Tuesday, 12 May 2015

इस अँधेरे में कई चीजें साफ़ दिखाई नहीं देती

जब विदाई के समय 'आदि' मोटर बस में जा बैठता है और मोटर चलने को उद्दत होती है तो 'आदि' अपना हाथ आगे बढाता है, 'प्रतिज्ञा' भी आगे हाथ बढाती है. किन्तु वे अँधेरे में यह नहीं देख पाते हैं कि मोटर की खिड़की का शीशा चढ़ा हुआ है. उनके हाथ शीशे से टकराकर लौट आते हैं. हम सभी इसी अस्तित्वात्मक वास्तविकता में जीते हैं. दुनिया में अभी अँधेरा बाकी है और इस अँधेरे में कई चीजें साफ़ दिखाई नहीं देती और अजनबियत बनी ही रहती है.

No comments:

Post a Comment