Tuesday, 12 May 2015

जो जन्म-जन्मान्तर में विश्वास करता है

मुहब्बत सनातनी नजरिया नहीं है. ये आयातित है, जो शताब्दियों से हमारे संस्कारों को डिसटोर्ड कर रहा है. मुहब्बत , इश्क़-ओ-हुस्न जैसी बंदिशों में बंधा है. जहाँ इश्क़ (मर्दाना भाव, पुरुषोचित नहीं) से हुस्न को देखता आया है. यहाँ सारी यात्रा देह और देह के इर्द-गिर्द शुरू होती है और यहीं समाप्त हो जाती है. हुस्न को हासिल करने के लिए, इश्क़ किस-किस हद से नहीं गुज़र जाता है. और कम्बखत हुस्न भी उन हदों से गुज़र जाने को देखकर ही प्रभावित होता है. मुहब्बत एक जीत का नाम है, चाहे जैसे हासिल हो. 
जबकि प्रेम नि:स्वार्थ है ये त्याग है. ये मात्र आकर्षण स्वरुप मुश्किल क़बायद नहीं, बल्कि आत्मा का आत्मा से बंधन है, जो जन्म-जन्मान्तर में विश्वास करता है. मुहब्बत और प्रेम दोनों पृथक-पृथक दृष्टियाँ हैं. एक सीखकर की जाती है और दूसरी सिखा देती है, मनुष्य के स्वरुप को निखर देती है. ये सारी चर्चा यदि हम मुहब्बत और प्रेम में भेद कर सकें तो ही है अन्यथा मान लीजिये कि चर्चा हुई ही नहीं थी.

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