Friday, 15 May 2015

सुहाने स्वप्न और ज़ज्बात यहाँ हर रोज बिकते हैं

किसको आज फुर्सत है किसी की बात सुनने की
अपने ख्बाबों और ख़यालों में सभी मशगूल दिखतें हैं
जीबन का सफ़र क्या क्या सबक सिखाता है यारों
मुश्किल में बहुत मुश्किल से अपने दोस्त दिखतें हैं
क्यों सच्ची और दिल की बात ख़बरों में नहीं दिखती
नहीं लेना हक़ीक़त से क्यों मन से आज लिखतें हैं
धर्म देखो कर्म देखो अब असर दिखता है पैसों का
भरोसा हो तो किस पर हो सभी इक जैसे दिखतें हैं
सियासत में न इज्ज़त की,न मेहनत की कद्र यारों
सुहाने स्वप्न और ज़ज्बात यहाँ हर रोज बिकते हैं
दुनिया में जिधर देखो हज़ारों रास्ते दिखते हैं
मंजिल चाहे मिल जाए बस रास्ते नहीं मिलते हैं

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