हरेक इंसान के चारों और अपनी ही बनायीं हुई एक किलेबंदी होती है. इंसान उस किले के अन्दर स्वयं को बुद्धिमतापूर्ण सुरक्षित समझता है. किन्तु एकाएक कोई दूसरा मनचाहा इंसान वह किला तोड़कर भीतर घुस आता है तो हमारा अकेलापन अनायास ही गुम हो जाता है. ऐसा लगता है कि वह सदा से हमारे साथ है. जाग में, नींद में, खाते समय, काम के समय, वह प्रतिपल हमारे साथ होता है. हम स्नान-घर में जाकर अपने वस्त्र उतारकर जब नग्न हो जाते हैं तब भी. भले ही हम कितना भी प्रयत्न करें, उस इंसान से दूर नहीं हो पाते हैं. वो मनचाहा इंसान हमारे इतना नज़दीक आ जाता है कि हम उसके सांस लेने की आवाज़, उसके दिल की धड़कन, उसके शरीर की गंध, सब देख, सुन और सूंघ सकते हैं. सच तो यह है कि वह हमें अपने आप से भी ज्यादा निकट लगता है, ज्यादा प्यारा लगता है. अपना सब-कुछ न्योछावर करने को जी करता है.
उस रात भी 'आदि' का सारा वज़ूद 'प्रतिज्ञा' के लिए जाग उठा था. 'आदि' में अनुभव किया कि 'प्रतिज्ञा' सचमुच ही उसके पास थी. अँधेरे में वो इक ख्व़ाब थी,
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