लगी इसलिए दुबारा उसी जगह पर रख दिया जहाँ से उठाया था, और फिर बोलना शुरू किया-
– “तुझे पता है बांग्लादेश हार गया?”
* हाँ पता है. –
“और पाकिस्तान आज कुछ अछा नही खेल रहा?”
 हाँ – “तुझे पता है ऑस्ट्रेलिया तीन बार से लगातार वर्ल्ड कप जीतता आ रहा?”
 हाँ पता है.
– “ओय, ये क्या पता है पता है लगा रखा है…
तुझे पता तो सब कुछ रहता है..बस बताने की कष्ट नहीं करती.” * क्या बोलूं मैं जब तू ही सब कुछ बता रही है तो..
– “ठीक है जाने दे,वैसे भी तुझसे क्या उलझना. मैने सोच रखा था की पहली सॅलरी से मैं घर पर सत्यनारायण भगवान की पूजा कर्वाऊंगी लेकिन अब लगता है दूसरी सॅलरी का इंतेजार करना पड़ेगा…शायद तीसरी का भी”.., और वो एक पेन्सिल से न्यूसपेपर में कारीगरी करते हुए एक धुन से बोलते ही चली जा रही थी..फिर अचानक से बोल बैठी- “इंजिनियरिंग साहिबा मैं पी.ओ होते हुए भी एक इंजिनियरिंग स्टूडेंट को सलाह दी”.
* एशा प्रश्नचिन्ह होकर- “किस बात की सलाह ?”
– “वो पी.एच.पी और .नेट के बीच कन्फ्यूज़ था तो मैने उसे बोला की .नेट पी.एच.पी से जादा आसान है और इसकी आजकल बहुत माँग भी है और उसे .नेट पढ़ने को बोला.”
जाने कौन सी बात एशा को खट्टग गयी और उसने अपना सिलसिला शुरू किया- “ऐसी कोई बात नही पी.एच.पी भी सही है, बल्कि .नेट आसान नही”.
ये जानते हुए की काव्या की बात 100% सही थी, वो फिर भी उसके उपर हावी होते चली जा रही थी…अपने उल-जलूल ना काटने वाले तर्क लगाकर वो आख़िर में शांत हो ही गयी जब उसने देखा की वो उपरी रूप से काव्या के साथ बहस में जीत गयी….और इस दौरान काव्या ने वापस रखा न्यूसपेपर पढ़ना जादा ज़रूरी समझा क्यूंकी उसके मुताबिक एशा के साथ बहस में वक़्त व्यर्थ करने से जादा सही न्यूसपेपर में वक़्त व्यर्थ करना सही था. अंत में यही हुया की बहस में हार कर भी जीती काव्या शांत मान से न्यूसपेपर पढ़ रही थी और इधर जीत कर भी हारी एशा अशांत मन से ट्रेन के बाहर नज़ारों का आनंद उठाने की कोशिश करने लगी. कुछ देर दोनो शांत रहें.
फिर कुछ समय बाद काव्या ने न्यूसपेपर के पीछे से धीरे से बोला- “तू कभी नही सुधर सकती”.
एशा ने भी बोतल से मारते हुए काव्या को बोला-” जब तू जानती है की सुधर नही सकती तो फिर उलझती क्यूँ मुझसे??”
” क्या करूँ तेरे ना तर्क वाले तर्क से जो इतना प्यार है मुझे”…और इस बात पे दोनो मुस्कुराने लगे..फिर खाना खाने की तैयारी करने लगे…
इसी बीच कानपुर स्टेशन पर एक बच्चा अपने पिता के साथ आया और उनकी बगल वाली सीट में बैठ गया..कुछ देर बात करने के बाद वो अपने पिता से पूछा- “पिताजी क्या आप बता सकते है की .नेट और पी.एच.पी में कौन सा जादा आसान है?”…
ये सुन कर एशा और काव्या ने एक दूसरे को देखा और जोरो का ठहाका मारते हुए हंस पड़ी..यह देख कर बेचारा बच्चा भी घबरा गया.

