मन के विस्मयकारी रहस्य को भला कौन जान सका है ? 'प्रतिज्ञा' ने अस्तित्वात्मक वास्तिविकता या 'एग्ज़ीस्टेंशनल रियलिटी' को स्वीकार कर इन प्रश्नों पर सोचना छोड़ दिया था और अपने आपको आश्रम के कार्यों में खपा लिया था. वो 'आदि' से कहती थी कि संसार में दो इंसान सदा एक दूसरे के लिए अजनबी ही बने रहे हैं, वे सदा एक दूसरे के लिए अजनबी ही बने रहेंगे और अरुण यही बात अपने सतही ढंग से, सिर्फ़ अपने आस-पास की जिंदगी को लेकर कहता था कि हम भारतीय पति-पत्नी एक-दूसरे की दो परछाई होते हैं, दो अलग शख्सियतें , जो रेल की दो पटरियों की तरह सदा जुदा रहती हैं और जिन पर जिंदगी की गाड़ी दौडती रहती हैं.
रात के दो बजे थे लेकिन क्या दो ही बजे थे ? क्या इन चंद घंटों में में अतीत की स्मृति, वर्तमान की चिन्ता और भविष्य की आशा दुबकी बैठी थी.
यूँ तो 'प्रतिज्ञा' इस उपन्यास की नायिका है पर स्मृति, चिंता और पीड़ा उपन्यास की पार्श्व-नायिकाएं हैं.
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