रजनीगंधा से घिरे उस उपबन में बैठकर मुझे अनायास ही ये विचार आया कि हम दोनों मित्र थे या कुछ और भी थे. मैं काँप उठा. मेरा रोम-रोम काँप उठा था.
नहीं, नहीं अचानक ही क्या हो गया था मुझे. मेरा समूचा अस्तित्व किसी की उपस्थिति के लिए क्यूँ तड़प उठा था ? मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं एक गोलाकार कक्ष में बैठा हूँ, जिसके चारों और खिड़कियाँ थीं. जहाँ भी, जिस खिड़की से भी मैं देखता था, वहां 'प्रतीक्षा' दिखाई देती थी. प्रत्येक खिड़की में से उसका रूप निराला था. वे दिन, वे रातें, जो हमने एक साथ बितायी थीं और जो मेरी स्मृति में सप्रयास नहीं आई थीं, न जाने कहाँ से जागकर, उभरकर सामने आ कड़ी हुई थीं. मैं उस हरी-कोमल डूब पर लेट गया.मुझे ऐसा लग रहा था कि मानो मुझे सब-कुछ मिल गया हो. मेरे मन का प्याला छलक-छलक उठा था, अब उसमें एक बूँद की जगह भी शेष न थी. रात की उस ख़ामोशी में मुझे अजीब सा सकूं मिल रहा था. मुझे यह सोचते हुए आश्चर्य लगा था कि ऋषि-मुनि हिमालय की कंदराओं में जाकर शांति की प्राप्ति के लिए तपस्या क्यूँ करते हैं ? इस दुनिया में ही 'प्रतीक्षा' के पार्श्व अथवा सानिध्य में बैठकर भी सम्पूर्ण शांति प्राप्त की जा सकती है. ऐसे समय में पूर्णता के क्षणों को बार-बार छुआ जा सकता है, सुदूर को अपने निकट पाया जा सकता है .
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