भगवान ने वृद्धा को वचन दिया। (VACHAN BHANG)

एक वृद्धा थी। वह अकेली थी। वह ठीक से देख भी नहीं सकती थी। वह गाँव के बाहर अपनी झोंपड़ी में रहती थी। वहीं कुछ फूलों के पौधे लगाकर, उन फूलों की मालाएँ मंदिर के पास बेचती थी। उससे मिलने वोले कुछ पैसों से ही अपनी जीविका बिताती थी। भगवान के प्रति उसकी बड़ी श्रद्धा और भक्ति थी। रोज भगवान की पूजा करने के बिना वह कुछ भी खाती या पीती नहीं थी।
उसके मन में भगवान को अपने हाथों से एक बार भोजन खिलाने की बड़ी लालसा थी। इसके लिए कुछ महीनों से उसने कुछ रकम बचाकर रखी। उस रकम से अच्छा खाना बनाकर भगवान को खिलाना उसका विचार था।
एक दिन उसके सपने में भगवान दिखाई पड़े तो वृद्धा ने अपने मन की इच्छा प्रकट की।
“भगवन, मैं अपने हाथों से खाना बनाकर आपको खिलाना चाहती हूँ। आप मेरे हाथों से खाना खाने के लिए कब आएंगे?“ वृद्धा ने पूछा।
“मैं कल दुपहर को तुम्हारे घर में आकर तुम्हारे हाथों का खाना खाऊँगा।“ भगवान ने वृद्धा को वचन दिया।
सपने में भगवान का वचन पाकर वृद्धा बहुत खुश हुई। दूसरे दिन तड़के ही उठकर, नहाकर तैयार हुयी। भगवान की पूजा करके, कुछ खाये-पिये बिना ही वह बाजार में गई। अच्छा खाना बनाने के लिए आवश्यक भोजन की सामग्री उसने खरीद ली।
सीधे घर में आकर वह वृद्धा भगवान के लिए खाना बनानॆ में लग गई। बड़ी श्रद्धा से उसने खाना बनाया। पहले भगवान आकर उसके हाथों से खाना खा लें, फिर स्वयं खायेगी, यूं सोचकर वह भगवान के लिए प्रतीक्षा करने लगी।
भगवान नहीं आये। वृद्धा को जोर की भूख भी लग रही थी। भगवान के लिए वह प्रतीक्षारत थी। उसने प्रतीक्षा की और प्रतीक्षा की। इस प्रतीक्षा में ही उसे निद्रा आई। उसी समय में घर के बाहर किसी वृद्ध दम्पति की आवाजें सुनाई पड़ीं।
“माता, जोर की भूख लग रही है। खाने को कुछ दो माता..” किसी वृद्ध की सिहरती हुई आवाज वृद्धा को सुनाई पड़ी।
वृद्धा ने बाहर आकर देखा। उसे अपने आंगन में एक वृद्ध और वृद्धा खडे हुए दिखाई पड़े। उनके बदन पर चीथड़ें थीं। कई दिनों की भूख से उनके पेट और पीठ एक जैसे लग रहे थे। उन्हें देखते ही वृद्धा का मन विकल हो उठा।
‘भगवान आयेंगे तो उनको और एक दिन आने के लिए कहूंगी। पहले इनको खाना खिलाऊँगी।” वृद्धा ने मन में सोचा।
“महानुभाव, आपके लिए खाना गरम-गरम तैयार है। आप नहा धोकर आइय़े। मैं आपके लिए खाना परोसकर रखूँगी।” वृद्धा ने कहा।
वृद्ध दम्पति को उस ने घर के अहाते में स्थित कुँआ दिखाया। घर में रहे कुछ धुले हुए कपड़े भी उन्हें दिये। वे बूढ़े कुँए के पास जाकर नहाकर धुले हुए कपड़े पहनकर आये।
उन्हें केले के पत्तों पर गरम-गरम खाना परोसकर वृद्धा ने उन्हें बड़े प्यार से खाना खाने को कहा।
“माता, तुम भी आकर हमारे साथ खाओ ना। लगता है, तुम ने भी अब तक कुछ खाया नहीं।” वृद्ध दम्पति ने कहा।
“आप पहले खाइये। बाद में मैं खाऊँगी।” वृद्धा ने कहा।
मगर वे नहीं माने। इस लिए वृद्धा भी उन के साथ बैठकर खाना खाया। उस दिन का खाना उसे अमृत जैसे बहुत ही अच्छा लग रहा था। यह तो भागवान का खाना है, इसी लिए यह इतना स्वादिष्ट है – वृद्धा ने सोचा।
खाना खाने के बाद वृद्ध दम्पतियों ने वृद्धा को आशीर्वाद दिये और वहाँ से चले गये।
भगवान के लिए दुबारा खाना बनाने के लिए वृद्धा के पास पैसे नहीं थे। उसने सोचा कि भगवान खाना खाने के लिए नहीं आये, उन्हों ने वचन देकर फिर वचन भंग किया। इस बात पर वह दुखी थी। उसने सोचा कि भगवान नहीं आये, अगर आते तो भी अपनी ओर से भी वचन भंग होगा, क्यों कि उन्हें खिलाने के लिए घर में कुछ भी नहीं था।
उस दिन रात को सपने में भगवान दिखाई पड़े तो वृद्धा ने रोते हुए कहा, “भगवन, मुझे क्षमा कीजिए। मुझ से वचन भंग हुआ। आपके लिए खाना बनाकर दूसरों को खिला दिया। उनकी बेहाल हालत को देखकर मुझ से रहा नहीं गया।” वृद्धा ने माफी मांगते हुए कहा।
इस पर भगवान हँस पड़े। उन्हों ने कहा, “वचन भंग कहाँ हुआ?”
“भगवन, आप नहीं आए तो इसके अनेक कारण हो सकते हैं। अपके अनेक भक्त हैं, आपके अनेक काम हैं। आज नहीं तो और एक दिन आप मेरे घर में आ सकते हैं। इस लिए आपके नहीं आने से ज्यादा मेरा ही वचन भंग हुआ। आपको अच्छा खाना खिलाने के लिए मुझे और दो तीन महीने इंतजार करना होगा, तभी मैं इतना पैसा फिर से जुटा सकती हूँ। “ वृद्धा ने अपनी हालत समझाई।
वृद्धा ने जब यह कहा तो भगवान की आँखें पसीज गईं।
“माता, आज तुम ने मुझे मेरी देवी को बढ़िया खाना खिलाया। मैं और मेरी देवी तुम्हारे घर वृद्ध दम्पति बनकर आये और तुमने हमें बढ़िया खाना खिलाया है। इस लिये हम में से किसी की ओर से वचन भंग नहीं हुआ।“ भगवान ने इतना कहकर वृद्धा के स्वप्न से अंतर्द्धान हो गये।

