Friday, 8 May 2015

आँखों की कोरों से कुछ गीला -गीला गिरता है

आँखों की कोरों से कुछ गीला -गीला गिरता है
दिल से भी कुछ रुकता- रुकता झरता है
कसक सी उठती है दिल में,
बसंत में पतझड़ सा लगता है
आँखों की कोरों..
हर बार कहा हर बार रहा 
उनसे मेरा जो नाता है,
ना माना मीत मेरा वो सब,
उसे बंधन , जकड़न सा लगता है
आँखों की कोरों..
ना जाने वो प्यार की भाषा 
ना जाने मन की अभिलाषा
कसक सी उठती है दिल में
ये शहर अंजाना लगता लगता है
आँखों की कोरो..
ना समझ सकी अब तक उनको 
ना समझ सकी अब तक अपने को 
ये प्यार बेगाना लगता है
ये रोग पुराना लगता है
आँखों की कोरों..

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