Tuesday, 12 May 2015

सत्य तो सदा नंग-धडंग ही होता है

सत्य तो सदा नंग-धडंग ही होता है. एकदम नवजात शिशु जैसा ! और सत्य को सदा ऐसा ही होना चाहिए. बिना किसी आवरण के. जैसा हुआ, वही बयां किया गया. बिना किसी मीठे शब्दों की चाशनी में लिपटा हुआ. बकौल कृष्ण बिहारी 'नूर' - सच घटे या बढे तो सच न रहे, झूंट की कोई इन्तहा ही नहीं.
तुम सत्य जानना चाहते हो.
सुनोगे !
उस रात 'प्रतिज्ञा' के बाहुपाश में, मैं ....... नहीं. मेरे बाहुपाश में 'प्रतिज्ञा' ....... नहीं ....... नहीं. उस रात जो कुछ हुआ, साक्षात मदन और रति भी भी उपस्थित होकर नहीं बता सकेंगें कि कौन किसके बाहुपाश में था. 'आदि' ने 'प्रतिज्ञा' का हाथ अपने हाथ में ले लिया और पल भर में दोनों का इस जगत से रहा सहा सम्बन्ध ही टूट गया. 'आदि', 'आदि' न रहा ! 'प्रतिज्ञा', 'प्रतिज्ञा' न रही ! वे थे केवल दो प्रेमी ! दो पखेरू ! दो तारे, जो विलीन होकर एक होने की अवस्था प्राप्त कर रहे थे. 'आदि', 'प्रतिज्ञा उस रात शैय्या पर नहीं थे, नगर में भी नहीं थे और जगत में भी नहीं. अनंत आकाश में, नक्षत्र मंडल से भी परे, जहाँ दु:ख, रोग, भय-मृत्यु आदि शब्दों की न गूँज थी और न कहीं दूर से आती हुई अनुगूंज. एक पृथक, प्यारी और सुन्दर दुनिया जिसका धूसर रंग भी कितना ...... कितना मोहक था और कितना दाहक भी. एक मदहोशी, एक विलक्षण पागलपन, कही न टूटने वाली एक समाधि. यह परम योग था.

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