Friday, 22 May 2015

राज की बात है दिल

कमाल का शख्स था जिसने
जिंदगी तबाह कर दी
राज की बात है दिल
उससे खफा अब भी नही...

उसकी आँखें हमें दुनिया भुला देती हैं

उसकी प्यारी मुस्कान होश उड़ा देती हैं
उसकी आँखें हमें दुनिया भुला देती हैं
आएगी आज भी वो सपने मैं
यारो बस यही उम्मीद हमें रोज़ सुला देती हैं!

हर फूल की खुशबू एक जादू जगाती हैं…

हर सुबह की धुप कुछ याद दिलाती हैं..
हर फूल की खुशबू एक जादू जगाती हैं…
चाहू ना…. चाहू कितना भी यार…
सुबह सुबह आपकी याद आ ही जाती हैं .

हमारे प्‍यार में इतना दम है

“बिन देखे तेरी तस्‍वीर बना सकते हैं
बिन मिले तेरा हाल बना सकते है
हमारे प्‍यार में इतना दम है
की तेरे आसूं अपनी ऑख से गिर सकते हैं ”

ज़माने वाले कोई खुदा तो नहीं !

किसी के दिल में बसना कुछ बुरा तो नहीं !
किसी को दिल में बसाना कोई खता तो नहीं !
गुनाह हो यह ज़माने की नज़र में तो क्या !
ज़माने वाले कोई खुदा तो नहीं !

किसी को दिल में बसाना कोई खता तो नहीं !

किसी के दिल में बसना कुछ बुरा तो नहीं !
किसी को दिल में बसाना कोई खता तो नहीं !
गुनाह हो यह ज़माने की नज़र में तो क्या !
 ज़माने वाले कोई खुदा तो नहीं !

जब वो खुद अकेले हो..!!

जिन्दगी भर कोई साथ नही देता ये जान लिया है हमने .... लोग तो तब याद करते है जब वो खुद अकेले हो..!!

हम खुद को न जलाते तो और क्या करते!

दर्द से हाथ न मिलाते तो और क्या करते!
गम के आंसू न बहते तो और क्या करते!
उसने मांगी थी हमसे रौशनी की दुआ!
हम खुद को न जलाते तो और क्या करते!

