Tuesday, 12 May 2015

काल एक प्रवाह है,

काल एक प्रवाह है, हमने उसे अपनी सुविधानुसार वर्षादिक खण्डों में विभाजित कर रखा है. समय कभी हमारी बनायीं गयी मापानुसार नहीं चलता. दिन, मौसम, साल और कलेंडर जैसे कालखंड मनुष्य की बाहरी जिंदगी से ही वास्ता रखते हैं और अन्दर की ज़िन्दगी से सदा मात खाते आये हैं. 'आदि' स्वयं को अपने आत्मालाप से बाहर निकालना चाहता है किन्तु 'प्रतिज्ञा' ने जैसे हठ ठान ली है कि उसकी कथा कभी समाप्त न हो. क्यूंकि जब तक आत्मालाप है, 'प्रतिज्ञा' जीवित है.

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