मन करता है यकीं कर जाऊं उनकी हर बात पर...||

ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है,
सब कहते थे जिस दिन तुझे देखा,
यकीन भी हो गया
वो बोलते है झूठ इतने प्यार से...
मन करता है यकीं कर जाऊं उनकी हर बात पर...||

आज फ़िर मेरा खयाल ना आया!

रात फ़िर ढल रही है...
इंतज़ार करते करते...
किसी अपने को,
आज फ़िर मेरा खयाल ना आया!

आंख खुलते ही आपकी याद होती है

सुबह होते ही जब दुनिया आबाद होती है
आंख खुलते ही आपकी याद होती है
खुशियो के फूल हो आपके आँचल मे
ये मात्र होंठों पे पहली फरियाद होती है!

जरा मुस्कुरा दो हम सब के लिए

चाँद भी तो देखो तुम्हें तक रहा हैं
सितारे भी थमे थमे से लग रहे हैं
जरा मुस्कुरा दो हम सब के लिए
हम भी टू तुम्हें शुभ रात्रि कह रहें हैं !

बस नींद नहीं आँखों में

सूनो...,रात है  चाँद है,
संग चाँदनी सितारे भी फलक पे हैं,,
बस एक नींद नहीं आँखों में,
 तेरी यादें पलक पे हैं.!!!

दिल धड़का फिर तुम्हारी याद आई..

रात गुजारी फिर महकती सुबह आई …
दिल धड़का फिर तुम्हारी याद आई..
आँखों ने महसूस किया उस हवा को …
 जो तुम्हें छु कर हमारे पास आई ..

Wednesday, 20 May 2015

रात भर बारिश में

रात भर बारिश में,
ऐसे भीगा मोगरा
जैसे भीगता है मन मेरा
तुम्हारे प्यार में
और खिल खिल सा जाता है।
मैंने उस मोगरे की
बना ली है वेणी
और टांक लिया है जूड़े में
इस तरह महकती रहती हूँ
तुम्हारे प्यार की खुशबू में।

अब तुम क्यों नजर नहीं आते

ये मेरा सौभाग्य है की डिग्री कॉलेज में पहला चयन मेरा निराला की धरती गढ़ाकोला निकट उन्नाव में हुआ. गढ़ाकोला माँ सरस्वती के वरद पुत्र महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी का पैत्रिक गाँव  है वैसे उनका जन्म वसंत पंचमी के दिन 21फरवरी 1896 को मिदनापुर पश्चिमी बंगाल में हुआ था.बंगला, हिंदी,संस्कृत,और अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाले महाप्राण ने अपनी छाया से  हिंदी साहित्य में वसंत  के अग्रदूत बने.… किंतु  दुर्भाग्य से वो अपने जीवन को पतझड़ से अलग नहीं कर सके.

ये निराला का ही प्रताप है की आज भी वहां की धरती में कुछ ऐसी अनुभूति  है की आप की लेखनी रचियता बन भाव को शब्दों में पिरोने लगती है .वो भाव जो अब स्थाई भाव है के साथ मेरी रचना।।

वसंत देखा तुम्हे था
निराला की रचना में
कवि की कल्पना में
उस घाट  पर बाधी थी नाव जहाँ कवि ने
अब तुम क्यों नजर नहीं आते
प्रेम गीत अब क्यों नहीं गाते
क्यों रूक गये पतझड़ पड़ाव पर
सुस्ताना था वहां तुम्हे पल भर
अभी भी शाखों में फूल खिलते हैं
प्रेमी अब भी यहाँ मिलते है
व्यथा से मेरी बौराया वसंत
फिर बोला कुछ सकपकाया वसंत
रोज मिलते तो है प्रेम की सौगात लिए
फिर धुंधले हो जाते है उनकी आँखों के दिये
अब प्रेम में वो रंग नहीं मिलते
अब ख़्वाबों के कंवल नहीं खिलते
इसलिए पतझड़ की तरह आता हूँ
रस्म अदायगी   कर चला जाता हूँ
अब न रहूँगा इस ठावं बंधु
पूछे चाहे सारा गाँव बंधु

हवायें बदली बदली हैं ये मौसम बहका बहका है

हवायें बदली बदली हैं ये मौसम बहका बहका है
मैंने सिर्फ मुहब्बत की तो फिर ये जादू कैसा है।
नज़्मों के बादल घिरे थे कुछ गज़लें भी बरसी थीं
मेरी कच्ची धरती से उठी भाप में चंदन महका है।
उस रात चाँद से तुमने क्या कह दिया बता देना
आजकल मुझसे जानें क्यूँ वो उखड़ा उखड़ा रहता है 
तुम्हे जब याद करती हूँ तो होंठ मुस्कानें लगते हैं
ये दुनिया वाले कहते हैं मुझे शायद कुछ हुआ सा है।

प्यार से उसके मेरा बदन खिल रहा है

आफताब है वो मेरा सहर कर रहा है
दीदार धीरे धीरे असर कर  रहा है

न दिल पास में है ना धड़कन  बची है
मुहब्बत का मौसम  ग़ज़ल गा रहा है

संवरती हूँ जब भी आईने के सामने
प्यार से उसके मेरा बदन खिल  रहा है

शबनम बन बिखरती  फिजाओं में हूँ
फ़रिश्ता हिफाजत मेरी कर रहा है

प्यार मैं भी करती हूँ उससे इस तरह
जैसे मस्जिद में कोई दुआ कर रहा है

वो सुकून भरे पल..

क्यों न थोड़े मतलबी हो जाये...
सुबह ऑफिस जाने की जल्दी, 
दिनभर काम की भागा-दौड़ी... 
कुछ याद है, परिवार संग यूँ ही गप्पे लड़ाते हुए
 आखिरी बार कब चाय का प्याला हाथ मे लिया था... 
कभी टीवी तो कभी स्मार्ट फोन की दुनिया मे मस्त, 
कुछ याद है आखिरी बार कब खुली हवा मे किसी 
अपने के साथ चंद पल गुजारे थे...
सबको खुश करने के फेर मे चेहरे पर बनावटी मुस्कान लिए, 
कुछ याद है आखिरी बार कब सच्ची मुस्कुराहट को जिया था...
कुछ याद है आखिरी बार कब जिये थे,
 वो सुकून भरे पल... 
आखिरी बार कब हुए थे थोड़ा मतलबी...

ख़ामोशियाँ इज़हार का बहाना तो कुछ इंकार बन जाती है,

ख़ामोशियों की भी अपनी एक भाषा होती है,
कुछ ख़ामोशियाँ दिल की ज़ुबान बनके सब कुछ कह जाती है,
तो कुछ कानों में चुभती आवाज़ बन जाती है… 
कुछ ख़ामोशियाँ इज़हार का बहाना तो कुछ इंकार बन जाती है,
कभी प्यार में डूबी हुई, तो कभी रूठने का इशारा बन जाती है ख़ामोशी...
यूँ तो भाषा की परख रखने वाले पढ़ लेते है नज़रों को भी,
पर ख़ामोशी को पढ़ना भी तो, कभी कभी ज़रुरत बन जाती है… 
ज़रूरी नहीं ख़ामोशी का मतलब इकरार ही हो
बंद ज़ुबान से इंकार का पैग़ाम भी बन जाती है ख़ामोशी..........

बेइन्तेहां खूबसूरत हूँ मैं

खूबसूरती कभी शब्दों की मोहताज नहीं होती,
पर उसकी तारीफ़ के लिए भी अल्फाजों की ज़रुरत होती है...
ये नहीं कहती की बेइन्तेहां खूबसूरत हूँ मैं,
पर इस दिल की भी तो कोई औकात होती है...
कोई कह दे जाकर खूबसूरती के सौदागरों से,
खरीदना ही है तो एक दिल खरीद के दिखाओ...
वादा है, जेब खाली हो जाएगी क्यूंकि,
इस दिल की कीमत मर कर भी अनमोल होती है... 

अकेली राहों में चलते हुए

निकल पड़ी हूँ आज,
खुद से खुद को मिलाने
धुंधली होती तस्वीर को,
एक बार फिर से उभारने
अकेली राहों में चलते हुए
खुद से कुछ पल चुराने...
साथ किसी का पाने,
की इच्छा लिए बगैर...
चल पड़ी हूँ आज
खुद से ही दोस्ती निभाने...
कोई दोस्त, कोई साथी,
आज रहना चाहती हूँ खुद के साथ
कुछ यादों को मिटाने 
तो कुछ नयी यादें बनाने...
जाने कैसा एहसास है यह 
जो कर रहा है हर किसी से दूर
अपनी ही नाराज़ परछाई को
चल पड़ी हूँ आज मनाने...
खुशियों की सेज पर जिसके निशां हुआ करते थे
ढूढ़ रही हूँ आज, वो रास्ते पुराने 
निकल पड़ी हूँ आज एक नई, मैं को जानने